श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
तत्त्वोंका प्रवेश होनेके लिये श्रीकृष्णका 'भागवत-धर्म' ही कारण हुआ होगा। अतएव यह बात निर्विवाद सिद्ध है कि कम-से-कम बुद्धके पहले - अर्थात् ईसाई सनके पहले लगभग छः सौसे अधिक वर्ष - हमारे यहाँका 'भक्ति-मार्ग' पूरी तरह स्थापित हो गया था। नारद-पञ्चरात्र या शाण्डिल्य अथवा नारदके भक्ति-सूत्र उसके बादके हैं। परंतु उससे भक्ति-मार्ग अथवा भागवत धर्मकी प्राचीनतामे कुछभी बाधा हो नहीं सकती। गीतारहस्यमें किये गये विवेचनसे ये बातें स्पष्ट विदित हो जाती हैं, कि प्राचीन उपनिषदोंमें जिन सगुणोपासनाओंका वर्णन है, उसीसे क्रमशः हमारा भक्ति-मार्ग निकला है; पातजलयोगमें चित्तको स्थिर करनेके लिये किसी-न-किसी व्यक्त और प्रत्यक्ष वस्तुको दृष्टिके सामने रखना पड़ता है, इसलिये उससे भक्ति-मार्गकी ओरभी पुष्टि हो गई है; भक्ति-मार्ग किसी अन्य स्थानसे हिंदुस्थानमें नहीं लाया गया है और न उसे कहींसे लानेकी आवश्यकताभी थी। हिंदुस्थानहीमे इस प्रकारसे प्रादुर्भूत भक्ति-मार्गका और विशेषतः वासुदेव-भक्तिका उपनिषदोंमें वर्णित वेदान्तकी दृष्टिसे मंडन करनाही गीताके प्रतिपादनका एक विशेष भाग है। परंतु गीताका इससेभी अधिक महत्त्वपूर्ण भाग, कर्मयोगके साथ भक्ति और ब्रह्मज्ञानका मेल कर देनाही है। चातुर्वर्ण्यके अथवा श्रौतयज्ञयाग आदि कर्मोंको यद्यपि उपनिषदोंने गौण माना है, तथापि कुछ उपनिषत्कारोंका कथन है, कि उन्हें चित्त-शुद्धिके लिये तो करनाही चाहिये, और चित्त-शुद्धि होनेपरभी उन्हें छोड़ देना उचित नहीं। इतना होनेपरभी कहना चाहिये कि अधिकांश उपनिषदोंका झुकाव सामान्यतः कर्मसंन्यासकी ओरही है। ईशावास्योपनिषदके समान कुछ अन्य उपनिषदोंमेंभी "कुर्वन्नेवेह कर्माणि" जैसे आमरण कर्म करते रहनेके विषयमें वचन पाये जाते हैं; परंतु अध्यात्मज्ञान और सांसारिक कर्मोंके बीचका विरोध मिटाकर प्राचीन कालसे प्रचलित उस कर्मयोगका समर्थन जैसा गीतामें किया गया है, वैसा किसीभी अन्य उपनिषदमें नहीं पाया जाता। अथवा यहभी कहा जा सकता है, कि इसी विषयमें गीताका सिद्धान्त अधिकांश उपनिषत्कारोंके सिद्धान्तोंसे भिन्न है। गीतारहस्यके ग्यारहवें प्रकरणमें इस विषयका विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है, इसलिये उसके बारेमें यहाँ अधिक लिखनेकी आवश्यकता नहीं। गीताके छठ्ठे अध्यायमें जिस योग-साधनका निर्देश किया गया है, उसका विस्तृत और ठीक ठीक विवेचन पातञ्जल-योग-सूत्रोंमें पाया जाता है, और इस समय ये सूत्रही इस विषयके प्रमाणभूत ग्रंथ समझे जाते हैं। इन सूत्रोंके चार अध्याय हैं। पहले अध्यायके आरंभमें ही योगकी व्याख्या इस प्रकार की गई है, कि "योगश्चित्त- वृत्तिनिरोधः"; और यह बतलाया गया है, कि "अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः"- यह निरोध अभ्यास तथा वैराग्यसे किया जा सकता है। आगे चलकर यमनियम- आसन-प्राणायाम आदि योगसाधनोंका वर्णन करके तीसरे और चौथे अध्यायोंमें इस बातका निरूपण किया है, कि संप्रज्ञात अर्थात् निर्विकल्प समाधिसे अणिमा-
५३२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र लघिमा आदि अलौकिक सिद्धियां और शक्तियां प्राप्त होती हैं, तथा इसी समाधीमें अन्तमें ब्रह्मनिर्वाणरूप मोक्ष मिल जाता है। भगवद्गीतामेंभी पहले चित्तनिरोध करनेकी आवश्यकता (गीता ६. २०) बतलाई गई है। फिर कहा है, कि अभ्यास तथा वैराग्य इन दोनों साधनोंसे चित्तका निरोध करना चाहिये (गीता ६. ३५); और अन्तमें निर्विकल्प समाधि लगानेकी रीतिकी वर्णन करके, यह दिखलाया है, कि उसमें क्या सुख है। परन्तु केवल इतनेहीसे यह नहीं कहा जा सकेगा कि पातंजलयोग-मार्गसे भगवद्गीता सहमत है; अथवा पातंजल-सूत्र भगवद्गीतासे प्राचीन हैं। पातंजल- सूत्रोंकी नाईं भगवान्ने यह नहीं कहा है कि समाधि सिद्ध होनेके लिये नाक पकड़े पकड़े सारी आयु व्यतीत कर देनी चाहिये। कर्मयोगकी सिद्धिके लिये बुद्धिकी समता होनी चाहिये; और उस समताकी प्राप्तिके लिये केवल साधनरूपमें चित्तनिरोध तथा समाधिका वर्णन गीतामें किया गया है। ऐसी अवस्थामे यही कहना चाहिये, कि इस विषयमें पातंजल-सूत्रोंकी अपेक्षा श्वेताश्वतरोपनिषद् या कठोपनिषद्के साथ गीता अधिक मिलती-जुलती है। ध्यान-बिंदु, क्षुरिका और योगतत्त्व उपनिषदभी योगविषयकही हैं। परन्तु उनका मुख्य प्रतिपाद्य विषय केवल योग है, और उनमें सिर्फ योगहीकी महत्ताका वर्णन किया गया है, इसलिये केवल कर्मयोगको श्रेष्ठ माननेवाली गीतासे इन एकपक्षीय उपनिषदोंका मेल करना उचित नहीं, और न वह होही सकता है। थामसन साहेबने गीताका अंग्रेजीमें जो अनुवाद किया है, उसके उपोद्घातमें आप कहते हैं, कि गीताका कर्मयोग पातंजलयोगहीका एक रूपांतर है परन्तु यह बात असंभव है। इस विषयपर हमारा यही कथन है, कि गीताके 'योग' शब्दका ठीक ठीक अर्थ समझमें न आनेके कारण यह भ्रम उत्पन्न हुआ है। क्योंकि इधर गीताका कर्मयोग प्रवृत्ति-प्रधान है, तो उधर पातंजल-योग बिल्कुल उसके विरुद्ध अर्थात् निवृत्ति-प्रधान है। अतएव उनमेंसे एकका दूसरेसे प्रादुर्भूत होना कभी संभव नहीं; औरभी यह बात गीतामें कहीं नहीं गई है। इतनाही नहीं; यहभी कहा जा सकता है, कि योग शब्दका प्राचीन अर्थ 'कर्मयोग' था और संभव है, कि वही शब्द पातंजल-सूत्रोंके अनंतर केवल 'चित्तनिरोधरूपी योग' के अर्थमें प्रचलित हो गया हो। चाहे जो हो, यह निर्विवाद सिद्ध है कि प्राचीन समयमें जनक आदिने जिस निष्काम कर्माचरणके मार्गका अवलंबन किया था, उसीके सदृश गीताका योग अर्थात् कर्मयोगभी है; और वह मनु-इक्ष्वाकु आदि महानुभावोंकी परंपरासे चले हुए भागवत धर्ममें लिया गया है - वह कुछ पातंजलयोगसे उत्पन्न नहीं हुआ है। अबतक किये गये विवेचनसे यह बात समझमें आ जायगी, कि गीता-धर्म और उपनिषदोंमें किन किन बातोंकी विषमता और समानता है। इनमेंसे अधिकांश बातोंका विवेचन गीतारहस्यमें स्थान-स्थानपर किया जा चुका है। अतएव यहाँ संक्षेपमें यह बतलाया जाता है, कि यद्यपि गीतामें प्रतिपादित ब्रह्मज्ञान उपनिषदोंके आधारपरही बतलाया गया है, तथापि उपनिषदोंके अध्यात्मज्ञानकाही निरा अनुवाद
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५३३ न कर, उसमें वासुदेव-भक्तिका और मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः-क्रमका अर्थात् अक्षर-ज्ञानकाभी समावेश किया गया है, और उस वैदिक कर्मयोग-धर्महीका प्रधानतासे प्रतिपादन किया गया है, जो सामान्य लोगोंके लिये आचरण करनेमें सुगम हो; एवं इस लोक साथ परलोकमें श्रेयस्कर हो। उपनिषदोंकी अपेक्षा गीतामें जो कुछ विशेषता है, वह यही है। अतएव ब्रह्मज्ञानके अतिरिक्त अन्य बातोंमेंभी संन्यास-प्रधान उपनिषदोंके तथा गीताका मेल करनेके लिये सांप्रदायिक दृष्टिसे गीताके अर्थकी खींचातानी करना उचित नहीं है। यह सच है, कि दोनोंमें अध्यात्म- ज्ञान एकही-सा है; परंतु – जैसा कि हमने गीतारहस्यके ग्यारहवें प्रकरणमें स्पष्ट दिखला दिया है – अध्यात्मज्ञानरूपी मस्तक एव भलेही हो, तोभी सांख्य तथा कर्मयोग वैदिक धर्म-पुरुषके दो समान बलवाले हाथ हैं; और इनमेंसे ईशावास्योप- निषद्के अनुसार, ज्ञानयुक्त कर्महीका प्रतिपादन मुक्त-कंठसे गीतामें किया गया है। भाग – ३ गीता और ब्रह्मसूत्र ज्ञान-प्रधान, भक्ति-प्रधान और योग-प्रधान उपनिषदोंके साथ भगवद्गीतामें जो सादृश्य और भेद हैं, उनका इस प्रकार विवेचन कर चुकनेपर यथार्थमें ब्रह्म-सूत्रों और गीताकी तुलना करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि, भिन्न भिन्न उपनिषदोंमें भिन्न भिन्न ऋषियोंके बतलाये हुए अध्यात्म-सिद्धान्तोंका नियमबद्ध विचार करनेके लियेही बादरायणाचार्यके ब्रह्मसूत्रोंकी रचना हुई है, इसलिये उनमें उपनिषदोंसे भिन्न भिन्न विचारोंका होना संभव नहीं। परंतु भगवद्गीताके तेरहवें अध्यायमें क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका विचार करते समय आरम्भमेंही ब्रह्मसूत्रोंका स्पष्ट उल्लेख इस प्रकार किया है :- ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् । ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका "अनेक प्रकारसे विविध छंदोंके द्वारा (अनेक) ऋषियोंने पृथक् पृथक् और हेतुयुक्त तथा पूर्ण निश्चयकारक ब्रह्मसूत्रपदोंमेंभी विवेचन किया है" (गीता १३. ४)। और यदि इन ब्रह्मसूत्रोंका तथा वर्तमान वेदान्त-सूत्रोंको एकही मान लें, तो कहना पड़ता है कि वर्तमान गीता वर्तमान वेदान्त-सूत्रोंके बाद बनी होगी। अतएव गीताका काल-निर्णय करनेकी दृष्टिसे इस बातका अवश्य विचार करना पड़ता है, कि ये ब्रह्मसूत्र कौनसे हैं। क्योंकि वर्तमान वेदान्त-सूत्रोंके अतिरिक्त ब्रह्मसूत्र नामक कोई दूसरा ग्रंथ नहीं पाया जाता, और न उसके विषयमें कहीं वर्णनही है।*
- इस विषयका विचार स्वर्लोकवासी तेलंगने किया है। इसके सिवा सन् १८९५में इसी विषयपर प्रो. तुकाराम रामचन्द्र अमलनेरकर, बी. ए नेभी एक निबंध प्रकाशित किया है।
और, यह कहना तो किसी प्रकार उचित नहीं जंचता, कि वर्तमान ब्रह्मसूत्रोंके बाद गीता बनी होगी। क्योंकि, गीताकी प्राचीनताके विषयमें परंपरागत समझ चली आ रही है। ऐसा प्रतीत होता है, कि प्रायः इसी कठिनाईको ध्यानमें लाकर शांकरभाष्यमें 'ब्रह्मसूत्रपदैः'का अर्थ "श्रुतियोंके अथवा उपनिषदोंके ब्रह्मप्रतिपादक वाक्य" किया गया है। परंतु, इसके विपरीत शांकरभाष्यके टीकाकार आनंदगिरि और रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य प्रभृति गीताके अन्यान्य भाष्यकार यह कहते हैं, कि यहाँ पर 'ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव' शब्दोंसे 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इन बादरायणाचार्यके ब्रह्मसूत्रोंकाही निर्देश किया गया है, और श्रीधरस्वामीको दोनों अर्थ अभिप्रेत हैं। अतएव इस श्लोकका मन्यार्थ हमें स्वतंत्र रीतिसेही निश्चित करना चाहिये। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ विचार "ऋषियोंने अनेक प्रकारसे पृथक्" कहा है; और इसके सिवा (चैव) "हेतुयुक्त और विनिश्चयात्मक ब्रह्मसूत्रपदोंनेभी" वही अर्थ कहा है; इस प्रकार 'चैव' (औरभी) पदसे इस बातका स्पष्टीकरण हो जाता है, कि इस श्लोकमें क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारके दो भिन्न भिन्न स्थानोंका उल्लेख किया गया है। ये दोनों स्थान केवल भिन्नही नहीं हैं, किंतु उनमेंसे पहला अर्थात् ऋषियोंका किया हुआ वर्णन "विविध छंदोंके द्वारा पृथक् पृथक् अर्थात् भिन्न भिन्न तथा अनेक प्रकारका" है; और उसका अनेक ऋषियों-द्वारा किया जाना 'ऋषिभि' से (इस बहुवचन तृतीयान्त पद) स्पष्ट हो जाता है; तथा ब्रह्मसूत्रपदोंका दूसरा "वर्णन हेतुयुक्त और निश्च- यात्मक" है, इस प्रकार इन दोनों वर्णनोंकी विशेष भिन्नताकाभी स्पष्टीकरण इसी श्लोकमें है। 'हेतुमत्' शब्द महाभारतमें कई स्थानोंपर पाया जाता है; और उसका अर्थ है- "नैयायिक पद्धतिसे कार्यकारणभाव बतलाकर किया हुआ प्रतिपादन"- उदाहरणार्थ, जनकके सन्मुख सुलभाका किया हुआ भाषण अथवा श्रीकृष्ण जब शिष्टाईके लिये कौरवोंकी सभामें गये, उस समय उनका किया हुआ भाषण लीजिये। महाभारतमेंही पहले भाषणको "हेतुमत् और अर्थवन्" (मभा. शां. ३२०. १९, १) और दूसरेको 'सहेतुक' (मभा उद्योग. १३१. २) कहा है। इससे प्रकट होता है, कि जिस प्रतिपादनमें साधक-बाधक प्रमाण बतलाकर अन्तमें कोईभी अनुमान निस्सन्देह सिद्ध किया जाता है, उसीको 'हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः' विशेषण लगाये जा सकते हैं. ये शब्द उपनिषदोंके ऐसे संकीर्ण प्रतिपादनको नहीं लगाये जा सकते, कि जो एक स्थानमें कुछ हो और दूसरे स्थानमें कुछ। अतएव "ऋषिभि बहुधा विविधैः पृथक्" और "हेतुमद्भिः विनिश्चितैः" पदोंके विशेषात्मक स्वारस्यको यदि स्थिर रखना हो, तो यही कहना पड़ेगा कि गीताके उक्त श्लोकमें "ऋषियों-द्वारा विविध छंदोंमें किये गये अनेक प्रकारके पृथक्" विवेचनोंसे भिन्न भिन्न उपनिषदोंके संकीर्ण और पृथक् वाक्यही अभिप्रेत हैं, तथा "हेतुयुक्त और विनिश्चयात्मक ब्रह्म- सूत्रपदों" से ब्रह्मसूत्र-ग्रंथका वह विवेचनही अभिप्रेत है, कि जिसमें साधक-बाधक प्रमाण दिखलाकर अंतिम सिद्धान्तोंका संदेहरहित निर्णय किया गया है। यहभी
गीता की बहिरंगपरीक्षा ५३५ स्मरण रहे, कि उपनिषदोंके सब विचार इधर उधर बिखरे हुए हैं, अर्थात् अनेक ऋषियोंको जैसे सूझते गये, वैसेही वे कहे गये हैं, उनमें कोई विशेष पद्धति या क्रम नहीं है; अतएव उनकी एकवाक्यता किये बिना उपनिषदोंका भावार्थ ठीक ठीक समझमें नहीं आता । यही कारण है, कि उपनिषदोंके साथही साथ उस ग्रंथका अर्थात् वेदान्त-सूत्र '(ब्रह्मसूत्र) काभी उल्लेख कर देना आवश्यक था, जिसमें कार्यकारण- हेतु दिखला कर उनकी (अर्थात् विचारोंकी) एकवाक्यता की गई है। गीताके श्लोकोंका उक्त अर्थ करनेसे यह प्रकट हो जाता है, कि उपनिषद् और ब्रह्मसूत्र गीताके पहले बने हैं। उनमेंसे मुख्य मुख्य उपनिषदोंके विषयमें तो कुछभी मतभेद नहीं रह जाता; क्योंकि इन उपनिषदोंके श्लोकही गीतामें शब्दशः पाये जाते हैं। परंतु ब्रह्मसूत्रोंके विषयमें संदेह अवश्य किया जा सकता है, क्योंकि ब्रह्मसूत्रोंमें यद्यपि 'भगवद्गीता' शब्दका उल्लेख प्रत्यक्षमें नहीं किया गया है; तथापि भाष्यकार मानते हैं, कि कुछ सूत्रोंमें 'स्मृति' शब्दोंसे भगवद्गीताहीका निर्देश किया गया है। जिन ब्रह्मसूत्रोंमें शांकरभाष्यके अनुसार 'स्मृति' शब्दसे गीताहीका उल्लेख किया गया है, उनमेंसे नीचे दिये हुए सूत्र मुख्य हैं:– ब्रह्मसूत्र – अध्याय, पाद और सूत्र गीता – अध्याय और श्लोक १.२.६ स्मृतेश्च । गीता १८.६१ "ईश्वरः सर्वभूतानां ०" आदि श्लोक । १.३.२३ अपि च स्मर्यते । गीता १५.६. "न तद्भासयते सूर्यः" आदि । २.१.३६ उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च गीता १५.३ "न रूपमस्येह तथोपलभ्यते ०" आदि । २.३.४५ अपि च स्मर्यते । गीता १५.७. "ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः ०" आदि । ३.२.१७ दर्शयति चाथो अपि स्मर्यते । गीता १३.१२ "ज्ञेयं यत्तत् प्रवक्ष्यामि ०" आदि । ३.३.३१ अनियमः सर्वासामविरोधः गीता ८.३६ "शुक्लकृष्णे गती ह्येते ०" शब्दानुमानाभ्याम् आदि । ४.१.१० स्मरन्ति च । गीता ६.११ "शुचौ देशे ०" आदि । ४.२.२१ योगिनः प्रति च स्मर्यंते । गीता ८.२३ "यत्र काले त्वनावृत्तिमा- वृत्तिं चैव योगिनः ०" आदि । उपर्युक्त आठ स्थानोंमेंसे कुछ यदि संदिग्धभी माने जायें, तथापि, हमारे मतसे तो चौथे (ब्र. सू. २.३.४५) और आठवेंके (ब्र. सू. ४.२.२१) विषयमें कुछ संदेह नहीं है; और यह बातभी स्मरण रखने योग्य है, कि इस विषयमें, शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य और वल्लभाचार्य, इन चारों भाष्यकारोंका
