श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपसंहार ४८१ जाना पड़ता है; और दूसरा आधिभौतिक पंथ है, कि जो इस बाह्य कसौटीके द्वाराही नीतिका निर्णय करनेके लिये कहता है, कि "अधिकांश लोगोंका अधिक हित किसमें है ?" परंतु ऊपर किये गये विवेचनसे यह स्पष्ट मालूम हो सकता है, कि ये दोनों पंथ शास्त्र-दृष्टिसे अपूर्ण तथा एकपक्षीय हैं। कारण यह है, कि सदसद्विवेकशक्ति कोई स्वतंत्र वस्तु या देवता नहीं; किंतु वह व्यवसायात्मका बुद्धिमेंही शामिल है, इसलिये प्रत्येक मनुष्यकी प्रकृति और स्वभावके अनुसार उसकी सदसद्विवेकबुद्धिभी सात्त्विक, राजस या तामस हुआ करती है। ऐसी अवस्थामें उसका कार्य-अकार्य निर्णय सदैव दोषरहित नहीं हो सकता; और यदि केवल "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख "किसमें है, इस बाह्य आधिभौतिक कसौटीपरही ध्यान देकर नीति- मत्ताका निर्णय करें; तो कर्म करनेवाले पुरुषकी बुद्धिका कुछभी विचार नहीं हो सकेगा; तब यदि कोई मनुष्य चोरी या व्यभिचार करे; और उसके बाह्य अनिष्ट- कारक परिणामोंको कम करनेके लिये या छिपानेके लिये पहलेहीसे सावधान होकर कुछ कुटिल प्रबंध कर ले; तो यही कहना पड़ेगा, कि उसका दुष्कृत्य आधिभौतिक नीति-दृष्टिसे उतना निंदनीय नहीं है। अतएव यह बात नहीं, कि केवल वैदिक धर्म- मेंही कायिक, वाचिक और मानसिक शुद्धताकी आवश्यकताका वर्णन किया गया हो (मनु. १२. ३-८; ९. २९); किंतु वाइबलमेंभी व्यभिचारको केवल कायिक पाप न मानकर, परस्त्रीकी ओर दूसरे पुरुषोंका देखना या परपुरुषकी ओर दूसरी स्त्रियोंका देखनाभी व्यभिचार माना गया है (मेथ्यू. ५. २८); और बौद्ध धर्ममें कायिक अर्थात् बाह्य शुद्धताके साथ साथ वाचिक और मानसिक शुद्धताकीभी आव- श्यकता बतलाई गई है (धम्मपद ९६, ३९१)। इसके सिवा ग्रीन साहबका यहभी कहना है, कि बाह्य-सुखकोही परम साध्य माननेसे मनुष्य मनुष्यमें और राष्ट्र-राष्ट्रमें उसे पानेके लिये प्रतिद्वंद्विता उत्पन्न हो जाती है; और कलहका होनाभी संभव है। क्योंकि बाह्य-सुखकी प्राप्तिके लिये जो बाह्य साधन आवश्यक है, वे प्रायः दूसरोंके सुखको कम किये बिना हमें नहीं मिल सकते। परंतु साम्य-बुद्धिके विषयमें ऐसा नहीं कह सकते। यह आंतरिक सुख आत्मवश है, अर्थात् यह किसी दूसरे मनुष्यके सुखमें बाधा न डालकर प्रत्येकको मिल सकता है। इतनाही नहीं; किंतु आत्मैक्यको पहचानकर सब प्राणियोंसे समताका व्यवहार करनाही जिसका स्वभाव बन जाता है वह गुप्त या प्रकट, किसी रीतिसेभी कोई दुष्कृत्य करही नहीं सकता; और फिर उसे यह बतलानेकी आवश्यकताभी नहीं रहती, कि "हमेशा यह देखते रहो, कि अधिकांश लोगोंका अधिक सुख किसमें है।" कारण यह है, कि कोईभी मनुष्य हो; वह सार-असार-विचारके बादही किसी कृत्यको किया करता है। यह बात नहीं, कि केवल नैतिक कर्मोंका निर्णय करनेके लियेही सार-असार-विचारकी आवश्यकता होती है। सार-असार-विचार करते समय यही महत्त्वका प्रश्न होता है, कि अंतःकरण कैसा होना चाहिये ? क्योंकि सब लोगोंके अंतःकरण एक समान नहीं गी. र. ३१