श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
४५० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सम हो गई हो, उसे स्थितप्रज्ञ कहते हैं (गीता २. ५३); तब अर्जुनने पूछा, कि “महाराज ! कृपा कर बतलाइये, कि स्थितप्रज्ञका बर्ताव कैसा होता है?” इसलिये दूसरे अध्यायके अंतमें स्थितप्रज्ञका वर्णन किया गया है; और अंतमें कहा गया है, कि स्थितप्रज्ञकी स्थितिकोही ब्राह्मी स्थिति कहते हैं। सारांश यह है, कि अर्जुनको युद्धमें प्रवृत्त करनेके लिये गीतामें जो उपदेश दिया गया है, उसका प्रारंभ इन दो निष्ठाओंसे किया गया है, कि जिन्हें इस संसारके ज्ञानी मनुष्योंने ग्राह्य माना है; और जिन्हें ‘कर्म छोड़ना’ (सांख्य) और ‘कर्म करना’ (योग) कहते हैं; तथा युद्ध करनेकी आवश्यकताकी उपपत्ति पहले सांख्यनिष्ठाके अनुसार बतलाई गई है। परंतु जब यह देखा गया, कि इस उपपत्तिसे काम नहीं चलता, यह अधूरी है, तब फिर तुरंतही योग या कर्मयोग-मार्गके अनुसार ज्ञान बतलाना आरंभ किया है; और यह बतलानेके पश्चात्, कि इस कर्मयोगका अल्प आचरणभी कितना श्रेयस्कर है, दूसरे अध्यायमें भगवान्ने अपने उपदेशको इस स्थानतक पहुँचा दिया है, कि कर्मयोग-मार्गमें कर्मकी अपेक्षा वह बुद्धिही श्रेष्ठ मानी जाती है, जिससे कर्म करनेकी प्रेरणा हुआ करती है; तो अब स्थितप्रज्ञकी नाईं तू अपनी बुद्धिको सम करके अपना कर्म कर; जिससे तू कदापि पापका भागी न होगा। अब देखना है, कि आगे कौन-कौनसे प्रश्न उपस्थित होते हैं। गीताके सारे उपपादनकी जड़ दूसरे अध्यायमेही है, इसलिये इसके विषयका विवेचन यहाँ कुछ विस्तारसे किया गया है। तीसरे अध्यायके आरंभमे अर्जुनने प्रश्न किया है, कि “यदि कर्मयोग-मार्गमेंभी कर्मकी अपेक्षा बुद्धिही श्रेष्ठ मानी जाती है, तो मै अभी स्थितप्रज्ञकी नाई अपनी बुद्धि- को सम किये लेता हूँ, फिर आप मुझसे इस युद्धके समान घोर कर्म करनेके लिये क्यों कहते हैं?” इसका कारण यह है, कि कर्मकी अपेक्षा बुद्धिको श्रेष्ठ कह देनेसेही इन प्रश्नोंका निर्णय नहीं हो जाता, कि “युद्ध क्यों करें? बुद्धिको सम रखकर उदा- सीन क्यों न बैठे रहें?” बुद्धिको सम रखनेपरभी कर्म-संन्यास किया जा सकता है। फिर जिस मनुष्यकी बुद्धि सम हो गई है, उसे सांख्य-मार्गके अनुसार कर्मोंका त्याग करनेमे क्या हर्ज है? इस प्रश्नका उत्तर भगवान् इस प्रकार देते हैं, कि पहले तुझे सांख्य और योग नामक दो निष्ठाएं बतलाई हैं सही, परंतु यहभी स्मरण रहे, कि किसी मनुष्यके कर्मोंका सर्वथा छूट जाना असंभव है। जबतक वह देहधारी है, तबतक प्रकृति स्वभावतः उससे कर्म करावेगीही; और जब कि प्रकृतिके ये कर्म छूटतेही नहीं हैं, तब तो इंद्रियनिग्रहके द्वारा बुद्धिको स्थिर और सम करके केवल कर्मेंद्रियोंसेही अपने सब कर्तव्य-कर्मोंको करते रहना अधिक श्रेयस्कर है। इसलिये तू कर्म कर, यदि कर्म नहीं करेगा, तो तुझे खानेतकको न मिलेगा (गीता ३. ३-८)। ईश्वरनेही कर्मको उत्पन्न किया है; मनुष्यने नहीं। जिस समय ब्रह्म- देवने सृष्टि और प्रजाको उत्पन्न किया, उसी समय उसने ‘यज्ञ’कोभी उत्पन्न किया था; और उसने प्रजासे यह कह दिया था, कि यज्ञके द्वारा तुम अपनी समृद्धि कर
लो। जब कि ये यज्ञ बिना कर्म किये सिद्ध नहीं होते; तो अब यज्ञको कर्मही कहना चाहिये। इसलिये यह सिद्ध होता है, कि मनुष्य और कर्म साथही साथ उत्पन्न हुए हैं। परंतु ये कर्म केवल यज्ञके लियेही हैं; और यज्ञ करना मनुष्यका कर्तव्य है, इसलिये इन कर्मोंके फल मनुष्यको बंधनमें डालनेवाले नहीं होते। अब यह सच है, कि जो मनुष्य पूर्ण ज्ञानी हो गया, स्वयं उसके लिये कोईभी कर्तव्य शेष नहीं रहता; और न लोगोंमेंभी उसका कुछ अटका रहता है। परंतु इतनेहीसे यह सिद्ध नहीं हो जाता, कि कर्म मत करो। क्योंकि कर्म करनेसे किसीकोभी छुटकारा न मिलनेके कारण यही अनुमान करना पड़ता है, कि यदि स्वार्थके लिये न हो; तोभी अब उसी कर्मको निष्काम बुद्धिसे लोकसंग्रहके लिये अवश्य करना चाहिये (गीता ३. १७-१९)। इन्हीं बातोंपर ध्यान देकर प्राचीन कालमें जनक आदि ज्ञानी पुरुषोंने कर्म किये हैं; और मैंभी कर रहा हूँ। इसके अतिरिक्त यहभी स्मरण रहे, कि ज्ञानी पुरुषोंके कर्तव्योंमेंसेही एक मुख्य कर्तव्य है, 'लोकसंग्रह करना' अर्थात् अपने बर्तावसे लोगोंको सन्मार्गकी शिक्षा देना और उन्हें उन्नतिके मार्गमें लगा देना, ज्ञानी पुरुषहीका कर्तव्य है। मनुष्य कितनाही ज्ञानवान् क्यों न हो जावे; परंतु प्रकृतिके व्यवहारोंसे उसका छुटकारा