मन कभी-सा है। ब्रह्मसूत्रके उक्त दोनों स्थानोंके (ब्र. सू. २. ३. ४५; ४. २. २१) विषयमें इस प्रसंगपरभी अवश्य ध्यान देना चाहिये - जीवात्मा और परमात्माके परस्पर-संबंधका विचार करते समय, पहले "नात्माऽश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः" (ब्र. सू. २. ३. १७) इस सूत्रसे यह निर्णय किया है, कि सृष्टिके अन्य पदार्थोंके समान जीवात्मा परमात्मासे उत्पन्न नहीं हुआ है; उसके बाद "अंशो नाना- व्यपदेशात्०" (ब्र. सू. २. ३. ४३) सूत्रमें यह बतलाया है, कि जीवात्मा पर- मात्माहीका 'अंश' है; और आगे 'मंत्रवर्णाच्च' (ब्र. सू. २. ३. ४४) इस प्रकार श्रुतिका प्रमाण देकर अंतमें "अपि च स्मर्यते" (ब्र. सू. २. ३. ४५) - "स्मृतिमेंही यही कहा है" - इस सूत्रका प्रयोग किया गया है। सब भाष्यकारोंका कथन है, कि यह स्मृतिही गीताका "ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः" (गीता १५. ७) यह वचन है। परंतु इसकी अपेक्षा अंतिम स्थान (अर्थात् ब्रह्मसूत्र ४. २. २१) औरभी अधिक निस्संदेह है। यह पहलेही, दसवें प्रकरणमें, बतलाया जा चुका है, कि देवयान और पितृयाण गतियोंमें क्रमानुसार उत्तरायणके छः महीने और दक्षिणायनके छः महीने होते हैं; और उनका अर्थ काल-प्रधान न करके बाद- रायणाचार्य कहते हैं, कि इन शब्दोंसे तत्कालाभिमानी देवता अभिप्रेत हैं (वे. सू. ४. ३. ४)। अब यह प्रश्न हो सकता है, कि दक्षिणायन और उत्तरायण शब्दोंका काल-वाचक अर्थ क्या कभी लियाही न जावे ? इसलिये "योगिनः प्रति च स्मर्यते" (ब्र. सू. ४. २. २१) अर्थात् ये काल "स्मृतियोंमें योगियोंके लिये विहित माने गये हैं" इस सूत्रका प्रयोग किया गया है; और गीतामें (गीता ८. २३) यह बात साफ़ साफ़ कह दी गई है, कि "यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः" - ये काल योगियोंको विहित हैं। इससे भाष्यकारोंके मतानुसार यही कहना पड़ता है, कि उक्त दोनों स्थानोंपर ब्रह्मसूत्रोंमें 'स्मृति' शब्दसे भगवद्गीताही विवक्षित है। परंतु जब यह मानते हैं, कि भगवद्गीतामें ब्रह्मसूत्रोंका स्पष्ट उल्लेख है; और ब्रह्मसूत्रोंमें 'स्मृति' शब्दसे भगवद्गीताका निर्देश किया गया है; तो दोनोंमें काल-दृष्टिसे विरोध उत्पन्न हो जाता है। क्योंकि भगवद्गीतामें ब्रह्मसूत्रोंका साफ़ साफ़ उल्लेख है, इसलिये ब्रह्मसूत्रोंका गीताके पहले रचा जाना निश्चित होता है, और ब्रह्मसूत्रोंमें 'स्मृति' शब्दसे गीताका निर्देश माना जाय तो गीताका ब्रह्मसूत्रोंके पहले होना निश्चित हुआ जाता है। ब्रह्मसूत्रोंका एक बार गीता पहले रचा जाना और दूसरी बार उन्हीं सूत्रोंका गीताके बाद रचा जाना संभव नहीं। अच्छा, अब यदि इस झगड़ेसे बचनेके लिये गीताके 'ब्रह्मसूत्रपदैः' शब्दसे शांकरभाष्यमें दिये हुए अर्थको स्वीकार करते हैं, तो 'हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः' इत्यादि पदोंका स्वारस्यही नष्ट हो जाता है; और यदि यह मानें, कि ब्रह्मसूत्रोंके 'स्मृति' शब्दसे गीताके अतिरिक्त कोई दूसरा स्मृति-ग्रंथ विवक्षित होगा; तो यह कहना पड़ेगा, कि सभी भाष्यकारोंने भूल की है। अच्छा; यदि उनकी भूल कहें; तोभी यह बतलाया नहीं जा सकता, कि
'स्मृति' शब्दसे कौन-सा ग्रंथ विवक्षित है; तब इस अड़चनसे कैसे पार पावें ? हमारे मतानुसार इस अड़चनसे बचनेका केवल एकही मार्ग है। यदि यह मान लिया जाय कि जिसने ब्रह्मसूत्रोंकी रचना की है, उसीने मूल भारत तथा गीताको वर्तमान स्वरूप दिया है, तो कोई अड़चन या विरोध नहीं रह जाता। ब्रह्मसूत्रोंको 'व्याससूत्र' कहनेकी रीति पड़ गई है; और "शेषत्वान्पुरुषार्थवादो यथान्येष्विति जैमिनि." (वे सू. ३. ४. २) इस सूत्रपर शांकरभाष्यकी टीकामें आनंदगिरिने लिखा है, कि जैमिनि वेदान्त-सूत्रकार व्यासजीके शिष्य थे; और अपने आरंभके मंगलाचरणमेंभी, 'श्रीमद्व्यासपयोनिधिर्निधिरसौ' इस प्रकार उन्होंने ब्रह्मसूत्रोंका वर्णन किया है। यह कथा वर्तमान महाभारतके आधारपर हम ऊपर बतला चुके हैं, कि महा- भारतकार व्यासजीके पैल, शुक, सुमन्तु, जैमिनि और वैशंपायन नामक पाँच शिष्य थे; और उनको व्यासजीने महाभारत पढ़ाया था। इन दोनों बातोंको मिला कर विचार करनेसे यही अनुमान होता है, कि मूल भारत और तदंतर्गत गीताको वर्तमान स्वरूप देनेका तथा ब्रह्मसूत्रोंकी रचना करनेका कामभी एक बादरायण व्यासजीनेही किया होगा। इस कथनका यह मतलब नहीं, कि बादरायणाचार्यने वर्तमान महाभारतकी नवीन रचना की। हमारे कथनका भावार्थ यह है :- महा- भारत ग्रंथके अति विस्तृत होनेके कारण संभव है, कि बादरायणाचार्यके समय उसके कुछ भाग इधर उधर बिखर गये हों या लुप्तभी हो गये हों; ऐसी अवस्थामे तत्कालीन उपलब्ध महाभारतके भागोंकी खोज करके तथा ग्रंथमें जहाँ जहाँ अपूर्णता, अशुद्धियाँ और त्रुटियाँ दीख पड़ीं, वहाँ वहाँ उनका संशोधन और उनकी पूर्ति करके, तथा अनुक्रमणिका आदि जोड़ कर बादरायणाचार्यने इस ग्रंथका पुनरुज्जीवन किया हो; अथवा उसे वर्तमान स्वरूप दिया हो। मराठी साहित्यमें यह बात प्रसिद्ध है, कि ज्ञानेश्वरी ग्रंथका ऐसाही संशोधन एकनाथ महाराजने किया था; और यह कथाभी प्रचलित है, कि एक बार संस्कृतका व्याकरण-महाभाष्य प्रायः लुप्त हो गया था और उसका पुनरुद्धार चंद्रशेखराचार्यको करना पड़ा। अब इस बातकीभी ठीक ठीक उपपत्ति लग जाती है, कि महाभारतके अन्य प्रकरणोंमे गीताके श्लोक क्यों पाये जाते हैं; तथा यह बातभी सहजही हल हो जाती है कि गीतामें ब्रह्मसूत्रोंका स्पष्ट उल्लेख और ब्रह्मसूत्रोंमें 'स्मृति' शब्दसे गीताका निर्देश क्यों किया गया है। जिस गीताके आधारपर वर्तमान गीता बनी है, वह बादरायणाचार्यके पहलेभी उपलब्ध थी, इसी कारण ब्रह्मसूत्रोमे 'स्मृति' शब्दसे उसका निर्देश किया गया; और महाभारतका संशोधन करते समय गीतामे * यह बतलाया गया, कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका विस्तारपूर्वक
- पिछले प्रकरणोंमें हमने यह बतलाया है, कि ब्रह्मसूत्र वेदान्तसंबंधी मुख्य ग्रंथ है, और इसी प्रकार गीता कर्मयोगविषयक प्रधान ग्रंथ है। अब यदि हमारा यह अनुमान सत्य हो, कि ब्रह्मसूत्र और गीताकी रचना अकेले व्यासजीनेही की है; तो इन दोनों शास्त्रोंका कर्त्ता उन्हीको मानना पड़ता है। हम यह बात अनुमानद्वारा
५३८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र विवेचन ब्रह्मसूत्रोंमे किया गया है। वर्तमान गीतामें ब्रह्मसूत्रोंका जो यह उल्लेख है, उसकी बराबरीकेही सूत्र-ग्रंथोंके अन्य उल्लेख वर्तमान महाभारतमेंभी हैं। उदाहरणार्थ, अनुशासनपर्वके अष्टावक्र आदि संवादमें “अनृताः स्त्रिय इत्येवं सूत्रकारो व्यवस्यति” (अनु. १९. ६) यह वाक्य है। इसी प्रकार शतपथ ब्राह्मण (शांति ३१८. ९६-७३) पचरात्र (शांति. ३३९. १०७), मनु. (अनु. ३७. १६) और यास्कके निरुक्तकाभी (शांति. ३४२. ७१) अन्यत्र साफ़ साफ़ उल्लेख किया गया है। परंतु गीताके समान महाभारतके सब भागोंको मुखाग्र करनेकी रीति नहीं थी; इसलिये यह शंका सहजही उत्पन्न होती है, कि गीताके अतिरिक्त महाभारतमें अन्य स्थानोंपर जो अन्य ग्रंथोंके उल्लेख हैं, वे काल-निर्णयार्थ कहाँ- तक विश्वसनीय माने जायें। क्योंकि, जो भाग मुखाग्र नहीं किये जाते, उनमें क्षेपक श्लोक मिला देना कोई कठिन बात नहीं। परंतु, हमारे मतानुसार, उपर्युक्त अन्य उल्लेखोंका यह बतलानेके लिये उपयोग करना कुछ अनुचित न होगा, कि वर्तमान गीतामें किया गया ब्रह्मसूत्रोंका उल्लेख केवल अकेला या अपूर्व अतएव अविश्वसनीय नहीं है। ऊपर सिद्धकर चुके हैं; परंतु कुंभकोणस्थ कृष्णाचार्यने, दाक्षिणात्य पाठके अनुसार, महाभारतकी जो एक पोथी हालहीमें प्रकाशित की है, उसमें शांतिपर्वके २१२ वें अध्यायमें (वार्ष्णेयाध्यात्म प्रकरणमें) प्रथम इस बातका वर्णन करते समय - कि युगके आरंभमें भिन्न भिन्न शास्त्र और इतिहास किस प्रकार निर्मित हुए - ३४ वाँ श्लोक इस प्रकार दिया है- वेदान्तकर्मयोगं च वेदविद् ब्रह्मविद्विभुः । द्वैपायनो निजग्राह शिल्पशास्त्रं भृगुः पुनः ॥ इस श्लोकमें 'वेदान्तकर्मयोग' एकवचनान्त पद है; परंतु उसका अर्थ 'वेदान्त और कर्मयोगही करना पड़ता है। अथवा यहभी प्रतीत होता है, कि 'वेदान्तं कर्मयोगं च' यही मूलपाठ होगा; और लिखते समय या छापते समय 'न्त'के ऊपरका अनुस्वार छूट गया हो। इस श्लोकमें यह साफ़ साफ़ कह दिया गया है, कि वेदान्त और कर्म- योग, दोनों शास्त्र व्यासजीको प्राप्त हुए थे; और शिल्पशास्त्र भृगुको मिला था। परंतु यह श्लोक बंबईके गणपत कृष्णाजीके छापाखानेसे प्रकाशित पोथीमें या कलकत्तेकी प्रतिमें नहीं मिलता। कुंभकोणकी पोथीका शांतिपर्वका २१२ वाँ अध्याय, बंबई और कलकत्ताकी प्रतिमें. २१० वाँ है। कुंभकोण पाठका यह श्लोक हमारे मित्र डॉक्टर गणेश कृष्ण गर्देने हमें सूचित किया, अतएव हम उनके कृतज्ञ हैं। उनके मता- नुसार इस स्थानपर कर्मयोग शब्दसे गीताही विवक्षित है; और इस श्लोकमें गीता और वेदान्त-सूत्रोंका (अर्थात् दोनोंका) कर्तृत्व व्यासजीकोही दिया गया है। महाभारतकी तीन पोथियोंमेंसे केवल एकही प्रतिमें ऐसा पाठ मिलता है, अतएव इसके विषयमें कुछ शंका उत्पन्न होती है। इस विषयमें चाहे जो कहा जाय; किंतु इस पाठसे इतना तो अवश्य सिद्ध हो जाता है, कि हमारा यह अनुमान, कि वेदान्त और कर्मयोगका कर्ता एकही है, कुछ नया या निराधार नहीं।
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५३९ 'ब्रह्मसूत्र पदैश्चैव' इत्यादि श्लोकके पदोंके अर्थ-स्वारस्यकी मीमांसा करके हम ऊपर इस बातका निर्णय कर चुके हैं, कि वर्तमान भगवद्गीतामें ब्रह्मसूत्रों या वेदान्त-सूत्रोंहीका उल्लेख किया गया है। परंतु भगवद्गीतामें ब्रह्मसूत्रोंका उल्लेख होनेका - और वहभी तेरहवें अध्यायमें अर्थात् क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारहीमें होनेका - हमारे मतमें एक और महत्त्वपूर्ण तथा दृढ़ कारण है। भगवद्गीतामें वासुदेव- भक्तिका तत्त्व यद्यपि मूल भागवत या पांचरात्र-धर्मसे लिया गया है, जैसा हम पिछले प्रकरणोंमें कह आये हैं, चतुर्व्यूह-पांचरात्र-धर्ममें वर्णित मूल जीव और मनकी उत्पत्तिके विषयका यह मत भगवद्गीताको मान्य नहीं है, कि वासुदेवसे संकर्षण अर्थात् जीव, संकर्षणसे प्रद्युम्न (मन) और प्रद्युम्नसे अनिरुद्ध (अहंकार) उत्पन्न हुआ। ब्रह्मसूत्रोंका यह सिद्धान्त है, कि जीवात्मा किसी अन्य वस्तुसे उत्पन्न नहीं हुआ है (वे. सू. २. ३. १७), और वह सनातन परमात्माहीका नित्य 'अंश' है (वे. सू० २. ३. ४३) । इसलिये ब्रह्मसूत्रोंके दूसरे अध्यायके दूसरे पादमें पहले कहा है, कि वासुदेवसे संकर्षणका होना अर्थात् भागवत-धर्मीय जीवसंबंधी उत्पत्ति संभव नहीं (वे. सू. २. २. ४२); और फिर यह कहा है, कि मन जीवकी एक इंद्रिय है इसलिये जीवसे प्रद्युम्नका (मन) होनाभी संभव नहीं (वे. सू. २. २. ४३) : क्योंकि लोकव्यवहारकी ओर देखनेसे तो यही बोध होता है, कि कर्त्ताहीमे कारण या साधन उत्पन्न नहीं होता। इस प्रकार बादरायणाचार्यने, भागवत धर्ममें वर्णित जीवकी उत्पत्तिका युक्तिपूर्वक खंडन किया है। संभव है, कि भागवत धर्मवाले इसपर यह उत्तर दें, कि हम वासुदेव (ईश्वर), संकर्षण (जीव), प्रद्युम्न (मन) तथा अनिरुद्धको (अहंकार) एकही समान ज्ञानी समझते हैं; और एकसे दूसरेकी उत्पत्तिको लाक्षणिक तथा गौण मानते हैं। परंतु ऐसा माननेसे कहना पड़ेगा, कि एक मुख्य परमेश्वरके बदले चार मुख्य परमेश्वर हैं, अतएव ब्रह्मसूत्रोंमें कहा है, कि यह उत्तरभी समर्पक नहीं है; और बादरायणाचार्यने अंतिम निर्णय यह किया है, कि यह मत - परमेश्वरसे जीवका उत्पन्न होना - वेदों अर्थात् उपनिषदोंके मतके विरुद्ध अतएव त्याज्य है (वे. सू. २. २. ४४, ४५)। यद्यपि यह बात सच है, कि भागवत धर्मका कर्मप्रधान भक्ति-तत्त्व भगवद्गीतामें लिया गया है, तथापि गीताका यहभी सिद्धान्त है, कि जीव वासुदेवसे उत्पन्न नहीं हुआ, किंतु वह नित्य परमात्माहीका 'अंश' है (गीता १५. ७)। जीवविषयक यह सिद्धान्त मूल भागवत धर्मसे नहीं लिया गया, इसलिये यह बतलाना आवश्यक था, कि इसका आधार क्या है। क्योंकि यदि ऐसा न किया जाता, तो संभव था, कि यह भ्रम उपस्थित हो जाता, कि चतुर्व्यूह भागवत धर्मके प्रवृत्ति-प्रधान भक्ति-तत्त्वके साथही साथ जीवकी उत्पत्ति- विषयक कल्पनासेभी गीता सहमत है। अतएव क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारमें जब जीवात्माका स्वरूप बतलानेका समय आया, तब अर्थात् गीताके तेरहवें अध्यायके आरंभहीमें यह स्पष्ट रूपसे कह देना पड़ा, कि "क्षेत्रज्ञके अर्थात् जीवके स्वरूपके संबंधमें हमारा
५४० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
मत भागवत धर्मके अनुसार नहीं; वरन् उपनिषदोंमे वर्णित ऋषियोके मतानुसार है; " और फिर उसके साथही साथ स्वभावतः यहभी कहना पड़ा है, कि भिन्न भिन्न ऋषियोंने भिन्न भिन्न उपनिषदोंमें पृथक् पृथक् उपपादन किया है, इसलिये उन सबकी ब्रह्मसूत्रोंमे की गई एकवाक्यता ही (वे. सू. २. ३. ४३) हमें ग्राह्य है। इस दृष्टिसे विचार करनेपर यही प्रतीत होगा, कि भागवत धर्मके भक्ति-मार्गका गीतामें इस रीतिसे समावेश किया गया है, जिससे वे आक्षेप दूर हो जायें, कि जो ब्रह्मसूत्रोंमे भाग- वत धर्मपर ला दिये गये हैं। रामानुजाचार्यने अपने वेदान्तसूत्र-भाष्यमे उक्त सूत्रोंके अर्थको बदल दिया है (वे. सू. रा. भा. २. २. ४२-४५)। परंतु हमारे मतमे अर्थ क्लिष्ट अतएव अग्राह्य हैं। थिब्रो साहबका झुकाव रामानुज-भाष्यमे दिये गये अर्थकी ओरही है; परंतु उनके लेखोमे तो यही ज्ञात होता है, कि इस बातका यथार्थ स्वरूप उनके ध्यानमे नही आया। महाभारतके शांतिपर्वके अंतिम भागमें नारायणीय अथवा भागवत धर्मका जो वर्णन है, उसमें यह नहीं कहा है, कि वासुदेवसे जीव अर्थात् संकर्षण हुआ; किंतु पहले यह बतलाया है, कि "जो वासुदेव है, वही (स एव) संकर्षण अर्थात् जीव या क्षेत्रज्ञ है" (मभा. शां. ३३४. २८, २९; ३३९. ३९, ४१); और इसके बाद संकर्षणसे प्रद्युम्न तककी केवल परंपरा दी गई है। एक स्थानपर तो यह साफ़ साफ़ कह दिया है, कि भागवत धर्मके कोई चतुर्व्यूह, कोई त्रिव्यूह, कोई द्विव्यूह और अंतमें कोई एकव्यूहभी मानते हैं (मभा. शां. ३४८. ५३)। परंतु भागवत धर्मके इन विविध पक्षोंको स्वीकार न कर, उनमेसे सिर्फ़ वही एक मत वर्तमान गीतामें स्थिर किया गया है, जिसका मेल क्षेत्रक्षेत्रज्ञके परस्पर-संबंधमे उपनिषदों और ब्रह्मसूत्रोंमे हो सके; और इस बातपर ध्यान देनेपर यह प्रश्न ठीक तौरसे हल हो जाता है, कि ब्रह्मसूत्रोंका उल्लेख गीतामे क्यों किया है ? अथवा यह कहनाभी अयुक्तिक नही, कि मूल गीतामे यह एक सुधारही किया गया है।
भाग - ४ भागवत धर्मका उदय और गीता
गीतारहस्यमे अनेक स्थानोंपर तथा इस प्रकरणमेंभी पहले यह बतला दिया गया है, कि उपनिषदोंके ब्रह्मज्ञान तथा कापिल-सांख्यके क्षर-अक्षर-विचारके साथ भक्ति और विशेषतः निष्काम कर्मका मेल करके कर्मयोगका शास्त्रीय रीतिसे पूर्ण- तया समर्थन करनाही गीता-ग्रंथका मुख्य प्रतिपाद्य विषय है। परंतु इतने विषयोंकी एकता करनेकी गीताकी पद्धति जिनके ध्यानमे पूरी तरह नही आ सकती, अथवा जिनका पहलेहीसे यह मत हो जाता है, कि इतने विषयोंकी एकता होही नहीं सकती; उन्हें इस बातका आभास हुआ करता है, कि गीताके बहुतेरे सिद्धान्त परस्परविरोधी हैं। उदाहरणार्थ, इन आक्षेपकोंका यह मत है, कि तेरहवे अध्यायका यह कथन कि - इस जगतमें जो कुछ है, वह सब निर्गुण ब्रह्म है, - सातवे अध्यायके इस कथनसे
