श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 580, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंगीता की बहिरंगपरीक्षा ५३५ स्मरण रहे, कि उपनिषदोंके सब विचार इधर उधर बिखरे हुए हैं, अर्थात् अनेक ऋषियोंको जैसे सूझते गये, वैसेही वे कहे गये हैं, उनमें कोई विशेष पद्धति या क्रम नहीं है; अतएव उनकी एकवाक्यता किये बिना उपनिषदोंका भावार्थ ठीक ठीक समझमें नहीं आता । यही कारण है, कि उपनिषदोंके साथही साथ उस ग्रंथका अर्थात् वेदान्त-सूत्र '(ब्रह्मसूत्र) काभी उल्लेख कर देना आवश्यक था, जिसमें कार्यकारण- हेतु दिखला कर उनकी (अर्थात् विचारोंकी) एकवाक्यता की गई है। गीताके श्लोकोंका उक्त अर्थ करनेसे यह प्रकट हो जाता है, कि उपनिषद् और ब्रह्मसूत्र गीताके पहले बने हैं। उनमेंसे मुख्य मुख्य उपनिषदोंके विषयमें तो कुछभी मतभेद नहीं रह जाता; क्योंकि इन उपनिषदोंके श्लोकही गीतामें शब्दशः पाये जाते हैं। परंतु ब्रह्मसूत्रोंके विषयमें संदेह अवश्य किया जा सकता है, क्योंकि ब्रह्मसूत्रोंमें यद्यपि 'भगवद्गीता' शब्दका उल्लेख प्रत्यक्षमें नहीं किया गया है; तथापि भाष्यकार मानते हैं, कि कुछ सूत्रोंमें 'स्मृति' शब्दोंसे भगवद्गीताहीका निर्देश किया गया है। जिन ब्रह्मसूत्रोंमें शांकरभाष्यके अनुसार 'स्मृति' शब्दसे गीताहीका उल्लेख किया गया है, उनमेंसे नीचे दिये हुए सूत्र मुख्य हैं:– ब्रह्मसूत्र – अध्याय, पाद और सूत्र गीता – अध्याय और श्लोक १.२.६ स्मृतेश्च । गीता १८.६१ "ईश्वरः सर्वभूतानां ०" आदि श्लोक । १.३.२३ अपि च स्मर्यते । गीता १५.६. "न तद्भासयते सूर्यः" आदि । २.१.३६ उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च गीता १५.३ "न रूपमस्येह तथोपलभ्यते ०" आदि । २.३.४५ अपि च स्मर्यते । गीता १५.७. "ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः ०" आदि । ३.२.१७ दर्शयति चाथो अपि स्मर्यते । गीता १३.१२ "ज्ञेयं यत्तत् प्रवक्ष्यामि ०" आदि । ३.३.३१ अनियमः सर्वासामविरोधः गीता ८.३६ "शुक्लकृष्णे गती ह्येते ०" शब्दानुमानाभ्याम् आदि । ४.१.१० स्मरन्ति च । गीता ६.११ "शुचौ देशे ०" आदि । ४.२.२१ योगिनः प्रति च स्मर्यंते । गीता ८.२३ "यत्र काले त्वनावृत्तिमा- वृत्तिं चैव योगिनः ०" आदि । उपर्युक्त आठ स्थानोंमेंसे कुछ यदि संदिग्धभी माने जायें, तथापि, हमारे मतसे तो चौथे (ब्र. सू. २.३.४५) और आठवेंके (ब्र. सू. ४.२.२१) विषयमें कुछ संदेह नहीं है; और यह बातभी स्मरण रखने योग्य है, कि इस विषयमें, शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य और वल्लभाचार्य, इन चारों भाष्यकारोंका