नहीं है, इसलिये कर्म छोड़ना तो दूरही रहा; परंतु कर्तव्य समझकर स्वधर्मानुसार कर्म करते रहना और आवश्यकता होनेपर उसीमें मर जानाभी श्रेयस्कर है (गीता. ३. ३०-३५); - इस प्रकार तीसरे अध्यायमें भगवान्ने उपदेश दिया है। भगवान्ने इस प्रकार प्रकृतिको सब कामोंका कर्तृत्व दे दिया, यह देख अर्जुनने प्रश्न किया, कि मनुष्य, इच्छा न रहनेपरभी पाप, क्यों करता है ? तब भगवान्ने यह उत्तर देकर अध्याय समाप्त कर दिया है, कि काम-क्रोध आदि विकार बलात्कारसे मनको भ्रष्ट कर देते हैं; अतएव अपनी इंद्रियोंका निग्रह करके प्रत्येक मनुष्यको अपना मन अपने अधीन रखना चाहिये। सारांश, स्थितप्रज्ञकी नाईं बुद्धिकी समता हो जानेपरभी कर्मसे किसीका छुटकारा नहीं, अतएव यदि स्वार्थके लिये न हो, तोभी लोकसंग्रहके लिये निष्काम बुद्धिसे कर्म करतेही रहना चाहिये - इस प्रकार कर्मयोगकी आवश्यकता सिद्ध की गई है; और भक्ति-मार्गके परमेश्वरार्पणपूर्वक कर्म करनेके इस तत्त्वकाभी, " कि मुझे सब कर्म अर्पण कर " (गीता ३. ३०-३१) - इसी अध्यायमें प्रथम उल्लेख हो गया है। परंतु यह विवेचन तीसरे अध्यायमें पूरा नहीं हुआ; इसलिये चौथा अध्यायभी उसी विवेचनके लिये आरंभ किया गया है। किसीके मनमें यह शंका न आने पाये, कि अबतक किया गया प्रतिपादन केवल अर्जुनको युद्धमें प्रवृत्त करनेके लियेही नूतन रचा गया होगा, इसलिये चौथे अध्यायके आरंभमें इस कर्मयोगकी अर्थात् भागवत या नारायणीय धर्मकी त्रेतायुगवाली परंपरा बतलाई गई है। जब श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा, कि आदौ याने युगके आरंभमें मैंनेही यह कर्मयोग-मार्ग विवस्वान्को, विव- स्वान्ने मनुको और मनुने इक्ष्वाकुको बतलाया था, परंतु इस बीचमें यह नष्ट हो गया
४५२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र था; इसलिये मैंने वही योग (कर्मयोग-मार्ग) तुझे फिरसे बतलाया है। तब अर्जुनने पूछा, कि आप विवस्वानके पहले कैसे होगे ? इसका उत्तर देते हुए भगवानने बतलाया है, कि साधुओंकी रक्षा, दुष्टोंका नाश और धर्मकी संस्थापना करनाही मेरे अवतारोंका प्रयोजन है, एवं इस प्रकार लोकसंग्रहकारक कर्मोंको करते हुएभी उनमें मेरी कुछ आसक्ति नहीं है, इसलिये मैं उनके पापपुण्यादि फलोंका भागी नहीं होता । इस प्रकार कर्मयोगका समर्थन करके और यह उदाहरण देकर कि प्राचीन समयमें जनक आदिनेभी इसी तत्त्वको ध्यानमें लाकर कर्मोंका आचरण किया है; भगवानने अर्जुनको फिर यही उपदेश दिया है, कि "तूभी वैसेही कर्म कर।" तीसरे अध्यायमें मीमांसकोंका जो सिद्धान्त बतलाया गया था, कि "यज्ञके लिये किये गये कर्म बंधक नहीं होते" उसीको अब फिरसे बतलाकर 'यज्ञ'की विस्तृत और व्यापक व्याख्या इस प्रकारकी है-केवल तिल और चावलको जलाना अथवा पशुओंको मारना एक प्रकारका यज्ञ है सही; परंतु यह द्रव्यमय यज्ञ हलके दर्जेका है, और संयमाग्निमें कामक्रोधादि इंद्रिय-वृत्तियोंको जलाना अथवा 'न मम' कहकर सब कर्मोंको ब्रह्ममें स्वाहा कर देना ऊँचे दर्जेका यज्ञ है। इसलिये अब अर्जुनको ऐसा उपदेश किया है, कि तू इस ऊँचे दर्जेके यज्ञके लिये फलाशाका त्याग करके कर्म कर। क्योंकि मीमांसकोंके न्यायके अनुसार यज्ञार्थ किये गये कर्म यदि स्वतंत्र रीतिसे बंधक न हों, तोभी यज्ञका कुछ-न-कुछ फल बिना प्राप्त हुए नहीं रहता, इसलिये यज्ञभी यदि निष्काम बुद्धिसेही किया जावे, तो उसके लिये किया गया कर्म और स्वयं यज्ञ दोनों बंधक न होंगे। अंतमें कहा है, कि साम्य-बुद्धि उसे कहते हैं, जिससे यह ज्ञान हो जावे, कि सब प्राणी अपनेमें या भगवानमें हैं। जब ऐसा ज्ञान प्राप्त हो जाता है, तभी सब कर्म भस्म हो जाते हैं; और कर्ताको उनकी कुछ बाधा नहीं होती। "सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते" - सब कर्मोंका लय ज्ञानमें हो जाता है; कर्म स्वयं बंधक नहीं होते, बंध केवल अज्ञानसे उत्पन्न होता है। इसलिये अर्जुनको यह उपदेश देकर, इस अध्यायको पूरा किया गया है, कि अज्ञानको छोड़ कर्मयोगका आश्रय कर; और लड़ाईके लिये खड़ा हो जा। सारांश, इस अध्यायमें ज्ञानकी इस प्रकार प्रस्तावना की गई है, कि कर्मयोग-मार्गकी सिद्धिके लियेभी साम्य-बुद्धिरूप ज्ञानकी आवश्यकता है। कर्मयोगकी आवश्यकता क्या है या कर्म क्यों किये जावें ? इसके कारणोंका विचार तीसरे और चौथे अध्यायमें किया गया है सही; परंतु दूसरे अध्यायमें सांख्य- ज्ञानका वर्णन करके कर्मयोगके विवेचनमेंभी बारबार कर्मकी अपेक्षा बुद्धिही श्रेष्ठ बतलाई गयी है, इसलिये यह बतलाना अब अत्यंत आवश्यक है, कि इन दो मार्गोंमें कौन-सा मार्ग श्रेष्ठ है। क्योंकि यदि दोनों मार्ग एक-सी योग्यताके कहे जायें, तो परिणाम यह होगा, कि जिसे जो मार्ग अच्छा लगेगा वह उसीको अंगीकार कर लेगा, केवल कर्मयोगकोही स्वीकार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं रहेगी। अर्जुनके