गीता की बहिरंगपरीक्षा ५४१ बिलकुलही विरुद्ध है, कि यह सब सगुण वासुदेवही है । (गीता ७.१९) इसी प्रकार भगवान् एक जगह कहते हैं, कि "मुझे शत्रु और मित्र समान हैं" (गीता ९.२९); और दूसरे स्थानपरभी कहते हैं, कि "ज्ञानी तथा भक्तिमान् पुरुष मुझे अत्यन्त प्रिय हैं' (गीता ७.१७, १२.१९) - ये दोनों बातें परस्परविरोधी हैं। परन्तु हमने गीतारहस्यमें अनेक स्थानोंपर इस बातका स्पष्टीकरण कर दिया है, कि वस्तुतः ये विरोध नहीं हैं, किंतु एकही बातपर एक बार अध्यात्म-दृष्टिसे और दूसरी बार भक्तिकी दृष्टिसे विचार किया गया है, इसलिये यद्यपि दिखनेमें ये विरोधी बातें कहनी पड़ीं, तथापि अंतमें व्यापक तत्त्वज्ञानकी दृष्टिसे गीतामें उनका मेलभी कर दिया गया है। इसपरभी कुछ लोगोंका यह आक्षेप है, कि अव्यक्त ब्रह्म- ज्ञान और व्यक्त परमेश्वरकी भक्तिमें यद्यपि उक्त प्रकारसे मेल कर दिया गया है, तथापि मूल गीतामें इस मेलका होना संभव नहीं; क्योंकि मूल गीता वर्तमान गीताके समान परस्परविरोधी बातोंसे भरी नहीं थी, उसमें वेदान्तियोंने अथवा सांख्यशास्त्रा- भिमानियोंने अपने अपने शास्त्रोंके भाग पीछेसे घुसेड़ दिये हैं। उदाहरणार्थ, प्रो. गार्वेका कथन है, कि मूल गीतामें भक्तिका मेल केवल सांख्य तथा योगहीसे किया गया है, वेदान्तके साथ मीमांसकोंके कर्म-मार्गके साथ भक्तिका मेल कर देनेका काम किसीने पीछेसे किया है। मूल गीतामें इस प्रकार जो श्लोक पीछेसे जोड़े गये, उनकी, अपने मतानुसार एक तालिकाभी उसने जर्मन भाषामें अनुवादित अपनी गीताके अन्तमें दी है! हमारे मतानुसार ये सब कल्पनाएँ भ्रममूलक हैं। वैदिक धर्मके भिन्न भिन्न अंगोंकी ऐतिहासिक परंपरा और गीताके 'सांख्य' तथा 'योग' शब्दोंका सच्चा अर्थ ठीक ठीक न समझनेके कारण, और विशेषतः तत्त्वज्ञानविरहित अर्थात् केवल भक्तिप्रधान ईसाई धर्मत्रीका इतिहास उक्त लेखकों के (प्रो. गार्वे प्रभृति) सामने गड़ा रहनेके कारण, उक्त प्रकारके भ्रम उत्पन्न हो गये हैं। ईसाई धर्म पहले केवल भक्तिप्रधान था; और ग्रीक लोगोंके अथवा अन्य तत्त्वज्ञानमे उसका मेल करनेका कार्य पीछेसे किया गया है। परन्तु यह बात हमारे धर्मकी नहीं। हिंदुस्थानमें भक्ति-मार्गका उदय होनेके पहलेही मीमांसकोंका यज्ञ-मार्ग, उपनिषत्कारोंका ज्ञान तथा सांख्य और योग - इन सबको परिपक्व दशा प्राप्त हो चुकी थी। इसलिये पहलेहीसे हमारे देशवासियोंको स्वतंत्र रीतिसे प्रतिपादित ऐसा भक्ति-मार्ग कभीभी मान्य नहीं हो सकता था जो इन सब शास्त्रोंमें और विशेष करके उपनिषदोंमें वर्णित ब्रह्मज्ञानसे अलग हो। इन बातोंपर ध्यान देनेसे यह मानना पड़ता है कि गीताके धर्म-प्रतिपादनका स्वरूप पहलेहीसे प्रायः वर्तमान गीताके प्रतिपादनके सदृशही था। गीतारहस्यका विवेचनभी इसी बातकी ओर ध्यान देकर किया गया है, परन्तु यह विषय अत्यन्त महत्त्वका है, इसलिये संक्षेपमें यहांपर यह बतलाना चाहिये, कि गीता-धर्मके मूल स्वरूप तथा परंपराके संबंधमें ऐतिहासिक दृष्टिसे विचार करनेपर, हमारे मनमें कौन-कौन-सी बातें निष्पन्न होती हैं।
५४२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गीतारहस्यके दसवें प्रकरणमें इस बातका विवेचन किया गया है, कि वैदिक धर्मका अत्यंत प्राचीन स्वरूप न तो भक्ति-प्रधान, न तो ज्ञान-प्रधान और न योग- प्रधानभी था; किंतु वह यज्ञमय अर्थात् कर्म-प्रधान था, और वेदसंहिता तथा ब्राह्मणोंमें विशेषतः इसी यज्ञयाग आदि कर्म-प्रधान धर्मका प्रतिपादन किया गया है। आगे चल कर इसी धर्मका व्यवस्थित विवेचन जैमिनीके मीमांसा-सूत्रोंमें किया गया है। इसीलिये उसे 'मीमांसक-मार्ग' नाम प्राप्त हुआ। परंतु, यद्यपि 'मीमांसक' नाम नया है; तथापि इस विषयमें तो बिलकुलही संदेह नहीं, कि यज्ञयाग आदि धर्म अत्यंत प्राचीन है: इतनाही नहीं, तो उसे ऐतिहासिक दृष्टिसे वैदिक धर्मकी प्रथम सीढ़ी कह सकते हैं। 'मीमांसक-मार्ग' नाम प्राप्त होनेके पहले उसको त्रयी धर्म अर्थात् तीन वेदोंद्वारा प्रतिपादित धर्म कहते थे; और इसी नामका उल्लेख गीतामेंभी किया गया है (गीता ९.२०, २१)। कर्ममय त्रयी धर्मके इस प्रकार जोर- शोरसे प्रचलित रहनेपर, कर्मसे अर्थात् केवल यज्ञयाग आदिके बाह्य प्रयत्नसे परमेश्वरका ज्ञान कैसे हो सकता है? ज्ञान होना एक मानसिक स्थिति है; इसलिये परमेश्वरके स्वरूपका विचार किये बिना ज्ञान होना संभव नहीं, इत्यादि विषय और कल्पनाएं उपस्थित होने लगीं; और धीरे धीरे उन्हींमेंसे औपनिषदिक ज्ञानका प्रादुर्भाव हुआ। यह बात, छांदोग्य आदि उपनिषदोंके आरंभमें जो अवतरण दिये हैं, उनसे स्पष्ट मालूम हो जाती है। इस औपनिषदिक ब्रह्मज्ञानहीको आगे चलकर 'वेदान्त' नाम प्राप्त हुआ। परंतु, मीमांसा शब्दके समान यद्यपि वेदान्त नाम पीछेसे प्रचलित हुआ है, तथापि उससे यह नहीं कहा जा सकता, कि ब्रह्मज्ञान अथवा ज्ञान-मार्गभी नया है। यह सच है, कि कर्मकांडके अनंतरही ज्ञानकांड उत्पन्न हुआ ! परंतु स्मरण रहे, कि ये दोनों प्राचीन हैं। इस ज्ञान-मार्गहीकी दूसरी, किंतु स्वतंत्र शाखा 'कापिल-सांख्य' है। गीतारहस्यमें यह बतला दिया गया है, कि इधर ब्रह्मज्ञान अद्वैती है, तो उधर सांख्य है द्वैती, और सृष्टिकी उत्पत्तिके क्रमके संबंधमें सांख्योंके विचार मूलमें भिन्न हैं। परंतु औपनिषदिक अद्वैती ब्रह्मज्ञान तथा सांख्योंका द्वैती ज्ञान दोनों यद्यपि मूलमें भिन्न भिन्न हों, तथापि केवल ज्ञान-दृष्टिसे देखनेपर जान पड़ेगा, कि ये दोनों मार्ग अपने पहलेके यज्ञ-याग आदि कर्म-मार्गके एकहीसे विरोधी थे। अतएव यह प्रश्न स्वभावतः उत्पन्न हुआ, कि कर्मका ज्ञानसे किस प्रकार मेल किया जाय ? इसी कारणसे उपनिषत्- कालहीमें इस विषयपर दो दल हो गये थे। उनमेंसे बृहदारण्यकादि उपनिषद् तथा सांख्य यह कहने लगे, कि कर्म और ज्ञानमें नित्य विरोध है, इसलिये ज्ञान हो जानेपर कर्मका त्याग करना प्रशस्तही नहीं, किंतु आवश्यकभी है। इसके विरुद्ध ईशावास्यादि अन्य उपनिषद् यह प्रतिपादन करने लगे, कि ज्ञान हो जानेपरभी कर्म छोड़ा नहीं जा सकता, वैराग्यसे बुद्धिको निष्काम करके जगत्में व्यवहारकी सिद्धिके लिये ज्ञानी पुरुषको सब कर्म करनेही चाहिये। इन उपनिषदोंके
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५४३ भाष्योंमेंसे इस भेदको निकाल डालनेका प्रयत्न किया गया है। परंतु गीतारहस्यके ग्यारहवे प्रकरणके अंतमें किये गये विवेचनसे यह बात ध्यानमे आ जाएगी, कि शांकर-भाष्यमें ये साप्रदायिक अर्थ खीचातानीमे किये गये हैं, और इसलिये इन उपनिषदोंपर स्वतंत्र रीतिसे विचार करते समय वे अर्थ ग्राह्य नही माने जा सकते। यह नहीं कि, केवल यज्ञयागादि कर्म तथा ब्रह्मज्ञानहीमे मेल करनेका प्रयत्न किया गया हो; किंतु मैत्र्युपनिषदके विवेचनसे यह बातभी साफ़ साफ़ प्रकट होती है, कि कापिलसांख्यमे पहले पहल स्वतंत्र रीतिसे प्रादुर्भूत क्षराक्षरज्ञानकी तथा उप- निषदोंके ब्रह्मज्ञानकी एकवाक्यता - जितनी हो सकती थी - करनेकाभी प्रयत्न उसी समय आरंभ हुआ था। बृहदारण्यकादि प्राचीन उपनिषदोमे कापिल-सांख्यज्ञानको कुछ महत्त्व नहीं दिया गया है। परंतु मैत्र्युपनिषदमें सांख्योंकी परिभाषाका पूर्णतया स्वीकार करके यह कहा है, कि अंतमे एक परब्रह्महीमे सांख्योके चौबीस तत्त्व निर्मित हुए हैं। तथापि कापिल-सांख्यशास्त्रभी वैराग्य-प्रधान अर्थात् कर्मके विरुद्ध है। तात्पर्य यह है, कि प्राचीन कालमेंही वैदिक धर्मके तीन दल हो गये थे - ( १ ) केवल यज्ञयाग आदि कर्म करनेका मार्ग; ( २ ) ज्ञान तथा वैराग्यसे कर्म- संन्यास करना, अर्थात् ज्ञाननिष्ठा