भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 577

५३२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र लघिमा आदि अलौकिक सिद्धियां और शक्तियां प्राप्त होती हैं, तथा इसी समाधीमें अन्तमें ब्रह्मनिर्वाणरूप मोक्ष मिल जाता है। भगवद्गीतामेंभी पहले चित्तनिरोध करनेकी आवश्यकता (गीता ६. २०) बतलाई गई है। फिर कहा है, कि अभ्यास तथा वैराग्य इन दोनों साधनोंसे चित्तका निरोध करना चाहिये (गीता ६. ३५); और अन्तमें निर्विकल्प समाधि लगानेकी रीतिकी वर्णन करके, यह दिखलाया है, कि उसमें क्या सुख है। परन्तु केवल इतनेहीसे यह नहीं कहा जा सकेगा कि पातंजलयोग-मार्गसे भगवद्गीता सहमत है; अथवा पातंजल-सूत्र भगवद्गीतासे प्राचीन हैं। पातंजल- सूत्रोंकी नाईं भगवान्ने यह नहीं कहा है कि समाधि सिद्ध होनेके लिये नाक पकड़े पकड़े सारी आयु व्यतीत कर देनी चाहिये। कर्मयोगकी सिद्धिके लिये बुद्धिकी समता होनी चाहिये; और उस समताकी प्राप्तिके लिये केवल साधनरूपमें चित्तनिरोध तथा समाधिका वर्णन गीतामें किया गया है। ऐसी अवस्थामे यही कहना चाहिये, कि इस विषयमें पातंजल-सूत्रोंकी अपेक्षा श्वेताश्वतरोपनिषद् या कठोपनिषद्के साथ गीता अधिक मिलती-जुलती है। ध्यान-बिंदु, क्षुरिका और योगतत्त्व उपनिषदभी योगविषयकही हैं। परन्तु उनका मुख्य प्रतिपाद्य विषय केवल योग है, और उनमें सिर्फ योगहीकी महत्ताका वर्णन किया गया है, इसलिये केवल कर्मयोगको श्रेष्ठ माननेवाली गीतासे इन एकपक्षीय उपनिषदोंका मेल करना उचित नहीं, और न वह होही सकता है। थामसन साहेबने गीताका अंग्रेजीमें जो अनुवाद किया है, उसके उपोद्घातमें आप कहते हैं, कि गीताका कर्मयोग पातंजलयोगहीका एक रूपांतर है परन्तु यह बात असंभव है। इस विषयपर हमारा यही कथन है, कि गीताके 'योग' शब्दका ठीक ठीक अर्थ समझमें न आनेके कारण यह भ्रम उत्पन्न हुआ है। क्योंकि इधर गीताका कर्मयोग प्रवृत्ति-प्रधान है, तो उधर पातंजल-योग बिल्कुल उसके विरुद्ध अर्थात् निवृत्ति-प्रधान है। अतएव उनमेंसे एकका दूसरेसे प्रादुर्भूत होना कभी संभव नहीं; औरभी यह बात गीतामें कहीं नहीं गई है। इतनाही नहीं; यहभी कहा जा सकता है, कि योग शब्दका प्राचीन अर्थ 'कर्मयोग' था और संभव है, कि वही शब्द पातंजल-सूत्रोंके अनंतर केवल 'चित्तनिरोधरूपी योग' के अर्थमें प्रचलित हो गया हो। चाहे जो हो, यह निर्विवाद सिद्ध है कि प्राचीन समयमें जनक आदिने जिस निष्काम कर्माचरणके मार्गका अवलंबन किया था, उसीके सदृश गीताका योग अर्थात् कर्मयोगभी है; और वह मनु-इक्ष्वाकु आदि महानुभावोंकी परंपरासे चले हुए भागवत धर्ममें लिया गया है - वह कुछ पातंजलयोगसे उत्पन्न नहीं हुआ है। अबतक किये गये विवेचनसे यह बात समझमें आ जायगी, कि गीता-धर्म और उपनिषदोंमें किन किन बातोंकी विषमता और समानता है। इनमेंसे अधिकांश बातोंका विवेचन गीतारहस्यमें स्थान-स्थानपर किया जा चुका है। अतएव यहाँ संक्षेपमें यह बतलाया जाता है, कि यद्यपि गीतामें प्रतिपादित ब्रह्मज्ञान उपनिषदोंके आधारपरही बतलाया गया है, तथापि उपनिषदोंके अध्यात्मज्ञानकाही निरा अनुवाद