गीताध्याय-संगति ४५३ मनमें यही शंका उत्पन्न हुई, इसलिये उसने पाँचवे अध्यायके आरंभमें भगवान्से पूछा है, कि “सांख्य और योग, इनदोनों निष्ठाओंको एकत्र करके मुझे उपदेश कीजिये, मुझे केवल इतनाही निश्चयात्मक बतला दीजिये, कि इन दोनोंमें श्रेष्ठ मार्ग कौन-सा है, जिससे कि मैं सहजही उसके अनुसार बर्ताव कर सकूँ।” इसपर भगवान्ने स्पष्ट रीतिसे यह कहकर अर्जुनका संदेह दूर कर दिया है, कि यद्यपि दोनों मार्ग निःश्रेयस्कर हैं, अर्थात् एक-सेही मोक्षप्रद हैं, तथापि उनमें कर्मयोगकी योग्यता अधिक है- “कर्मयोगो विशिष्यते” (गीता ५. २)। इसी सिद्धान्तको दृढ़ करनेके लिये भगवान् औरभी कहते हैं, कि संन्यास या सांख्यनिष्ठासे जो मोक्ष मिलता है, वही कर्मयोगसेभी मिलता है। इतनाही नहीं, परंतु कर्मयोगमें जो निष्काम बुद्धि बतलाई गई है, उसे बिना प्राप्त किये संन्यास सिद्ध नहीं होता; और जब वह प्राप्त हो जाती है, तब योग-मार्गसे कर्म करते रहनेपरभी ब्रह्म-प्राप्ति अवश्य हो जाती है। फिर यह झगड़ा करनेसे क्या लाभ है, कि सांख्य और योग भिन्न भिन्न हैं? यदि हम चलना, बोलना, देखना, सुनना, सूंघना इत्यादि सैकड़ों कर्मोंको छोड़ना चाहें, तोभी वे नहीं छूटते, इस दशामें कर्मोंको छोड़नेका हठ न कर उन्हें ब्रह्मार्पण बुद्धिसे करते रहनाही बुद्धिमत्ताका मार्ग है। इसलिये तत्त्वज्ञानी पुरुष निष्काम बुद्धिसे कर्म करते रहते हैं; और अंतमें उन्हींके द्वारा मोक्षकी प्राप्ति कर लिया करते हैं। ईश्वर तुमसे न यह कहता है, कि कर्म करो; और न यह कहता है, कि उनका त्याग कर दो ! यह तो सब प्रकृतिकी क्रीड़ा है; और बंधक मनका धर्म है, इसलिये जो मनुष्य सम-बुद्धिसे अथवा, 'सर्वभूतात्मभूतात्मा' होकर कर्म किया करता है, उसे उन कर्मोंकी बाधा नहीं होती। अधिक क्या कहें; इस अध्यायके अंतमें यहभी कहा है, कि जिसकी बुद्धि कुत्ता, चांडाल, ब्राह्मण, गौ, हाथी इत्यादिके प्रति सम हो जाती है, और जो सर्वभूतान्तर्गत आत्माकी एकताको पहचान कर अपने व्यवहार करने लगता है, उसे बैठे-बिठाये ब्रह्मानिर्वाणरूपी मोक्ष प्राप्त हो जाता है - मोक्ष- प्राप्तिके लिये उसे कहीं भटकना नहीं पड़ता; वह सदामुक्तही है। छठे अध्यायमें वही विषय आगे चल रहा है; और उसमें कर्मयोगकी सिद्धिके लिये आवश्यक सम-बुद्धिकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन है। पहलेही श्लोकमें भगवान्ने अपना मत स्पष्ट बतला दिया है, कि जो मनुष्य कर्मफलकी आशा न रख, केवल कर्तव्य समझकर सन्मार्गके प्राप्त कर्म करता रहता है, वही सच्चा योगी और सच्चा संन्यासी है; जो मनुष्य अग्निहोत्र आदि कर्मोंका त्यागकर चुपचाप बैठा रहे, वह सच्चा संन्यासी नहीं है। इसके बाद भगवान्ने आत्मस्वतंत्रताका इस प्रकार वर्णन किया है, कि कर्मयोग-मार्गमें बुद्धिको स्थिर करनेके लिये इन्द्रियनिग्रहरूपी जो कर्म करना पड़ता है, उसे स्वयं आपही करे; यदि कोई ऐसा न करे, तो किसी दूसरेपर उसका दोषारोपण नहीं किया जा सकता। इसके आगे इस अध्यायमें इंद्रियनिग्रह- रूपी योगकी साधनाका, पातंजलयोगकी दृष्टिसे, मुख्यतः वर्णन किया गया है।
४५४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र परंतु यम-नियम-आसन-प्राणायाम आदि साधनोंके द्वारा यद्यपि इंद्रियोंका निग्रह किया जावे, तोभी उतनेमेही काम नहीं चलता, इसलिये आत्मैक्यज्ञानकीभी आवश्यकताके विषयमें इसी अध्यायमें कहा गया है, कि आगे उस पुरुषकी वृत्ति "सर्वभूतस्थ- मात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि" अथवा "यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति" (गीता ६. २९, ३०) इस प्रकार सब प्राणियोंमें सम हो जानी चाहिये। इतनेमें अर्जुनने यह शंका उपस्थित की, कि यदि यह साम्यबुद्धिरूपी योग एक जन्ममें सिद्ध न हो, तो फिर दूसरे जन्ममेंभी आरंभहीमे उसका अभ्यास करना होगा - और फिरभी वही दशा होगी - और इस प्रकार यदि यह चक्र हमेशा चलताही रहे, तो मनुष्यको इस मार्गके द्वारा सद्गति प्राप्त होना असंभव है। इस शंकाका निवारण करनेके लिये भगवानने पहले यह कहा है, कि योगमार्गमें कुछभी व्यर्थ नहीं