अथवा सांख्यमार्ग; और ( ३ ) ज्ञान तथा वैराग्य- बुद्धिहीसे नित्य कर्म करनेका मार्ग, अर्थात् ज्ञानकर्म-समुच्चय-मार्ग। इनमेंसे ज्ञानमार्ग- हीसे आगे चलकर दो अन्य शाखाएँ - योग और भक्ति - निर्मित हुई हैं। छांदो- ग्यादि प्राचीन उपनिषदोंमें यह कहा है, कि परब्रह्मका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये ब्रह्मचिंतन अत्यंत आवश्यक है; और यह चिंतन, मनन तथा ध्यान करनेके लिये चित्त एकाग्र होना चाहिये; और चित्तको स्थिर करनेके लिये परब्रह्मका कोई न कोई सगुण प्रतीक पहले नेत्रोके सामने रखना पड़ता है। इस प्रकार ब्रह्मोपासना करते रहनेसे चित्तकी जो एकाग्रता हो जाती है, उसीको आगे विशेष महत्त्व दिया जाने लगा और चित्तनिरोधरूपी योग एक जुदा मार्ग हो गया; और जब सगुण प्रतीकके बदले परमेश्वरके मानवरूपधारी व्यक्त प्रतीककी उपासनाका आरंभ धीरे धीरे होने लगा, तब अंतमे भक्ति-मार्ग उत्पन्न हुआ। यह भक्तिमार्ग औपनिषदिक ज्ञानसे अलग, बीचहीमे स्वतंत्र रीतिसे प्रादुर्भूत नहीं हुआ है; और न भक्तिकी कल्पना हिंदुस्थानमे किसी अन्य देशसे लाई गई है। सब उपनिषदोंका अवलोकन करनेसे यह क्रम दीख पड़ता है, कि पहले ब्रह्मचिंतनके लिये यज्ञके अंगोंकी अथवा ॐकारकी उपासना थी; आगे चलकर रुद्र, विष्णु आदि वैदिक देवताओंकी, अथवा आकाश आदि सगुण व्यक्त-ब्रह्म-प्रतीकोंकी, उपासनाका आरंभ हुआ; और अंतमें इसी हेतुसे अर्थात् ब्रह्मप्राप्तिके लियेही राम, नृसिंह, श्रीकृष्ण, वासुदेव आदिकी भक्ति, अर्थात् एक प्रकारकी उपासना, जारी हुई है। उपनिषदोंकी भाषामे यह बातभी साफ़ साफ़ मालूम होती है, कि उनमेंसे योगतत्त्वादि योग- विषयक उपनिषद् अथवा नृसिंहतापनी, रामतापनी आदि भक्तिविषयक उपनिषद्
५४४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
छांदोग्यादिकी अपेक्षा अर्वाचीन है। अतएव ऐतिहासिक दृष्टिसे यह कहना पड़ता है, कि छांदोग्यादि प्राचीन उपनिषदोंमे वर्णित कर्म, ज्ञान अथवा संन्यास, और ज्ञानकर्म-समुच्चय - इन तीनों दलोंका प्रादुर्भाव हो जानेपरही आगे योग-मार्ग और भक्ति-मार्गको श्रेष्ठता प्राप्त हुई है। परंतु योग और भक्ति, ये दोनों साधन यद्यपि उक्त प्रकारसे आगे श्रेष्ठ माने गये तथापि उनके पहलेके ब्रह्मज्ञानकी श्रेष्ठता उसमें कुछ कम नहीं हुई; और न उसका कम होना संभवही था। इसी कारण योग-प्रधान अथवा भक्ति-प्रधान उपनिषदोंमेंभी ब्रह्मज्ञानको भक्ति और योगका अंतिम साध्य कहा है। और ऐसा वर्णनभी कई स्थानोंमें पाया जाता है, कि जिन रुद्र, विष्णु, अच्युत, नारायण तथा वासुदेव आदिकी भक्ति की जाती है, वेभी परमात्माके अथवा परब्रह्मके रूप हैं (मैत्र्यु. ७. ७; रामपू. १६; अमृतबिंदु २२ आदि)। सारांश वैदिक धर्ममें समय समयपर आत्मज्ञानी पुरुषोंने जिन धर्मांगोंको प्रवृत्त किया है, वे प्राचीन समयमे प्रचलित धर्मांगोंसेही प्रादुर्भूत हुए हैं; और नये धर्मांगोंका प्राचीन समयमें प्रचलित धर्मांगोंके साथ मेल करा देनाही वैदिक धर्मकी उन्नतिको पहलेसे मुख्य उद्देश्य रहा है, तथा भिन्न भिन्न धर्मांगोंकी एकवाक्यता करनेके इसी उद्देश्यको स्वीकार करके, आगे चलकर स्मृतिकारोंने आश्रमव्यवस्था-धर्मका प्रतिपादन किया है। भिन्न भिन्न धर्मांगोंकी एकवाक्यता करनेकी इस प्राचीन पद्धतिपर ध्यान दिया जाता है तब यह कहना सयुक्तिक नहीं प्रतीत होता, कि उक्त पूर्वापर पद्धतिको छोड़ केवल गीता-धर्मही अकेला प्रवृत्त हुआ होगा। ब्राह्मण-ग्रंथोंके यज्ञ-यागादि कर्म, उपनिषदोंका ब्रह्मज्ञान, कपिल-सांख्य, चित्त- निरोधस्पी योग तथा भक्ति, यही वैदिक धर्मके मुख्य मुख्य अंग हैं, और इनकी उत्पत्तिके क्रमका सामान्य इतिहास ऊपर लिखा गया है। अब इस बातका विचार किया जाएगा, कि गीतामें इन सब धर्मांगोंका जो प्रतिपादन किया गया है, उसका मूल क्या है? - अर्थात् वह प्रतिपादन साक्षात् भिन्न भिन्न उपनिषदोंसे गीतामें लिया गया है अथवा बीचमें एक-आध सीढ़ी और है। केवल ब्रह्मज्ञानके विवेचनके समय कठ आदि उपनिषदोंके कुछ श्लोक गीतामें ज्यों-के-त्यों दिये गये हैं; और ज्ञान- कर्म-समुच्चय-पक्षका प्रतिपादन करते समय जनक आदिके औपनिषदिक उदाहरणभी दिये गये हैं। इससे प्रतीत होता है, कि गीता-ग्रंथ साक्षात् उपनिषदोंके आधारपर रचा गया होगा। परंतु गीताहीमे गीता-धर्मकी जो परंपरा दी गई है, उसमें तो उपनिषदोंका कहींभी उल्लेख नहीं मिलता। जिस प्रकार गीतामें द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा ज्ञानमय यज्ञको श्रेष्ठ माना है (गीता ४ ३३), उसी प्रकार छांदोग्योप- निषदमेभी एक स्थानपर यह कहा है, कि मनुष्यका जीवन एक प्रकारका यज्ञही है (छां. ३. १६, १७)। और इस प्रकारके यज्ञकी महत्ताका वर्णन करते हुए यहभी कहा है, कि "यह यज्ञ-विद्या घोर आंगिरस नामक ऋषिने देवकीपुत्र कृष्णको बतलाई।" उस देवकीपुत्र कृष्ण तथा गीताके श्रीकृष्णको एकही व्यक्ति माननेके
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५४५ लिये कोई प्रमाण नहीं है। परंतु यदि कुछ देरके लिए दोनोंको एकही व्यक्ति लें; तोभी स्मरण रहे, कि ज्ञान-यज्ञको श्रेष्ठ माननेवाली गीतामें घोर आंगिरसका कहींभी उल्लेख नहीं किया गया है। इसके सिवा, बृहदारण्यकोपनिषदमे यह बात प्रकट है, कि जनकका मार्ग यद्यपि ज्ञान-कर्म-समुच्चयात्मक था, तथापि उस समय इस मार्गमें भक्तिका समावेश नहीं किया गया था। अतएव भक्तियुक्त ज्ञान-कर्म- समुच्चय पंथकी सांप्रदायिक परंपरामे जनककी गणना नही की जा सकती, और न वह गीतामें की गई है। गीताके चौथे अध्यायके आरंभमें कहा है (गीता ४. १-३), कि युगके आरंभमें भगवानने पहले विवस्वानको, विवस्वानने मनुको और मनुने इक्ष्वाकुको गीता-धर्मका उपदेश किया था; परंतु कालके हेरफेरसे उसका लोप हो जानेके कारण वह फिरसे अर्जुनको बतलाना पड़ा। गीता-धर्मकी परंपराका ज्ञान होनेके लिये ये श्लोक अत्यंत महत्त्वके हैं, परंतु टीकाकारोंने शब्दार्थ बतलानेके अतिरिक्त उनका विशेष रीतिसे स्पष्टीकरण नहीं किया है; और कदाचित् ऐसा करना उन्हे इष्टभी न रहा हो। क्योकि, यदि कहा जाय, कि गीता-धर्म मूलमें किसी एक विशिष्ट पंथका है; तो उससे अन्य धार्मिक पंथोंको कुछ-न-कुछ गौणता प्राप्त हो जाती है। परंतु हमने गीतारहस्यके आरंभमे तथा गीताके चौथे अध्यायके प्रथम दो श्लोकोंकी टीकामे प्रमाणसहित इस बातका स्पष्टीकरण कर दिया है, कि गीतामें वर्णित परंपराका मेल उस परंपराके साथ पूरा दीख पडता है, कि जो महाभारतान्तर्गत नारायणीयोपाख्यानमे वर्णित भागवत धर्मकी परंपरा में अंतिम त्रेतायुग-कालीन परंपरा है। भागवत धर्म तथा गीता-धर्मकी परंपराकी एकताको देखकर कहना पड़ता है कि गीता-ग्रंथ भागवत-धर्मीय है; और यदि इस विषयमें कुछ शंका हो, तो महाभारतमें दिये गये वैशंपायनके इस वाक्य - "गीतामें भागवत धर्मही बतलाया गया है" (मभा. शां. ३४६. १०) से वह दूर हो जाती है। इस प्रकार जब यह सिद्ध हो गया, कि गीता औपनिषदिक ज्ञानका अर्थात् वेदान्तका स्वतंत्र ग्रंथ नही है, उसमे भागवत धर्मका प्रतिपादन किया गया है; तब यह कहनेकी कोई आवश्यकता नही, कि भागवत धर्मसे अलग करके गीताकी जो चर्चा की जाएगी, वह अपूर्ण तथा भ्रममूलक होगी। अतएव, भागवत धर्म कब उत्पन्न हुआ और उसका मूल स्वरूप क्या था, इत्यादि प्रश्नोंके विषयमें जो बाते इस समय उपलब्ध हैं, उनकाभी विचार संक्षेपमें यहाँ किया जाना चाहिये। गीतारहस्यमें हम पहलेही कह चुके हैं, कि इस भागवतधर्मकेही नारायणीय, सात्वत, पांचरात्र-धर्म आदि अन्य नाम हैं। उपनिषत्कालके बाद और बुद्धके पहले जो वैदिक धर्म-ग्रंथ बने, उनमेंसे अधिकांश ग्रंथ लुप्त हो गये हैं, इस कारण भागवत धर्मपर वर्तमान समयमे जो ग्रंथ उपलब्ध हैं, उनमेंसे, गीताके अतिरिक्त, मुख्य ग्रंथ येही हैं - महाभारतान्तर्गत शांतिपर्वके अंतिम अठारह अध्यायोंमे निरूपित नारायणीयोपाख्यान (मभा. शां. गी. र. ३५
