भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 529

४८४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

नहीं दिया है, तथापि व्यवसायात्मक और वासनात्मक बुद्धिका ही मुख्य विचार करके उसने यह निश्चित किया है, कि ( १ ) किसी कर्मकी नैतिक योग्यता इस बाह्य फलपरसे नही ठहराई जानी चाहिये, कि उस कर्मद्वारा कितने मनुष्योंको सुख होगा, बल्कि उसको योग्यताका निर्णय यही देखकर करना चाहिये, कि कर्म करने- वाले मनुष्यको 'वासना' कहां तक शुद्ध है। ( २ ) मनुष्यकी इस वासनाको ( अर्थात् वासनात्मक बुद्धि ) तभी शुद्ध, पवित्र और स्वतंत्र समझना चाहिये, जब कि वह इंद्रियसुखोंमें लिप्त न रहकर सदैव शुद्ध ( व्यवसायात्मक ) बुद्धिकी आज्ञाके ( इस बुद्धि-द्वारा निश्चित कर्तव्य-अकर्तव्यके नियमोंके ) अनुसार चलने लगे। ( ३ ) इस प्रकार इंद्रियनिग्रह हो जाने पर जिसकी वासना शुद्ध हो गई हो, उस पुरुषके लिये किसी नीति-नियमादिके बंधनकी आवश्यकता नहीं रह जानी. ये नियम तो सामान्य मनुष्योंकेही लिये हैं। ( ४ ) इस प्रकारसे वासनाके शुद्ध हो जानेपर जो कुछ कर्म करनेको वह शुद्ध-वासना या बुद्धि कहा करती है, वह इसी विचारसे कहा जाता है कि " हमारे समानही यदि दूसरेभी करने लगें, तो परिणाम क्या होगा "; और ( ५ ) वासनाकी इस स्वतंत्रता और शुद्धताकी उपपत्तिका पता कर्म-सृष्टिको छोड़कर ब्रह्म-सृष्टिमें प्रवेश किये बिना नहीं चल सकता ! परंतु आत्मा और ब्रह्म- सृष्टिसंबंधी कांटके विचार कुछ अपूर्ण हैं, और ग्रीन यद्यपि कांटकाही अनुयायी है, तथापि उसने अपने 'नीतिशास्त्रके उपोद्घातमें' पहले यह सिद्ध किया है, कि बाह्य-सृष्टिका अर्थात् ब्रह्मांडका जो अगम्य तत्त्व है, वही आत्मस्वरूपसे पिंडमें अर्थात् मनुष्यदेहमें अंशतः प्रादुर्भूत हुआ है। इसके अनंतर उसने यह प्रतिपादन किया है,* कि मनुष्य-शरीरमें एक नित्य और स्वतंत्र तत्त्व है, अर्थात् आत्मा जिसमें यह उत्कट इच्छा होती है, कि सर्व भूतान्तर्गत अपने सामाजिक पूर्णस्वरूपको अवश्य पहुंच जाना चाहिये; और यही इच्छा मनुष्यको सदाचारकी ओर प्रवृत्त किया करती है। इसीमें मनुष्यका नित्य और चिरकालिक कल्याण है; तथा विषयसुख अनित्य है। सारांश यही दीख पड़ता है, यद्यपि कांट और ग्रीन, दोनोंकी दृष्टि आध्यात्मिक है, तथापि ग्रीन व्यवसायात्मका बुद्धिके व्यापारोंमेंही लिपटे नहीं रहा; किंतु उसने कर्म-अकर्म-विवेचनकी तथा वासना-स्वातंत्र्यकी उपपत्तिको पिंड और ब्रह्मांड दोनोंमें एकत्वसे व्यक्त होनेवाले शुद्ध आत्मस्वरूपतक पहुंचा दिया है। कांट और ग्रीन जैसे आध्यात्मिक पाश्चात्त्य नीतिशास्त्रज्ञोंके उक्त सिद्धांतोंकी और नीचे लिखे गये गीता-प्रतिपादित कुछ सिद्धांतोंकी तुलना करनेसे दीख पड़ेगा, कि यद्यपि वे दोनों अक्षरशः एक बराबर नहीं हैं, तथापि उनमें कुछ अद्भुत समता चौथा १८, ३८, ५५ और ११९ वें पृष्ठमें और पांचवां ७०-७३ तथा ८० वें पृष्ठमें पाठकोंको मिलेगा।

  • Green's Prolegomena to Ethics. §§ 99. 174-179 and 223-2.23.