जाता। पहले जन्मके संस्कार शेष रह जाते हैं; और उनकी सहायतासे दूसरे जन्ममें अधिक अभ्यास होता है, तथा क्रम-क्रमसे अंतमे सिद्धि मिल जाती है। इतना कहकर भगवानने इस अध्यायके अंतमे अर्जुनको पुनः यह निश्चित और स्पष्ट उपदेश किया है, कि कर्मयोग-मार्गही श्रेष्ठ और क्रमशः सुसाध्य है, इसलिये केवल (अर्थात् फलाशाको न छोड़ते हुए) कर्म करना, तपश्चर्या करना, ज्ञानके द्वारा कर्मसंन्यास करना इत्यादि सब मार्गोंको छोड़ दे, और तू योगी हो जा - अर्थात् निष्काम कर्मयोग- मार्गका आचरण करने लग। कुछ लोगोंका मत है, कि यहाँ अर्थात् पहले छः अध्यायोंमें कर्मयोगका विवेचन पूरा हो गया और इसके आगे ज्ञान और भक्तिको 'स्वतंत्र' निष्ठा मानकर भगवानने उनका वर्णन किया है - अर्थात् ये दोनों निष्ठाएँ परस्पर निरपेक्ष या कर्मयोगकी बराबरी की, परंतु उससे पृथक् और उसके बदले विकल्पके नातेसे आचरणीय हैं। सातवे अध्यायसे बारहवें अध्यायतक भक्तिका और आगे शेष छः अध्यायोंमें ज्ञानका वर्णन किया गया है; और इस प्रकार अठारह अध्यायोंके विभाग करनेसे कर्म, भक्ति और ज्ञानमेसे प्रत्येकके हिस्सेमे छः छः अध्याय आते हैं; तथा गीताके समान भाग हो जाते हैं। परंतु यह मत ठीक नहीं है। पाँचवें अध्यायके आरंभके श्लोकोंसे स्पष्ट मालूम हो जाता है, कि जब अर्जुनकी मुख्य शंका यही थी, कि "मैं सांख्यनिष्ठाके अनुसार युद्ध करना छोड़ दूँ, या युद्धके भयंकर परिणामको प्रत्यक्ष दृष्टिके सामने देखते हुएभी युद्धही करूँ? और यदि युद्धही करना पड़े, तो उसके पापसे कैसे बचूँ?" - तब उसका समाधान ऐसे अधूरे और अनिश्चित उत्तरसे कभी होही न सकता था, कि "ज्ञानसे मोक्ष मिलता है; और वह कर्मसेभी प्राप्त हो जाता है; अथवा यदि तेरी इच्छा हो, तो भक्ति नामकी एक और तीसरी निष्ठाभी है।" इसके अतिरिक्त यह माननाभी ठीक न होगा, कि जब अर्जुन किसी एकही निश्चयात्मक मार्गको जानना चाहता है, तब सर्वज्ञ और चतुर श्रीकृष्ण उसके प्रश्नके मूल स्वरूपको छोड़कर उसे तीन स्वतंत्र और विकल्पात्मक मार्ग बतला दें। सच बात तो यह है,
गीताध्याय-संगति ४५५
कि गीतामें 'कर्मयोग' और 'संन्यास' इन्ही दो निष्ठाओंका विचार है (गीता ५. १); और यहभी साफ़ साफ़ बतला दिया है, कि इनमेंसे 'कर्मयोग'ही अधिक श्रेयस्कर है (गीता ५. २)। भक्तिकी तीसरी निष्ठा तो कही बतलाईभी नहीं गई है। अर्था यह कल्पना सांप्रदायिक टीकाकारोंकी मनगढंत है, कि ज्ञान, कर्म और भक्ति तीन स्वतंत्र निष्ठाएँ हैं; और उनकी यह समझ होनेके कारण, कि गीतामें केवल मोक्षके उपायोंकाही वर्णन किया गया है, उन्हें ये तीन निष्ठाएं कदाचित् भागवतमें सूझी हों (भाग. ११. २०. ६)। परंतु टीकाकारोंके ध्यानमें यह बात नही आई, कि भागवत-पुराण और भगवद्गीताका तात्पर्य एक नहीं है। यह सिद्धान्त भागवतकार कोभी मान्य है, कि केवल कर्मोंसे मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती, मोक्षके लिये ज्ञानकी आवश्यकता रहती है। परंतु इसके अतिरिक्त, भागवत-पुराणका यह भी कथन है, कि यद्यपि ज्ञान और नैष्कर्म्य मोक्षदायक हो, तथापि ये दोनों (अर्थात् गीता-प्रति- पादित निष्काम कर्मयोग) भक्तिके बिना शोभा नहीं देते - "नैष्कर्म्यमप्यच्युत- भाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरंजनम्" (भाग. १२. १२. ५२; १. २. १२)। इस प्रकार देखा जाय तो स्पष्ट प्रकट होता है, कि भागवतकार केवल भक्तिकोही सच्ची निष्ठा अर्थात् अंतिम मोक्षप्रद स्थिति मानते हैं। भागवतका न तो यह कहना है, कि भगवद्भक्तोंको ईश्वरार्पण बुद्धिसे कर्म करनाही नहीं चाहिये; और न यह कहना है, कि करनाही चाहिये। भागवत-पुराणका सिर्फ यह कहना है, कि निष्काम कर्म करो अथवा न करो - ये सब भक्तियोगकेही भिन्न भिन्न प्रकार हैं (भाग. ३. २९. ७-१९)। भक्तिके अभावमें सब कर्मयोग पुनः संसारमें अर्थात् जन्म-मृत्युके चक्करमें डालनेवाले हो जाते हैं (भाग. १. ५. ३४, ३५)। सारांश, यह है, कि भागवतकारका मार्ग विशेषतः भक्तिपरही होनेके कारण उन्होंने निष्काम कर्मयोग- कोभी भक्तियोगमेंही ढकेल दिया है; और यह प्रतिपादन किया है, कि अकेली भक्तिही सच्ची निष्ठा है ! परंतु भक्तिही कुछ गीताका मुख्य प्रतिपाद्य विषय नहीं है। इसलिये भागवतके उपर्युक्त सिद्धान्त या परिभाषाको गीतामें घुसेड़ देना वैसेही अयोग्य है, जैसे कि आममें शरीफेकी कलम लगाना। गीता इस बातको पूरी तरह मानती है, कि परमेश्वरके ज्ञानके सिवा और किसीभी अन्य उपायसे मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती, और