भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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मोक्ष-धर्मको क्षणभरके लिये एक ओर रखकर केवल कर्म-अकर्मकी परीक्षाके नैतिक तत्त्वकी दृष्टिसेभी जब 'साम्य-बुद्धि'ही श्रेष्ठ सिद्ध होती है; तब यहाँपर इस बातकाभी थोड़ा-सा विचार कर लेना चाहिये, कि गीताके आध्यात्मिक पक्षको छोड़कर नीतिशास्त्रोंमें अन्य पंथ कैसे और क्यों निर्माण हुए ? डाक्टर पाल कारस* नामक एक प्रसिद्ध अमेरिकन ग्रंथकार अपने नीतिशास्त्रविषयक ग्रंथमे इस प्रश्नका यह उत्तर देता है, कि “पिंड-ब्रह्मांडकी रचनाके संबंधमे मनुष्यकी जैसी समझ (राय) होती है, उसके अनुसार नीतिशास्त्रके मूल तत्त्वोंके संबंधमें उसके विचा- रोंका रंग बदलता रहता है। सच पूछो तो, पिंड-ब्रह्मांडकी रचनाके संबंधमें कुछ-न- कुछ निश्चित मत हुए बिना नैतिक प्रश्नही उपस्थित नहीं हो सकता। पिंड-ब्रह्मांडकी रचनाके संबंधमें कुछ पक्का मत न रहनेपरभी हम लोगोंसे कुछ नैतिक आचरण कदाचित् हो सकता है, परंतु यह आचरण स्वप्नावस्थाके व्यापारके समान होगा; इसलिये इसे नैतिक कहनेके बदले देहधर्मानुसार होनेवाली केवल एक कायिक क्रियाही कहना चाहिये।” उदाहरणार्थ, वाघिन अपने बच्चोंकी रक्षाके लिये प्राण देनेको तैयार हो जाती है; परंतु इसे हम उसका नैतिक आचरण न कहकर उसका जन्मसिद्ध स्वभावही कहते हैं। इस उत्तरसे इस बातका अच्छी तरह स्पष्टीकरण हो जाता है, कि नीतिशास्त्रके उपपादनमें अनेक पंथ क्यों हो गये हैं। इसमें कुछ संदेह नहीं, कि “मैं कौन हूँ, यह जगत् कैसे उत्पन्न हुआ, मेरा इस संसारमे क्या उपयोग हो सकता है?” इत्यादि गूढ़ प्रश्नोंका निर्णय जिस तत्त्वसे हो सकेगा, उसी तत्त्वके अनुसार प्रत्येक विचारवान् पुरुष अंतमें इस बातकाभी निर्णय अवश्य करेगा, कि मुझे अपने जीवन-कालमें अन्य लोगोंके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये। परंतु इन गूढ़ प्रश्नोंका उत्तर भिन्न भिन्न कालमें तथा भिन्न भिन्न देशोंमें एकही प्रकारका नहीं हो सकता। युरोप खंडमें प्रचलित इसाई धर्ममें यह वर्णन पाया जाता है, कि मनुष्य और सृष्टिका कर्ता बाइबलमें वर्णित सगुण परमेश्वर है; और उसीने पहले पहल संसारको उत्पन्न करके सदाचरणके नियम या आज्ञाएँ मनुष्योंको बता दी हैं; तथा आरंभमें ईसाई पंडितोंकाभी यही अभिप्राय था, कि बाइबलमें वर्णित पिंड-ब्रह्मांडकी इस कल्पनाके अनुसार बाइबलमें कहे गये नीतिनियमही नीतिशास्त्रके मूल तत्त्व हैं। फिर जब यह मालूम होने लगा, कि ये नियम व्यावहारिक दृष्टिसे अपूर्ण हैं, तब

  • See The Ethical Problem by Dr. Carus, 2nd Ed. p. lli. “Our proposition is that the leading principle in ethics must be derived from the Philosophical view back of it. The world-con- ception a man has, can alone give character to the principle in his ethics. Without any world-conception we can have no ethics (i. e ethics in the highest sense of the word). We may act morally like dreamers or somnambulists, but our ethics would in the case be a mere moral instinct without any rational insight into its raison d'etere.