श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपसंहार ४८५ अवश्य है। देखिये, गीताके सिद्धान्त ये हैं- (१) बाह्य कर्मकी अपेक्षा कर्ताकी (वासनात्मक) बुद्धिही श्रेष्ठ है। (२) व्यवसायात्मक बुद्धि आत्मनिष्ठ होकर जब संदेहरहित तथा सम हो जाती है, तब फिर वासनात्मक बुद्धि आपही आप शुद्ध और पवित्र हो जाती है। (३) इस रीतिसे जिसकी बुद्धि सम और स्थिर हो जाती है, वह स्थितप्रज्ञ पुरुष हमेशा विधि और नियमोंसे परे रहा करता है। (४) और उसके आचरण या उसकी आत्मैक्य-बुद्धिसे सिद्ध होनेवाले नीति-नियम सामान्य पुरुषोंके लिये आदर्शके समान पूजनीय तथा प्रमाणभूत हो जाते हैं; और (५) पिंड अर्थात् देहमें तथा ब्रह्मांड अर्थात् सृष्टिमें एकही आत्मस्वरूपी तत्त्व है, देहान्त- गत आत्मा अपने शुद्ध और पूर्णस्वरूपको (मोक्ष) प्राप्त कर लेनेके लिये सदा उत्सुक रहता है, तथा इस शुद्ध-स्वरूपका ज्ञान हो जानेपर सब प्राणियोंके विषयमें आत्मौपम्य-दृष्टि प्राप्त हो जाती है। परंतु यह बात ध्यान देने योग्य है, कि ब्रह्म, आत्मा, माया, आत्मस्वातंत्र्य, ब्रह्मात्मैक्य, कर्मविपाक इत्यादि विषयोंपर हमारे वेदान्तशास्त्रके जो सिद्धान्त हैं, वे कांट और ग्रीनके सिद्धान्तोंसेभी बहुत आगे बढ़े हुए तथा अधिक निश्चित हैं; इसलिये उपनिषदन्तर्गत वेदान्तके आधारपर किया हुआ गीताका कर्मयोग-विवेचन आध्यात्मिक दृष्टिसे असंदिग्ध, पूर्ण तथा दोषरहित हुआ है; और आजकलके वेदान्ती जर्मन पंडित प्रोफेसर डायसनने नीति-विवेचनकी इसी पद्धतिको अपने 'अध्यात्मशास्त्रके मूल तत्त्व' नामक ग्रंथमें स्वीकार किया है। डायसन शोपेनहरका अनुयायी है; उसे शोपेनहरका यह सिद्धान्त पूर्णतया मान्य है, कि "संसारका मूल कारण वासनाही है, इसलिये उसका क्षय किये बिना दुःखकी निवृत्तिका होना असंभव है; अतएव वासनाका क्षय करनाही प्रत्येक मनुष्यका कर्तव्य है"; और इसी आध्यात्मिक सिद्धान्त-द्वारा आगे नीतिकी उपपत्तिका विवेचन उसने अपने उक्त ग्रंथके तीसरे भागमें स्पष्ट रीतिसे किया है। उसने पहले यह सिद्ध कर दिखलाया है, कि वासनाका क्षय होनेके लिये, या हो जानेपरभी, कर्मोंको छोड़ देनेकी आवश्यकता नहीं है; बल्कि "वासनाका पूरा क्षय हुआ है, कि नहीं" यह बात परोपकारार्थ किये गये निष्काम कर्मसे जैसे प्रकट होती है, वैसे अन्य किसीभी प्रकारसे व्यक्त नहीं होती, अतएव निष्काम कर्म वासना-क्षयकाही लक्षण और फल है। इसके बाद उसने यह प्रतिपादन किया है, कि वासनाकी निष्कामताही सदाचरण और नीतिमत्ताकाभी मूल है; और इसके अंतमें गीताका "तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर" (गीता ३. १९) यह श्लोक दिया है।* इससे मालूम होता है, कि डायसनको इस उपपत्तिका भान गीतासेही हुआ होगा। जो हो; यह बात कुछ कम गौरवकी नहीं, कि डायसन, ग्रीन, शोपेनहर और कांटके पूर्व - अधिक क्या कहें, आरिस्टॉटलकेभी सैकड़ों वर्ष पूर्वही ये विचार हमारे देशमें प्रचलित हो चुके थे। आजकल बहुतेरे लोगोंकी यह समझ हो रही है, कि वेदान्त केवल एक ऐसा बखेड़ा है, जो हमें इस संसारको छोड़ देने और मोक्षकी प्राप्ति करनेका उपदेश देता है, परंतु