३३४-३५१). शाण्डिल्य-सूत्र, भागवत-पुराण, नारद-पांचरात्र, नारद-सूत्र, तथा रामानुजाचार्य आदिके ग्रंथ। इनमें रामानुजाचार्यके ग्रंथ तो प्रत्यक्षमें सांप्रदायिक दृष्टिसेही, अर्थात् भागवतधर्मके विशिष्टाद्वैत वेदान्तसे मेल करनेके लिये विक्रम संवत् १२३५ में (शालिवाहन शकके लगभग बारहवें शतकमे) लिखे गये हैं। अतएव भागवत धर्मका मूल-स्वरूप निश्चित करनेके लिये इन ग्रंथोंका सहारा नहीं लिया जा सकता; और यही बात मध्वादि के अन्य वैष्णव ग्रंथोंकीभी है। श्रीमद्भागवतपुराण इसके पहलेका है। परंतु इस पुराणके आरम्भमेंही यह कथा है (भाग. स्क. १ अ. ४, ५), कि जब व्यासजीने देखा, कि महाभारतमे, अत- एव गीतामेंभी, नैष्कर्म्य-प्रधान भागवत धर्मका जो निरूपण किया गया है, उसमे भक्तिका जैसा चाहिये वैसा वर्णन नहीं है; और "भक्तिके बिना केवल नैष्कर्म्य शोभा नहीं पाता", तब उनका मन कुछ उदास और अप्रसन्न हो गया; एवं अपने मनकी उस तलमलाहटको दूर करनेके लिये नारदजीकी सूचनासे उन्होंने भक्तिके माहात्म्यका प्रतिपादन करनेवाले भागवतपुराणकी रचना की। इस कथाका ऐतिहासिक दृष्टिसे विचार करनेपर दीख पड़ेगा, कि मूल भागवत धर्ममें अर्थात् भारतान्तर्गत भागवत धर्ममें नैष्कर्म्यको जो श्रेष्ठता दी गयी थी, वह जब समयके हेरफेरसे कम होने लगी; और उसके बदले जब भक्तिको प्रधानता दी जाने लगी, तब भागवत धर्मके इस दूसरे स्वरूपका (अर्थात् भक्तिप्रधान भागवत धर्मका) प्रतिपादन करनेके लिये यह भागवतपुराणरूपी मेवा पीछे तैयार किया गया है। नारदपंचरात्र-ग्रंथभी इसी प्रकार का अर्थात् केवल भक्ति-प्रधान है; और उसमे द्वादश-स्कंधोंके भागवतपुराणका तथा ब्रह्मवैवर्तपुराण, विष्णुपुराण, गीता और महाभारतका नामोल्लेख कर स्पष्ट निर्देश किया गया है (ना. प. २. ७. २८-३२; ३. १४. ३३; ४. ३. १५४)। इसलिये यह प्रकट है, कि भागवत धर्मके मूल-स्वरूपका निर्णय करनेके लिये इस ग्रंथकी योग्यता भागवत- पुराणसेभी कम दर्जेकी है। नारदसूत्र तथा शांडिल्य-सूत्र कदाचित् नारदपंचरात्र- सेभी कुछ प्राचीन हों; परंतु नारद-सूत्रमे व्यास और शुक (ना. सू ८३) का उल्लेख है, इसलिए वह भारत और भागवतके बादका है; और शांडिल्यसूत्रमें भगवद्गीताके श्लोक ही उद्धृत किये गये हैं (शा सू. ९. १५ और ८३)। अतएव यह सूत्र यद्यपि नारद-सूत्र (ना. सू ८३) से प्राचीनभी हो; तथापि उसमे संदेह नहीं, कि यह गीता और महाभारतके अनन्तर का है। अतएव, भागवत-धर्मके मूल तथा प्राचीन स्वरूपका निर्णय अंतमे भारतान्तर्गत नारायणीयाख्यानके आधारसेही करना पड़ता है। भागवतपुराण (भाग १. ३. २४) और नारद-पंचरात्र (ना पं. ४. ३ १५६-१५९; ४. ८ ८१) ग्रंथोमे बुद्धको विष्णुका अवतार कहा है। परंतु नारायणीयाख्यानमें वर्णित दशावतारोंमे बुद्धका समावेश नहीं किया गया है - पहला अवतार हंसका और आगे कृष्णके बाद एकदम कल्कि अवतार
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५४७ बतलाया है (महा. शा. ३३९. १००)। इससे यही सिद्ध होता है, कि नारा- यणीयाख्यान भागवतपुराणसे और नारद-पंचरात्रसे प्राचीन है। इस नारायणीया- ख्यानमे यह वर्णन है, कि नर तथा नारायण (जो परब्रह्महीके अवतार हैं) नामक दो ऋषियोंने नारायणीय अर्थात् भागवत धर्मको पहले पहल जारी किया और उनके कहनेसे जब नारद ऋषि श्वेतद्वीपको गये, तब वहाँ स्वयं भगवान्ने नारदको इस धर्मका प्रथम उपदेश किया। भगवान् जिस श्वेतद्वीपमें रहते हैं, वह क्षीर-समुद्रमें है; और क्षीर-समुद्र मेरुपर्वतकी उत्तरमे है; इत्यादि नारायणी- याख्यानकी बाते प्राचीन और पौराणिक ब्रह्मांडवर्णनके अनुसारही हैं; और इस विषयमें हमारे यहाँ किसीको कुछ कहनाभी नहीं है। परंतु वेवर नामक पश्चिमी संस्कृतज्ञ पंडितने इसी कथाका विपर्यास करके यह दीर्घ शंका की थी, कि भागवत धर्ममें वर्णित भक्ति-तत्त्व श्वेतद्वीपसे-अर्थात् हिंदुस्थानके बाहरके किसी अन्य देशसे-हिंदुस्थानमें लाया गया है; और भक्तिका यह तत्त्व इस समय ईसाई धर्मके अतिरिक्त और कहींभी प्रचलित नहीं था; इसलिए ईसाई देशोंसेही भक्तिकी कल्पना भागवत धर्मियोंको सूझी है! परंतु पाणिनीको वासुदेव-भक्तिका तत्त्व मालूम था; और बौद्ध तथा जैन धर्ममेंभी भागवतधर्म तथा भक्तिके उल्लेख पाये जाते हैं; एवं यह बातभी निर्विवाद है, कि पाणिनी और बुद्ध दोनों ईसाके पहले हुए थे। इसलिये अब पश्चिमी पंडितोंनेभी निश्चित किया है कि वेबर साहबकी उपर्युक्त शंका निराधार है। ऊपर यह बतला दिया गया है, कि भक्तिरूप धर्मका उदय हमारे यहाँ ज्ञान-प्रधान उपनिषदोंके अनंतर हुआ है। इससे यह बात निर्विवाद प्रकट होती है, कि ज्ञान-प्रधान उपनिषदोंके बाद तथा बुद्धके पहले वासुदेव- भक्तिसंबंधी भागवत धर्म उत्पन्न हुआ है। अब प्रश्न केवल इतनाही है, कि वह बुद्धके कितने शतक* पहले हुआ? अगले विवेचनमे यह बात ध्यानमे आ जाएगी, कि यद्यपि उक्त प्रश्नका पूर्णतया निश्चित उत्तर नहीं दिया जा सकता; तथापि स्थूल-दृष्टिसे उस कालका अंदाज करना कुछ असंभव नहीं है। गीता (गी. ४. २) में यह कहा है, कि श्रीकृष्णने जिस भागवत धर्मका उपदेश अर्जुनको किया है, उसका पहले लोप हो गया था। भागवत धर्मके तत्त्वज्ञानमें
- भक्तिमान् (पाली = भत्तिमा) शब्द थेरगाथा (श्लो. ३७०) में मिलता है; और एक जातकमेंभी भक्ति का उल्लेख किया गया है। इसके सिवा, प्रसिद्ध फ्रेंच पाली-पंडित सेनार्त (Senart) ने 'बौद्ध धर्मका मूल' इस विषयपर सन १९०९ में एक व्याख्यान दिया था, जिसमें स्पष्ट रूपसे यह प्रतिपादन किया है, कि भागवत धर्म बौद्ध धर्मके पहलेका है। "No one will claim to derive from Buddhism' Vishnuism or the Yoga. Assuredly, Buddhism is the borrower",... "To sum up, if there had not previously, existed a religion made up of the doctrines of Yoga, of Vishnuite legends, of devo- tion to Vishnu-Krishna, worshipped under the title of Bhagavata
५४८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र परमेश्वरको वासुदेव, जीवको संकर्षण, मनको प्रद्युम्न तथा अहंकारको अनिरुद्ध कहा है। इनमेंसे वासुदेव तो स्वयं श्रीकृष्णहीका नाम है; संकर्षण उनके ज्येष्ठ भ्राता बलरामका नाम है; तथा प्रद्युम्न और अनिरुद्ध श्रीकृष्णजीके पुत्र और पौत्रके नाम हैं। इसके सिवा इस धर्मका जो दूसरा नाम 'सात्वत' भी है, वह उस यादव-जातिका नाम है, जिसमें श्रीकृष्णजीने जन्म लिया था। इससे यह बात प्रकट होती है, कि जिस कुल तथा जातिमें श्रीकृष्णजीने जन्म लिया था, उसमें यह धर्म प्रचलित हो गया था; और तभी उन्होंने अपने प्रिय मित्र अर्जुनको उसका उपदेश किया होगा - और यही बात पौराणिक कथाओंमेंभी कही गई है। यहभी कथा प्रचलित है, कि श्रीकृष्णजीके साथही सात्वत जातिकाभी अंत हो गया। इस कारण श्रीकृष्णके बाद मान्वत जातिमें इस धर्मका प्रसार होनाभी संभव नहीं था। भागवतधर्मके भिन्न भिन्न नामोंके विषयमें इस प्रकारकी ऐतिहासिक उपपत्ति बतलाई जा सकती है, कि जिस धर्मको श्रीकृष्णजीने प्रवृत्त किया था, वह उनके पहले कदाचित् नारायणीय या पांचरात्र नामोंमें न्यूनाधिक अंशोंमें प्रचलित रहा होगा; और आगे सात्वत जातिमें उसका प्रसार होनेपर उसे 'सात्वत' नाम प्राप्त हुआ होगा। तदनंतर भगवान् श्रीकृष्ण तथा अर्जुनको नर-नारायणके अवतार