श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र होते । अतएव जबकि यह कह दिया जावे, कि "अंतःकरणमें सदा साम्य-बुद्धि जागृत रहनी चाहिये; " तब फिर यह बतलानेकी कोई आवश्यकता नहीं, कि अधिकांश लोगों या सब प्राणियोंके हितका सार-असार-विचार करो। पश्चिमी पंडितभी अब यह कहने लगे हैं, कि मानव-जातिके प्राणियोंके संबंधमें मनुष्यके जो कुछ कर्तव्य हैं, वे तो हैंही; परंतु मूक जानवरोंके संबंधमेंभी उसके कुछ कर्तव्य हैं, जिनका समावेश कार्य-अकार्य शास्त्रमें किया जाना चाहिये; और यदि इस व्यापक दृष्टिसे देखें तो मालूम होगा, कि "अधिकांश लोगोंका अधिक हित" की अपेक्षा 'सर्वभूतहित' शब्दही अधिक व्यापक और उपयुक्त है; तथा 'साम्य-बुद्धि'में इन सभीका समावेश हो जाता है। इसके विपरीत यदि ऐसा मान लें, कि किसीकी बुद्धि शुद्ध और सम नहीं है; तो वह इस बातका ठीक ठीक हिसाब भलेही कर ले, कि "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख" किसमें है; परंतु नीति-धर्मकी ओर उसकी प्रवृत्ति होना संभव नहीं है। क्योंकि किसी सत्कार्यकी ओर प्रवृत्ति होना शुद्ध मनका गुण या धर्म है; हिसाबी मनका नहीं। यदि कोई कहे, कि "हिसाब करनेवाले मनुष्यके स्वभाव या मनको देखनेकी तुम्हें कोई आवश्यकता नहीं है, तुम्हें केवल यही देखना चाहिये, कि उसका किया हुआ हिसाब सही है या नहीं; और उस हिसाबसे कर्तव्य-अकर्तव्यका निर्णय हो कर तुम्हारा काम चल जाता है या नहीं" - तो वहभी सच नहीं हो सकता। कारण यह है, कि सामान्यतः यह तो सभी जानते हैं कि सुखःदुःख किसे कहते हैं, तोभी सब प्रकारके सुखदुःखोंके तारतम्यका हिसाब करते समय पहले यह निश्चय कर लेना पड़ता है, कि किस प्रकारके सुखदुःखोंको कितना महत्व देना चाहिये। परंतु सुखदुःखोंकी इस प्रकार माप करनेके लिये उष्णतामापक यंत्रके समान कोई निश्चित बाह्य साधन न तो वर्तमान समयमें है; और न भविष्यमेंभी उसके मिल सकनेकी कुछ संभावना है। इसलिये सुखदुःखोंकी ठीक ठीक कीमत ठहरानेका काम याने उनके महत्त्व या योग्यताका निर्णय करनेका काम, प्रत्येक मनुष्यको अपने मनमेंही करना पड़ेगा। परंतु जिसके मनमें ऐसी आत्मौपम्य-बुद्धि पूर्ण रीतिसे जागृत नहीं हुई है, कि "जैसा मैं हूँ, वैसाही दूसराभी है;" उसे दूसरोंके सुखदुःखोंकी तीव्रताका स्पष्ट ज्ञान कभी नहीं हो सकता, इसलिये वह इन सुखदुःखोंकी सच्ची योग्यता कभी जानही नहीं सकेगा, और फिर तारतम्य-निर्णय करनेके लिये उसने सुखदुःखोंकी जो कीमत पहले ठहरा ली होगी, उसमें भूल हो जायगी; और अंतमें उनका किया सब हिसाबभी गलत हो जायगा। इसीलिये कहना पड़ता है, कि "अधिकांश लोगोंके अधिक सुखको देखना" इस वाक्यकी 'देखना' इस हिसाबी बाह्य क्रियाको अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिये; किंतु जिस आत्मौपम्य और निर्लोभ बुद्धिसे (अनेक) दूसरोंके सुखदुःखोंकी यथार्थ कीमत पहले ठहराई जाती है, वह सब प्राणियोंके विषयमें साम्यावस्थाको पहुँची हुई, शुद्ध-बुद्धिही नीतिमत्ताकी सच्ची जड़ है। स्मरण रहे, कि नीतिमत्ता निर्मम, शुद्ध, प्रेमी, सम या ( संक्षेपमें कहें तो )