इस ज्ञानकी प्राप्तिके लिये भक्ति एक सुगम मार्ग है, परंतु इसी मार्गके विषयमे आग्रह न कर गीता यहभी कहती है, कि मोक्षप्राप्तिके लिये जिस ज्ञानकी आवश्यकता है, उसकी प्राप्ति, जिसे जो मार्ग सुगम हो, वह उसी मार्गसे कर ले। गीताका मुख्य विषय तो यही है, कि अंतमें अर्थात् ज्ञान-प्राप्तिके अनंतर मनुष्य कर्म करे अथवा न करे। इसलिये संसारमें जीवन्मुक्त पुरुषोंके जीवन व्यतीत करनेके जो दो मार्ग दीख पड़ते हैं - अर्थात् कर्म करना और कर्म छोड़ना - वहींसे गीताके उपदेशका आरंभ किया गया है। इनमेंसे पहले मार्गको गीताने भागवतकारकी नाई 'भक्तियोग' यह नया नाम नहीं दिया है; किंतु नारायणीय धर्ममें प्रचलित प्राचीन
४५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र नामही - अर्थात् ईश्वरार्पण-बुद्धिसे कर्म करनेको 'कर्मयोग' या 'कर्मनिष्ठा' और ज्ञानोत्तर कर्मोंका त्याग करनेको 'सांख्य' या 'ज्ञाननिष्ठा', यही नाम गीतामें स्थिर रखे गये हैं। गीताकी इस परिभाषाको स्वीकार कर यदि विचार किया जाय, तो दीख पड़ेगा, कि ज्ञान और कर्मकी बराबरीकी भक्ति नामक कोई तीसरी स्वतंत्र निष्ठा कदापि नहीं हो सकती । इसका कारण यह है, कि 'कर्म करना' और 'न करना' अर्थात् 'छोड़ना' (योग और सांख्य) ऐसे अस्तिनास्तिरूप दो पक्षोंके अतिरिक्त कर्मके विषयमें तीसरा पक्षही अब बाकी नहीं रहता । इसलिये यदि गीताके अनुसार किसी भक्तिमान् पुरुषकी निष्ठाके विषयमें निश्चय करना हो, तो यह निर्णय केवल इसी बातसे नहीं किया जा सकता, कि वह भक्तिभावमें लगा हुआ है, परंतु इस बातका विचार किया जाना चाहिये, कि वह कर्म करता है या नहीं । भक्ति परमेश्वर- प्राप्तिका एक सुगम साधन है और साधनके नातेसे यदि भक्तिहीको 'योग' कहें (गीता १४. २६), तो वह अंतिम 'निष्ठा' नहीं हो सकती । भक्तिके द्वारा परमेश्वरका ज्ञान हो जानेपर जो मनुष्य कर्म करेगा, उसे 'कर्मनिष्ठ' और जो न करेगा, उसे 'सांख्यनिष्ठ' कहना चाहिये, पाँचवें अध्यायमें भगवानने अपना यह अभिप्राय स्पष्ट बतला दिया है, कि उक्त दोनों निष्ठाओंमें कर्म करनेकी निष्ठा अधिक श्रेयस्कर है। परंतु कर्मपर संन्यास-मार्गवालोंका यह महत्त्वपूर्ण आक्षेप है, कि परमेश्वरका ज्ञान होनेमें कर्मसे प्रतिबंध होता है; और परमेश्वरके ज्ञानबिना तो मोक्षकी प्राप्तिही नहीं हो सकती, इसलिये कर्मोंका त्यागही करना चाहिये । पाँचवें अध्यायमें सामान्यतः यह बतलाया गया है, कि उपर्युक्त आक्षेप असत्य है; और संन्यास-मार्गसे जो मोक्ष मिलता है, वही कर्मयोग-मार्गसेभी मिलता है (गीता ५. ५) परंतु वहाँ इस सामान्य सिद्धान्तका कुछभी स्पष्टीकरण नहीं किया गया था, इसलिये अब भगवान् उस बचे हुए तथा महत्त्वपूर्ण विषयका विस्तृत निरूपण कर रहे हैं, कि कर्म करते रहनेहीसे परमेश्वरके ज्ञानकी प्राप्ति होकर मोक्ष किस प्रकार मिलता है । इसी हेतुसे सातवें अध्यायके आरंभमें अर्जुनसे यह न कहकर, कि मैं तुझे भक्ति नामक एक स्वतंत्र तीसरी निष्ठा बतलाता हूं, भगवान् यह कहते हैं, कि :- मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युंजन मदाश्रयः । असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥ "हे पार्थ ! मुझमें चित्तको स्थिर करके और मेरा आश्रय लेकर योग याने कर्म- योगका आचरण करते समय, 'यथा' अर्थात् जिस रीतिसे मुझे संदेहरहित पूर्णतया जान सकेगा, वह (रीति तुझे बतलाता हूँ) सुन" (गीता. ७ १) ; और इसीको आगेके श्लोकमें 'ज्ञानविज्ञान' कहा है (गीता ७. २) । इनमेंसे पहले अर्थात् ऊपर दिये गये 'मय्यासक्तमनाः' श्लोकके 'योगं युंजन' - अर्थात् "कर्मयोगका आचरण करते हुए" - ये पद अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। परंतु किसीभी टीकाकारने इनकी ओर
विशेष ध्यान नहीं दिया है । 'योग' अर्थात् वही कर्मयोग है, कि जिसका वर्णन पहले छः अध्यायोंमें किया जा चुका है; और इस कर्मयोगका आचरण करते हुए जिस विधि या रीतिसे भगवान्का पूरा ज्ञान हो जायगा, उस रीति या विधिका वर्णन अब याने सातवें अध्यायमे प्रारंभ करना है- यही इस श्लोकका अर्थ है । अर्थात् पहले छः अध्यायोंका अगले अध्यायोंमे संबंध बतलानेके लिये यह श्लोक जानबूझकर सातवे अध्यायके आरंभमें रखा गया है । इसलिये इस श्लोकके अर्थकी ओर ध्यान न देकर यह कहना बिलकुल अनुचित है, कि "पहले छः अध्यायोंके बाद भक्तिनिष्ठाका स्वतंत्र रीतिमे वर्णन किया गया है।" केवल इतनाही नहीं, वरन् यहभी कहा जा सकता है, कि इस श्लोकमें 'योगं