मानकर लोग इस धर्मको 'भागवत धर्म' कहने लगे होंगे। इस विषयके संबंधमें यह माननेकी कोई आवश्यकता नहीं, कि तीन या चार भिन्न भिन्न श्रीकृष्ण हो चुके हैं; और उनमेंसे हर एकने इस धर्मका प्रचार करते समय अपनी ओरसे कुछ-न-कुछ सुधार करनेका प्रयत्न किया है - वस्तुतः ऐसा माननेके लिए कोई प्रमाणभी नहीं है। मूल धर्ममें न्यूनाधिक परिवर्तन हो जानेके कारणही यह कल्पना उत्पन्न हो गई है। बुद्ध, ईसा तथा मुहम्मद तो अपने अपने धर्मके स्वयं एकही एक संस्थापक हो गये हैं; और आगे उनके धर्मोंमें भले-बुरे अनेक परिवर्तनभी हो गये हैं। परंतु इससे कोई यह नहीं मानता, कि बुद्ध, ईसा या मुहम्मद अनेक हो गये। इसी प्रकार यदि मूल भागवत धर्मको आगे चलकर भिन्न भिन्न स्वरूप प्राप्त हो गये या श्रीकृष्णजीके विषयमें आगे भिन्न भिन्न कल्पनाएँ रूढ हो गईं, तो यह कैसे माना जा सकता है, कि उतनेही भिन्न Buddhism would not have come to birth at all." मेसर्सका यह लेख पूनेसे प्रकाशित होनेवाले The Indian Interpreter नामक मिशनरी त्रैमासिक पत्र अक्तूबर १९०९ और जनवरी १९१० के अंकोंमें प्रसिद्ध हुआ है; और ऊपर दिये गये वाक्य जनवरीके अंकके १३३ तथा १३८ पृष्ठों में हैं। डॉ. बुल्हरनेभी कहा है - The ancient Bhagavta, Satvata or Pancharatra sect devoted to the worship of Narayana and his defied teacher Krishna-Devakiputra dates from a period long anterior to the rise of Jainas the 8th Century B. C." -- Indian Antiquary Vol. XXIII. (1894), P. 248. इस विषयका अधिक विवेचन आगे चलकर इसी परिशिष्ट प्रकरणके छठें भागमें किया गया है।
भिन्न श्रीकृष्णभी हो गये ? हमारे मतानुसार ऐसा माननेके लिये कोई कारण नही है। कोईभी धर्म लीजिये, समयके हेरफेरमे उसका रूपान्तर हो जाना बिलकुल स्वाभाविक है, उसके लिये इस बातकी आवश्यकता नही, कि भिन्न भिन्न कृष्ण, बुद्ध या ईसा मसीह माने जावें।* कुछ लोग, और विशेषतः कुछ कुछ पश्चिमी तर्कज्ञानी - यह किया करते हैं, कि श्रीकृष्ण, यादव और पांडव, तथा भारतीय युद्ध आदि ऐतिहासिक घटनाएँ नहीं हैं, ये सब कल्पित कथाएँ हैं; और कुछ लोगोंके मतमें तो महाभारत अध्यात्म विषयका एक बृहत् रूपकही है। परंतु हमारे प्राचीन ग्रंथोंके प्रमाणोंको देखकर किसीभी निष्पक्षपाती मनुष्यको यह मानना पड़ेगा, कि उक्त शंकाएँ बिलकुल निराधार हैं। यह बात निर्विवाद है, कि इन कथाओंके मूलमे इतिहासहीका आधार है। सारांश, हमारा मत यह है, कि श्रीकृष्ण चार-पाँच नहीं हुए, वे केवल एकही ऐतिहासिक पुरुष थे। अब श्रीकृष्णजीके अवतार-कालपर विचार करते समय ग ब. चिंतामणराव वैद्यने यह प्रतिपादन किया है, कि श्रीकृष्ण, यादव, पांडव तथा भारतीय युद्धका एकही काल - अर्थात् कलियुगका आरंभ-काल न होकर पुराणगणनाके अनुसार उस कालसे अबतक पाँच हजारसेभी अधिक वर्ष बीत चुके हैं। और यही श्रीकृष्णजीके अवतारका यथार्थ काल है।† परंतु पांडवोंसे लगाकर शक-काल तकके राजाओंकी पुराणोंमें वर्णित पीढ़ियोंसे इस कालका मेल नहीं दीख पड़ता। अतएव भागवत तथा विष्णु-पुराणमे जो यह वचन है, कि “परीक्षित राजाके जन्मसे नंदके अभिषेकतक १११५ अथवा १०१५ वर्ष होते हैं”
- श्रीकृष्णके चरित्रमें पराक्रम, भक्ति और वेदान्तके अतिरिक्त गोपियोंकी रासक्रीड़ाका समावेश होता है; और ये बातें परस्पर-विरोधी हैं। इसलिये आजकल कुछ विद्वान् यह प्रतिपादन किया करते हैं, कि महाभारतका कृष्ण भिन्न, गीताका भिन्न और गोकुलका कन्हैयाभी भिन्न है। डॉ. भांडारकरने अपने वैष्णव, शैव आदि पंथ संबंधी अंग्रेजी ग्रंथमे इसी मतको स्वीकार किया है। परंतु हमारे मतमें यह ठीक नही है। यह बात नही, कि गोपियोंकी कथामे जो शृंगार-वर्णन है, वह बादमे न आया हो। परंतु केवल उतनेहीके लिये यह माननेकी कोई आवश्यकता नही, कि श्रीकृष्ण नामके कई भिन्न भिन्न पुरुष हो गये; और इसके लिये कल्पनाके सिवा कोई अन्य आधारभी नहीं है। इसके सिवा, यहभी नहीं, कि गोपियोंकी कथाका प्रचार पहले भागवत-कालहीमें हुआ हो; किंतु शककालके आरंभमें यानी विक्रम संवत् १३६ के लगभग अश्वघोष-विरचित 'बुद्धचरित' (४. १४) में और भास कविकृत 'बालचरित' नाटक (३ २) मेभी गोपियोंका उल्लेख किया गया है। अतएव इस विषयमे हमें डॉ. भांडारकरके कथनसे चिंतामणराव वैद्यका मत अधिक सयुक्तिक प्रतीत होता है। † रावबहादुर चिंतामणराव वैद्यका यह मत उनके महाभारतके टीकात्मक अंग्रेजी ग्रंथमें है। इसके सिवा इसी विषयपर आपने सन् १९१८ में डेक्कन कॉलिज एनिवर्सरीके समय जो व्याख्यान दिया था उसमेंभी इस बातका विवेचन किया था।
५५० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (भाग. १२. २. २६; विष्णु. ४. २४. ३२)। उसीके आधारपर विद्वानोंने अब यह निश्चित किया है, कि ईसाई सनके लगभग १४०० वर्ष पहले भारतीय युद्ध और पांडव हुए होंगे। अर्थात् श्रीकृष्णका अवतार-कालभी यही है, और इस कालको स्वीकारकर लेनेपर यह बात सिद्ध होती है, कि श्रीकृष्णने भागवत धर्मको, ईसासे लगभग १४०० वर्ष पहले, अथवा बुद्धसे ८०० वर्ष पहले-प्रचलित किया होगा। इसपर कुछ लोग यह आक्षेप करते हैं, कि श्रीकृष्ण तथा पांडवोंके ऐति- हासिक पुरुष होनेमें कोई संदेह नहीं, परंतु श्रीकृष्णके जीवन-चरित्रमें उनके अनेक रूपान्तर दीख पड़ते हैं-जैसे श्रीकृष्ण नामक एक क्षत्रिय योद्धाको पहले महापुरुषका पद प्राप्त हुआ, पश्चात् विष्णुका पद मिला और धीरे धीरे अन्तमें पूर्ण परब्रह्मका रूप ब्राह्मणोंने प्राप्त हो गया-इन सब अवस्थाओंमें आरंभसे अंततक बहुत-सा काल बीत चुका होगा, इसीलिये भागवत-धर्मके उदयका तथा भारतीय युद्धका एक-ही काल नहीं माना जा सकता। परंतु यह आक्षेप निरर्थक है। "किसे देव मानना चाहिये; और किसे नहीं मानना चाहिये" इस विषयपर आधुनिक तर्कज्ञोंकी समझमें तथा दो-चार हज़ार वर्ष पहलेके लोगोंकी समझ (गीता १०. ४१) में बड़ा अंतर हो गया है। श्रीकृष्णके पहलेही बने हुए उपनिषदोंमें यह सिद्धान्त किया गया है, कि ज्ञानी पुरुष स्वयं ब्रह्ममय हो जाता है (बृ. ४ ४. ६); और मैत्र्युपनिषदमें यह साफ़ साफ़ कह दिया है, कि रुद्र, विष्णु, अच्युत, नारायण ये सब ब्रह्मही हैं (मैत्र्यु. ७. ३)। फिर श्रीकृष्णको परब्रह्मत्व प्राप्त होनेके लिये अधिक समय लगनेका कारण क्या है? इतिहासकी ओर देखनेसे विश्वसनीय बौद्ध ग्रंथोंमेंभी यह बात दीख पड़ती है, कि स्वयं अपनेको 'ब्रह्मभूत' (सेलसुत्त १४; थेरगाथा ८३१) कहलाता था, उसके जीवनकालहीमें उसे देवके सदृश सन्मान दिया जाता था और उसके स्वर्गस्थ होनेके बाद शीघ्र ही उसे 'देवाधिदेव' वा अथवा वैदिक धर्मके परमात्माका स्वरूप प्राप्त हो गया था, और उसकी पूजाभी हो गई थी। यही बात ईसा मसीहकीभी है। यह बात सच है कि बुद्ध तथा ईसाके समान श्रीकृष्ण संन्यासी नहीं थे, और न भागवत धर्मही निर्वाण-प्रधान है। परंतु केवल इसी आधारपर, बौद्ध तथा ईसाई धर्मके मूल पुरुषोंके समान, भागवत धर्मप्रवर्तक श्रीकृष्णकोभी पहलेहीसे ब्रह्म अथवा देवका स्वरूप प्राप्त होनेमें किसी बाधाके उपस्थित होनेका कारण दीख नहीं पड़ता। इस प्रकार श्रीकृष्णका समय निश्चित कर लेनेपर, उसी कालको भागवत धर्मका उदयकाल माननाभी प्रशस्त तथा सयुक्तिक है, परंतु सामान्यतः पश्चिमी पंडित ऐसा करनेमें जो हिचकिचाते हैं, उसका कारण कुछ औरही है। इन पंडितोंमेंसे अधिकांशका अबतक यही मत है कि खुद ऋग्वेदकाही काल ईसाके पहले लगभग १२०० वर्ष या बहुत हुआ तो २००० वर्षोंसे अधिक प्राचीन नहीं है। अतएव उन्हें अपनी दृष्टिसे यह कहना असम्भव प्रतीत होता है कि भक्ति-प्रधान भागवत धर्म