भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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पृष्ठ 533

[Page-header] ४८८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र इनकी पूर्ति करनेके लिये अथवा स्पष्टीकरणार्थ यह प्रतिपादन किया जाने लगा, कि परमेश्वरहीने मनुष्यको सदसद्विवेकशक्ति दी है। परंतु अनुभवसे फिर यह अड़चन दीख पड़ने लगी, कि चोर और साह दोनोंकी सदसद्विवेकशक्ति एक समान नहीं रहती; तब इस मतका प्रचार होने लगा, कि परमेश्वरकी इच्छा नीतिशास्त्रकी नींव भलेही हो, परंतु उस ईश्वरी इच्छाके स्वरूपको जाननेके लिये केवल इसी बातका विचार करना चाहिये, कि अधिकांश लोगोंका अधिक सुख किसमें है — इसके सिवा परमेश्वरकी इच्छाको जाननेका अन्य कोई मार्ग नहीं है। पिंड-ब्रह्मांडकी रचना संबंधमें ईसाई लोगोंकी जो यह समझ है — कि बाइबलमें वर्णित सगुण परमेश्वरही संसारका कर्ता है; और यह उसकीही इच्छा या आज्ञा है, कि मनुष्य नीतिके नियमानुसार बर्ताव करे — उसी आधारपर उक्त सब मत प्रचलित हुए हैं। परंतु आधिभौतिक शास्त्रोंकी उन्नति तथा वृद्धि होनेपर जब मालूम होने लगा, कि ईसाई धर्म-पुस्तकोंमें पिंड-ब्रह्मांडकी रचनाके विषयमें कहे गये सिद्धान्त ठीक नहीं हैं, तब यह विचार एक ओर रखा गया, कि परमेश्वरके समान कोई सृष्टिका कर्ता है या नहीं; और यही विचार किया जाने लगा, कि नीतिशास्त्रकी इमारत प्रत्यक्ष दिखनेवाली बातोंकी नींव पर क्योंकर खड़ी की जा सकती है। तबसे फिर यह प्रति- पादन किया जाने लगा, कि अधिकांश लोगोंका अधिक सुख या कल्याण, अथवा मनुष्यत्वकी वृद्धि, येही दृश्य-तत्त्वके नीतिशास्त्रके मूल कारण हैं। इस प्रतिपादनमें इस बातकी किसी उपपत्ति या कारण का कोई उल्लेख नहीं किया गया है, कि कोई मनुष्य अधिकांश लोगोंका अधिक हित क्यों करे ? सिर्फ़ इतनाही कह दिया जाता है, कि यह मनुष्यकी नित्य बढ़नेवाली एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है। परंतु मनुष्यस्वभावमें स्वार्थ सरीखी औरभी दूसरी वृत्तियाँ दीख पड़ती हैं, इसलिये इस पंथमेंभी फिर मत- भेद होने लगे। नीतिमत्ताकी ये सब उपपत्तियाँ कुछ सर्वथा निर्दोष नहीं हैं। परंतु उक्त पंथके सभी पंडितोंमें "सृष्टिके दृश्य पदार्थोंसे परे सृष्टिकी जड़में कुछ-न-कुछ अव्यक्त तत्त्व अवश्य है", इस सिद्धान्तपर एकही-सा अविश्वास और अश्रद्धा है, इस कारण उनके विषय-प्रतिपादनमें चाहे कुछ अड़चनभी क्यों न हो; तोभी वे लोग केवल बाह्य और दृश्य तत्त्वोंसेही किसी तरह निर्वाह कर लेनेका हमेशा प्रयत्न किया करते हैं। नीति तो सभीको चाहिये; परंतु उक्त कथनसे मालूम हो जायगा, कि पिंड-ब्रह्मांडकी रचनाके संबंधमें भिन्न भिन्न मत होनेके कारण उन लोगोंकी नीतिशास्त्रविषयक उपपत्तियोंमें हमेशा कैसे भेद हो जाया करते हैं। इसी कारणसे पिंड-ब्रह्मांडकी रचनाके विषयमें आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक मतोंके अनुसार हमने तीसरे प्रकरणमें नीतिशास्त्रके प्रतिपादनके तीन भेद किये हैं; और आगे फिर प्रत्येक पंथके मुख्य मुख्य सिद्धान्तोंका भिन्न भिन्न विचार किया है। जिनका यह मत है, कि सगुण परमेश्वरने सर्व दृश्य सृष्टिको बनाया है, वे नीतिशास्त्रका केवल यहींतक विचार करते हैं, कि अपने अपने धर्म-ग्रंथोंमे परमेश्वरकी जो आज्ञाएँ