युञ्जन्' पद जानबूझकर इसी लिये रखे गये हैं, कि जिससे कोई ऐसा विपरीत अर्थ न करने पावे । गीताके पहले पाँच अध्यायोंमें कर्मकी आवश्यकता बतलाकर सांख्य-मार्गकी अपेक्षा कर्मयोग श्रेष्ठ कहा गया है; और इसके बाद छठे अध्यायमें पातंजलयोगके साधनोंका वर्णन किया गया है, जो कर्म- योगमें इंद्रियनिग्रह कर्मयोगके लिये आवश्यक है । परंतु इतनेहीसे कर्मयोगका वर्णन पूरा नहीं हो जाता । इंद्रियनिग्रह मानो कर्मेंद्रियोंसे एक प्रकारकी कसरत करना है । यह सच है, कि अभ्यासके द्वारा इंद्रियोंको हम अपने अधीन रख सकते हैं; परंतु यदि मनुष्यकी वासनाही बुरी होगी, तो इंद्रियोंको काबूमें रखनेसे कुछभी लाभ नही होगा । क्योंकि देखा जाता है, कि दुष्ट वासनाओके कारण कुछ लोग इसी इंद्रियनिग्रहरूप सिद्धिका जारण-मारण आदि दुष्कर्मोंमें उपयोग किया करते हैं । इसलिये छठे अध्यायमें कहा है, कि इंद्रियनिग्रहके साथही वासनाभी "सर्वभूतस्थ- मात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि" की नाई शुद्ध हो जानी चाहिये (गीता ६. २९); और ब्रह्मात्मैक्यरूप परमेश्वरके शुद्ध स्वरूपकी पहचान हुए बिना वासनाकी इस प्रकार शुद्धता होना असंभव है । तात्पर्य यह है, कि जो इंद्रियनिग्रह कर्मयोगके लिये आवश्यक है, वह भलेही प्राप्त हो जाय; परंतु 'रस' अर्थात् विषयोंकी चाह मनमें ज्यों-की-त्यों बनीही रहती है। इस रस अथवा विषयवासनाका नाश करनेके लिये परमेश्वरसंबंधी पूर्ण ज्ञानकीही आवश्यकता है-यह बात गीताके दूसरे अध्यायमें कही गई है (गीता २. ५९) । इसलिये कर्मयोगका आचरण करते हुएही जिस रीति अथवा विधिसे परमेश्वरका यह ज्ञान प्राप्त होता है, उसी विधिका अब भगवान् सातवें अध्यायसे वर्णन करते हैं।"कर्मयोगका आचरण करते हुए"-इस पदमे यहभी सिद्ध होता है, कि कर्मयोगके जारी रहतेही इस ज्ञानकी प्राप्ति कर लेनी है, उसके लिये कर्मोंको छोड़ नहीं बैठना है; और इसीसे यह कहनाभी निर्मूल हो जाता है, कि भक्ति और ज्ञानको कर्मयोगके बदले विकल्प मानकर इन्ही दो स्वतंत्र मार्गोका वर्णन सातवें अध्यायमे आगे किया गया है। गीताका कर्मयोग भागवत धर्मसेही लिया गया है, इसलिये कर्मयोगमें ज्ञान-प्राप्तिकी विधिका जो वर्णन है, वह भागवत धर्म अथवा नारायणीय धर्ममें कही गई विधिकाही वर्णन है; और इसी
४५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
अभिप्रायसे शांतिपर्वके अंतमें वैशंपायनने जनमेजयसे कहा है, कि "भगवद्गीतामें प्रवृत्ति-प्रधान नारायणीय धर्म और उसकी विधियोंका वर्णन किया गया है।" (पहले प्रकरणके आरंभमें दिये गये श्लोक देखिये) । वैशंपायनके कथनानुसार इसीमें संन्यास-मार्गकी विधियोंकाभी अंतर्भाव होता है। क्योकि यद्यपि इन दोनों मार्गोंमें "कर्म करना अथवा कर्मोंको छोड़ना" यही भेद है, तथापि दोनोंको एकही ज्ञानविज्ञानकी आवश्यकता है, इसलिये दोनों मार्गोंमें ज्ञान-प्राप्तिकी विधियाँ एक- ही-सी होती हैं। परंतु जबकि उपर्युक्त श्लोकमें "कर्मयोगका आचरण करते हुए" – ऐसे प्रत्यक्ष पद रखे गये हैं, तब स्पष्ट रीतिसे यही सिद्ध होता है, कि गीताके सातवें और उसके अगले अध्यायोंमें ज्ञान-विज्ञानका निरूपण मुख्यतः कर्मयोगहीकी पूर्तिके लिये किया है और उसकी व्यापकताके कारण उसमें संन्यासमार्गकीभी विधियोंका समावेश हो जाता है, कर्मयोगको छोड़कर केवल सांख्यनिष्ठाके समर्थनके लिये यह ज्ञानविज्ञान नहीं बतलाया गया है। दूसरी यह बातभी ध्यान देने योग्य है, कि सांख्य-मार्गवाले यद्यपि ज्ञानको महत्त्व दिया करते हैं, तथापि वे कर्मको या भक्तिको कुछभी महत्त्व नहीं देते; और गीतामें तो भक्ति सुगम तथा प्रधान मानी गई है, इतनाही क्यों, वरन् अध्यात्मज्ञान और भक्तिका वर्णन करते समय श्रीकृष्णने अर्जुनको जगह-जगहपर यही उपदेश दिया है, कि "तू कर्म अर्थात् युद्ध कर" (गीता ८.७; ११.३३; १६. २४; १८.