श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपसंहार ४८३ सत्त्वशील अंतःकरणका धर्म है; वह केवल सार-असार-विचारका फल नहीं है। यह सिद्धान्त इस कथासे औरभी स्पष्ट हो जायगा। भारतीय युद्धके बाद युद्धिष्ठिरके राज्यासीन होनेपर जब कुंती अपने पुत्रोंके पराक्रममे कृतार्थ हो चुकी, और धृत- राष्ट्रके साथ वानप्रस्थाश्रमका आचरण करनेके लिये बनको जाने लगी, तब “तू अधिकांश लोगोंका कल्याण किया कर।” इत्यादि व्यर्थ बातें न कर उसने युधिष्ठिरसे सिर्फ़ यही कहा है, कि “मनस्ते महदस्तु च” (महा. अश्व. १७. २१)—“तू अपने मनको हमेशा विशाल बनाये रख।” जिन पश्चिमी पंडितोंने यह प्रतिपादन किया है, कि केवल “अधिकांश लोगोंका अधिक सुख किसमें है” यह देखनाही नीति- मत्ताकी सच्ची शास्त्रीय और सीधी कसौटी है। वे कदाचित् पहलेहीसे यह मान लेते हैं, कि उनके समानही अन्य सब लोग शुद्ध मनके हैं, और ऐसा समझकर वे अन्य सब लोगोंको यह बतलाते हैं, कि नीतिका निर्णय किस रीतिसे किया जावे। परंतु ये पंडित जिस बातको पहलेहीसे मान लेते हैं, वह सच नहीं हो सकती, इसलिये नीति- निर्णयका उनका नियम अपूर्ण और एकपक्षीय सिद्ध होता है। इतनाही नहीं; बल्कि उनके लेखोसे यह भ्रमकारक विचारभी उत्पन्न हो जाता है, कि मन, स्वभाव या शीलको यथार्थमें अधिकाधिक शुद्ध और पापभीरु बनानेका प्रयत्न करनेके बदले, यदि कोई नीतिमान् बननेके लिये अपने कर्मोंके बाह्य परिणामोंका हिसाब करना सीख ले, तो बस होगा; और फिर जिनकी स्वार्थ-बुद्धि नहीं छूटी हो, वे लोग धूर्त, मिथ्याचारी या ढोंगी (गीता ३. ६) बनकर सारे समाजकी हानिका कारण हो जाते हैं। इसलिये केवल नीतिमत्ताकी कसौटीकी दृष्टिसे देखें, तोभी कर्मोंके केवल बाह्य परिणामोंपर विचार करनेवाला मार्ग कृपण तथा अपूर्ण प्रतीत होता है। अतः हमारे निश्चयके अनुसार गीताका यही सिद्धान्त पश्चिमी आधिदैविक अथवा आधिभौतिक पक्षोंके मतोंकी अपेक्षा अधिक मार्मिक, व्यापक, युक्तिसंगत और निर्दोष है, कि बाह्य कर्मोंसे व्यक्त होनेवाली और संकटके समयमेंभी दृढ़ रहनेवाली साम्य-बुद्धिकाही सहारा इस काममें अर्थात् कर्मयोगमें लेना चाहिये; तथा, ज्ञानयुक्त निस्सीम शुद्ध-बुद्धि या शीलही सदाचरणकी सच्ची कसौटी है। नीतिशास्त्रसंबंधी आधिभौतिक और आधिदैविक ग्रंथोंको छोड़कर नीतिका विचार आध्यात्मिक-दृष्टिसे करनेवाले पश्चिमी पंडितोंके ग्रंथोंको यदि देखें, तो मालूम होगा, कि उनमेंभी नीतिमत्ताका निर्णय करनेके विषयमें गीताकेही सदृश कर्मकी अपेक्षा शुद्ध-बुद्धिकोही विशेष प्रधानता दी गई है। उदाहरणार्थ, प्रसिद्ध जर्मन तत्त्ववेत्ता कांटेके “नीतिके आध्यात्मिक मूल तत्त्व” तथा नीतिशास्त्रसंबंधी दूसरे ग्रंथोंको लीजिये। यद्यपि कांटने* सर्वभूतात्मैक्यका सिद्धान्त अपने ग्रंथोंमें
- Kant's Theory of Ethics, trans. by Abbott. 6th Ed. इस पुस्तक- में ये सब सिद्धान्त दिये गये हैं। पहला सिद्धान्त १०, १२. १६ और २४ वें पृष्ठमें; दूसरा ११२ और ११७ वें पृष्ठमें; तीसरा ३१, ५८, १२१ और २९० वें पृष्ठमें;