भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 578, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 578

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५३३ न कर, उसमें वासुदेव-भक्तिका और मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः-क्रमका अर्थात् अक्षर-ज्ञानकाभी समावेश किया गया है, और उस वैदिक कर्मयोग-धर्महीका प्रधानतासे प्रतिपादन किया गया है, जो सामान्य लोगोंके लिये आचरण करनेमें सुगम हो; एवं इस लोक साथ परलोकमें श्रेयस्कर हो। उपनिषदोंकी अपेक्षा गीतामें जो कुछ विशेषता है, वह यही है। अतएव ब्रह्मज्ञानके अतिरिक्त अन्य बातोंमेंभी संन्यास-प्रधान उपनिषदोंके तथा गीताका मेल करनेके लिये सांप्रदायिक दृष्टिसे गीताके अर्थकी खींचातानी करना उचित नहीं है। यह सच है, कि दोनोंमें अध्यात्म- ज्ञान एकही-सा है; परंतु – जैसा कि हमने गीतारहस्यके ग्यारहवें प्रकरणमें स्पष्ट दिखला दिया है – अध्यात्मज्ञानरूपी मस्तक एव भलेही हो, तोभी सांख्य तथा कर्मयोग वैदिक धर्म-पुरुषके दो समान बलवाले हाथ हैं; और इनमेंसे ईशावास्योप- निषद्के अनुसार, ज्ञानयुक्त कर्महीका प्रतिपादन मुक्त-कंठसे गीतामें किया गया है। भाग – ३ गीता और ब्रह्मसूत्र ज्ञान-प्रधान, भक्ति-प्रधान और योग-प्रधान उपनिषदोंके साथ भगवद्गीतामें जो सादृश्य और भेद हैं, उनका इस प्रकार विवेचन कर चुकनेपर यथार्थमें ब्रह्म-सूत्रों और गीताकी तुलना करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि, भिन्न भिन्न उपनिषदोंमें भिन्न भिन्न ऋषियोंके बतलाये हुए अध्यात्म-सिद्धान्तोंका नियमबद्ध विचार करनेके लियेही बादरायणाचार्यके ब्रह्मसूत्रोंकी रचना हुई है, इसलिये उनमें उपनिषदोंसे भिन्न भिन्न विचारोंका होना संभव नहीं। परंतु भगवद्गीताके तेरहवें अध्यायमें क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका विचार करते समय आरम्भमेंही ब्रह्मसूत्रोंका स्पष्ट उल्लेख इस प्रकार किया है :- ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् । ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका "अनेक प्रकारसे विविध छंदोंके द्वारा (अनेक) ऋषियोंने पृथक् पृथक् और हेतुयुक्त तथा पूर्ण निश्चयकारक ब्रह्मसूत्रपदोंमेंभी विवेचन किया है" (गीता १३. ४)। और यदि इन ब्रह्मसूत्रोंका तथा वर्तमान वेदान्त-सूत्रोंको एकही मान लें, तो कहना पड़ता है कि वर्तमान गीता वर्तमान वेदान्त-सूत्रोंके बाद बनी होगी। अतएव गीताका काल-निर्णय करनेकी दृष्टिसे इस बातका अवश्य विचार करना पड़ता है, कि ये ब्रह्मसूत्र कौनसे हैं। क्योंकि वर्तमान वेदान्त-सूत्रोंके अतिरिक्त ब्रह्मसूत्र नामक कोई दूसरा ग्रंथ नहीं पाया जाता, और न उसके विषयमें कहीं वर्णनही है।*

  • इस विषयका विचार स्वर्लोकवासी तेलंगने किया है। इसके सिवा सन् १८९५में इसी विषयपर प्रो. तुकाराम रामचन्द्र अमलनेरकर, बी. ए नेभी एक निबंध प्रकाशित किया है।