६)। इसलिये यही सिद्धान्त करना पड़ता है, गीताके सातवें और अगले अध्यायोंमें ज्ञान-विज्ञानका जो निरूपण है, वह पिछले छः अध्यायोंमें कहे गये कर्मयोगकी पूर्ति और समर्थनके लियेही बतलाया गया है, यहाँ केवल सांख्यनिष्ठाका या केवल भक्तिका स्वतंत्र समर्थन विवक्षित नहीं है। ऐसा सिद्धान्त करनेपर कर्म, भक्ति और ज्ञान इस प्रकार गीताके तीन परस्पर स्वतंत्र विभाग नहीं हो सकते। इतनाही नहीं; परंतु अब यह विदित हो जायगा, कि यह मतभी (जिसे कुछ लोग प्रकट किया करते हैं) केवल काल्पनिक अतएव मिथ्या है, कि 'तत्त्वमसि' महावाक्यमें तीनही पद हैं, और गीताके अध्यायभी अठारह हैं, इसलिये 'छः त्रिक अठारह' के हिसाबसे गीताके छः छः अध्यायोंके तीन समान विभाग करके, पहले छः अध्यायोंमें 'त्वम्' पदका, दूसरे छः अध्यायोंमें 'तत्' पदका और तीसरे छः अध्यायोंमें 'असि' पदका विवेचन किया गया है। इस मतको काल्पनिक या मिथ्या कहनेका कारण यही है, कि अब तो यह एकदेशीय पक्षही शेष नहीं रहने पाता; जो यह कहे, कि सारी गीतामें केवल ब्रह्मज्ञानकाही प्रतिपादन किया गया है, तथा 'तत्त्वमसि' महावाक्यके विवरणके सिवा गीतामें और कुछ अधिक नहीं है। इस प्रकार जब मालूम हो गया, कि भगवद्गीतामें भक्ति और ज्ञानका विवे- चन क्यों किया गया है, तब सातवेंसे सत्रहवे अध्यायके अंततक ग्यारहों अध्यायोंकी संगति सहजही ध्यानमें आ जाती है। पीछे छठे प्रकरणमें बतला दिया गया है, कि
गीताध्याय-संगति ४५९ जिस परमेश्वर-स्वरूपके ज्ञानसे बुद्धि रसवर्ज्य और सम होती है, उस परमेश्वर- स्वरूपका विचार एक बार क्षराक्षर-दृष्टिसे और फिर क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-दृष्टिसे करना पड़ता है; और उसमें अंतमें यह सिद्धान्त किया जाता है, कि जो तत्त्व पिंडमें है वही ब्रह्मांडमें है। इन्हीं विषयोंका अब गीतामें वर्णन है। परंतु जब इस प्रकार परमेश्वरके स्वरूपका विचार करने लगते हैं, तब दीख पड़ता है, कि परमेश्वरका स्वरूप कभी तो व्यक्त ( इंद्रियगोचर ) होता है और कभी अव्यक्त। फिर ऐसे प्रश्नोंकाभी विचार इस निरूपणमें करना पड़ता है, कि इन दोनों स्वरूपोंमें श्रेष्ठ कौन-सा है; और इस श्रेष्ठ स्वरूप कैसे उत्पन्न होता है ? इसी प्रकार अब इस बातकाभी निर्णय करना पड़ता है, कि परमेश्वरके पूर्ण ज्ञानमे बुद्धिको स्थिर, सम और आत्मनिष्ठ करनेके लिये परमेश्वरकी जो उपासना करनी पड़ती है, वह कैसी हो – अव्यक्तकी उपासना करना अच्छा है, अथवा व्यक्तकी ? और इसीके साथ साथ इस विषयकी उपपत्ति बतलानी पड़ती है, कि परमेश्वर यदि एक है, तो व्यक्त सृष्टिमें यह अनेकता क्यों दीख पड़ती है ? इन सब विषयोंको व्यवस्थित रीतिसे बतलानेके लिये यदि ग्यारह अध्याय लग गये, तो कुछ आश्चर्य नहीं। हम यह नहीं कहते, कि गीतामें भक्ति और ज्ञानका बिलकुल विवेचनही नहीं है। हमारा केवल इतनाही कहना है, कि कर्म, भक्ति और ज्ञानको तीन स्वतंत्र विषय या निष्ठाएँ, अर्थात् तुल्यबलकी समझकर, इन तीनोंमें गीताके अठारह अध्यायोंके जो अलग अलग और बराबर बराबर हिस्से कर दिये जाते हैं, वैसा करना उचित नहीं है, किंतु सारी गीतामें एकही निष्ठाका अर्थात् ज्ञानमूलक और भक्ति-प्रधान कर्म-योगका प्रतिपादन किया है; और सांख्य- निष्ठा, ज्ञान-विज्ञान या भक्तिका जो निरूपण भगवद्गीतामें पाया जाता है, वह सिर्फ़ कर्मयोग-निष्ठाकीही पूर्ति और समर्थनके लिये आनुषंगिक है, किसी स्वतंत्र विषयका प्रतिपादन करनेके लिये नहीं। अब यह देखना है, कि हमारे इस सिद्धान्तके अनुसार कर्मयोगकी पूर्ति और समर्थनके लिये बतलाये गये ज्ञान-विज्ञानका विभाग गीताके अध्यायोंके क्रमानुसार किस प्रकार किया गया है। सातवें अध्यायमें क्षराक्षर-सृष्टिके अर्थात् ब्रह्मांडके विचारको आरंभ करके भगवानने प्रथम अव्यक्त अथवा अक्षर परब्रह्मके ज्ञानके विषयमें यह कहा है, कि जो इस सारी सृष्टिको – पुरुष और प्रकृतिको – मेरेही पर और अपर स्वरूप जानते हैं, और जो इस मायाके परेके अव्यक्त रूपको पहचानकर मुझे भजते हैं, उनकी बुद्धि सम हो जाती है; तथा उन्हें मैं सद्गति देता हूँ; और फिर उन्होंने अपने स्वरूपका इस प्रकार वर्णन किया है, कि सब देवता, सब प्राणी, सब यज्ञ, सब कर्म और सब अध्यात्म मैही हूँ; मेरे सिवा इस संसारमें अन्य कुछभी नहीं है। इसके बाद आठवें अध्यायके आरंभमें अर्जुनने अध्यात्म, अधियज्ञ, अधिदेव और अधिभूत शब्दोंका अर्थ पूछा है। इन शब्दोंका अर्थ बतलाकर भगवानने कहा है, कि इस प्रकार जिसने मेरा स्वरूप पहचान लिया, उसे मैं कभी नहीं भूलता। इसके बाद
