भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 579, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 579

और, यह कहना तो किसी प्रकार उचित नहीं जंचता, कि वर्तमान ब्रह्मसूत्रोंके बाद गीता बनी होगी। क्योंकि, गीताकी प्राचीनताके विषयमें परंपरागत समझ चली आ रही है। ऐसा प्रतीत होता है, कि प्रायः इसी कठिनाईको ध्यानमें लाकर शांकरभाष्यमें 'ब्रह्मसूत्रपदैः'का अर्थ "श्रुतियोंके अथवा उपनिषदोंके ब्रह्मप्रतिपादक वाक्य" किया गया है। परंतु, इसके विपरीत शांकरभाष्यके टीकाकार आनंदगिरि और रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य प्रभृति गीताके अन्यान्य भाष्यकार यह कहते हैं, कि यहाँ पर 'ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव' शब्दोंसे 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इन बादरायणाचार्यके ब्रह्मसूत्रोंकाही निर्देश किया गया है, और श्रीधरस्वामीको दोनों अर्थ अभिप्रेत हैं। अतएव इस श्लोकका मन्यार्थ हमें स्वतंत्र रीतिसेही निश्चित करना चाहिये। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ विचार "ऋषियोंने अनेक प्रकारसे पृथक्" कहा है; और इसके सिवा (चैव) "हेतुयुक्त और विनिश्चयात्मक ब्रह्मसूत्रपदोंनेभी" वही अर्थ कहा है; इस प्रकार 'चैव' (औरभी) पदसे इस बातका स्पष्टीकरण हो जाता है, कि इस श्लोकमें क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारके दो भिन्न भिन्न स्थानोंका उल्लेख किया गया है। ये दोनों स्थान केवल भिन्नही नहीं हैं, किंतु उनमेंसे पहला अर्थात् ऋषियोंका किया हुआ वर्णन "विविध छंदोंके द्वारा पृथक् पृथक् अर्थात् भिन्न भिन्न तथा अनेक प्रकारका" है; और उसका अनेक ऋषियों-द्वारा किया जाना 'ऋषिभि' से (इस बहुवचन तृतीयान्त पद) स्पष्ट हो जाता है; तथा ब्रह्मसूत्रपदोंका दूसरा "वर्णन हेतुयुक्त और निश्च- यात्मक" है, इस प्रकार इन दोनों वर्णनोंकी विशेष भिन्नताकाभी स्पष्टीकरण इसी श्लोकमें है। 'हेतुमत्' शब्द महाभारतमें कई स्थानोंपर पाया जाता है; और उसका अर्थ है- "नैयायिक पद्धतिसे कार्यकारणभाव बतलाकर किया हुआ प्रतिपादन"- उदाहरणार्थ, जनकके सन्मुख सुलभाका किया हुआ भाषण अथवा श्रीकृष्ण जब शिष्टाईके लिये कौरवोंकी सभामें गये, उस समय उनका किया हुआ भाषण लीजिये। महाभारतमेंही पहले भाषणको "हेतुमत् और अर्थवन्" (मभा. शां. ३२०. १९, १) और दूसरेको 'सहेतुक' (मभा उद्योग. १३१. २) कहा है। इससे प्रकट होता है, कि जिस प्रतिपादनमें साधक-बाधक प्रमाण बतलाकर अन्तमें कोईभी अनुमान निस्सन्देह सिद्ध किया जाता है, उसीको 'हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः' विशेषण लगाये जा सकते हैं. ये शब्द उपनिषदोंके ऐसे संकीर्ण प्रतिपादनको नहीं लगाये जा सकते, कि जो एक स्थानमें कुछ हो और दूसरे स्थानमें कुछ। अतएव "ऋषिभि बहुधा विविधैः पृथक्" और "हेतुमद्भिः विनिश्चितैः" पदोंके विशेषात्मक स्वारस्यको यदि स्थिर रखना हो, तो यही कहना पड़ेगा कि गीताके उक्त श्लोकमें "ऋषियों-द्वारा विविध छंदोंमें किये गये अनेक प्रकारके पृथक्" विवेचनोंसे भिन्न भिन्न उपनिषदोंके संकीर्ण और पृथक् वाक्यही अभिप्रेत हैं, तथा "हेतुयुक्त और विनिश्चयात्मक ब्रह्म- सूत्रपदों" से ब्रह्मसूत्र-ग्रंथका वह विवेचनही अभिप्रेत है, कि जिसमें साधक-बाधक प्रमाण दिखलाकर अंतिम सिद्धान्तोंका संदेहरहित निर्णय किया गया है। यहभी