४६० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र इन विषयोंका संक्षेपमें विवेचन है, कि सारे जगतमें अविनाशी या अक्षर-तत्त्व कौन-सा है; सब संसारका संहार कैसे और कब होता है; जिस मनुष्यको परमेश्वरके स्वरूप- का ज्ञान हो जाता है, उसको कौन-सी गति प्राप्त होती है; और ज्ञानके बिना केवल काम्य-कर्म करनेवालेको कौन-सी गति मिलती है। नवें अध्यायमेंभी यही विषय है। इसमें भगवान्ने उपदेश किया है, कि जो अव्यक्त परमेश्वर इस प्रकार चारों ओर प्राप्त है, उसके व्यक्त स्वरूपकी भक्तिके द्वारा पहचान करके अनन्य भावसे उसकी शरणमें जाना ही ब्रह्म-प्राप्तिका प्रत्यक्षावगम्य और सुगम मार्ग अथवा राजमार्ग है; और इसीको राजविद्या या राजगुह्य कहते हैं। तथापि इन तीनों अध्यायोंमें बीच बीचमें भगवान् कर्मयोग-मार्गका यह प्रधान तत्त्व बतलाना नहीं भूले हैं, कि ज्ञानवान् या भक्तिमान् पुरुषोंको कर्म करतेही रहना चाहिये। उदाहरणार्थ, आठवें अध्यायमें कहा है, कि "तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च" - इसलिये सदा अपने मनमें मेरा स्मरण रख और युद्ध कर (गीता ८. ७); और नवें अध्यायमें कहा है, कि "सब कर्मोंको मुझे अर्पण कर देनेसे उनके शुभाशुभ फलोंसे तू मुक्त हो जायगा" (गीता ९. २७, २८)। ऊपर भगवान्ने जो यह कहा है, कि सारा संसार मुझमे उत्पन्न हुआ है; और वह मेराही रूप है, वही बात दसवें अध्यायमें ऐसे अनेक उदा- हरण देकर अर्जुनको भली भाँति समझा दी है, कि "संसारकी प्रत्येक श्रेष्ठ वस्तु मेरीही विभूति है।" फिर अर्जुनके प्रार्थना करनेपर ग्यारहवें अध्यायमें भगवान्ने उसे अपना विश्वरूप प्रत्यक्ष दिखलाया है; और उसकी दृष्टिके सन्मुख इस बातकी सत्यताका अनुभव करा दिया है, कि मैं ही (परमेश्वर) सारे संसारमें चा ओररों व्याप्त हूँ। परन्तु इस प्रकार विश्वरूप दिखला कर और अर्जुनके मनमें यह विश्वास करा के, कि "सब कर्मोंका करानेवाला मैंही हूँ" भगवान्ने तुरंतही कहा है, कि "सच्चा कर्ता तो मैही हूँ, तू निमित्तमात्र है; इसलिये निःशंक होकर युद्ध कर." (गीता ११. ३३)। यद्यपि इस प्रकार यह सिद्ध हो गया, कि संसारमें एकही परमेश्वर है, तोभी अनेक स्थानोंमें परमेश्वरके अव्यक्त स्वरूप कोही प्रधान मानकर यह वर्णन किया गया है, कि "मैं अव्यक्त हूँ परंतु मूर्ख लोग मुझे व्यक्त समझते हैं" (गीता ७. २४); "यदक्षरं वेदविदो वदन्ति" (गीता ८. ११)। जिसे वेदवेत्तागण अक्षर कहते है; "अव्यक्तको अक्षर कहते हैं" (गीता ८. २१); "मेरे यथार्थ स्वरूपको न पहचानकर मूर्ख लोग मुझे देहधारी मानते है" (गीता ९. ११); "विद्याओंमें अध्यात्मविद्या श्रेष्ठ" (गीता १०. ३२); और अर्जुनके कथनानुसार "त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्" (गीता ११. ३७)। इसीलिये बारहवें अध्यायके आरंभमें अर्जुनने पूछा है, कि किस परमेश्वरकी - व्यक्तकी या अव्यक्तकी - उपासना करनी चाहिये? तब भगवान्ने अपना यह मत प्रदर्शित किया है, कि जिस व्यक्त स्वरूपकी उपासनाका वर्णन नवें अध्यायमें हो चुका है,
गीताध्याय-संगति ४६१ वही सुगम है, और दूसरे अध्यायमें स्थितप्रज्ञका जैसा वर्णन है, वैसाही परम भगवद्- भक्तोंकी स्थितिका वर्णन करके यह अध्याय पूरा कर दिया है। कुछ लोगोंकी राय है, कि यद्यपि गीताके कर्म, भक्ति और ज्ञान ये तीन स्वतंत्र भाग न भी किये जा सकें; तथापि सातवें अध्यायसे ज्ञान-विज्ञानका जो विषय आरंभ हुआ है, उसके भक्ति और ज्ञान ये दो पृथक् भाग सहजही हो जाते हैं; और वे लोग कहते हैं, कि द्वितीय षडध्यायी भक्तिप्रधान है। परंतु कुछ विचार करनेके उपरान्त किसीकोभी ज्ञात हो जावेगा, कि यह मतभी ठीक नहीं है। कारण यह है, कि सातवें अध्यायका आरंभ क्षराक्षर-सृष्टिके ज्ञान-विज्ञानसे किया गया है; न कि भक्तिसे । और, यदि कहा जाय, कि बारहवें अध्यायमें भक्तिका वर्णन पूरा हो गया है; तो हम देखते हैं, कि अगले अध्यायोंमें ठौर ठौरपर भक्तिके विषयमें बारबार यह उपदेश किया गया है, कि जो बुद्धिके द्वारा स्वरूपको नहीं जान सकते, वे श्रद्धापूर्वक दूसरोंके वचनोंपर विश्वास रखकर मेरा ध्यान करें." (गीता १३. २५), "जो मेरी अव्यभिचारिणी भक्ति करता है, वही ब्रह्मभूत होता है" ( १४. गीता २६), “जो मुझेही पुरुषोत्तम जानता है, वह मेरीही भक्ति करता है" (गीता १५. १९); और अंतमें अठारहवें अध्यायमें पुनः भक्तिकाही इस प्रकार उपदेश किया है, कि "सब धर्मोंको छोड़कर तू मुझको भज" (गीता १८. ६६); इस- लिये हम यह नहीं कह सकते, कि केवल दूसरी षड्ध्यायीहीमें भक्तिका उपदेश है। इसी प्रकार, यदि भगवान्का यह अभिप्राय होता, कि ज्ञानसे भक्ति भिन्न है; तो चौथे अध्यायमें ज्ञानकी प्रस्तावना करके (गीता ४. ३४-३७) सातवें अध्यायके अर्थात् उपर्युक्त आक्षेपकोंके मतानुसार भक्ति-प्रधान षड्ध्यायीके आरंभमें, भगवानने यह न कहा होता, कि अब मैं तुझे वही "ज्ञान और विज्ञान" बतलाता हूँ (गीता ७. २)। यह सच है, कि इससे आगेके नवें अध्यायमें राजविद्या और राजगुह्य अर्थात् प्रत्यक्षावगम्य भक्ति-मार्ग बतलाया है; परंतु अध्यायके आरंभमेंही कह दिया है, कि "तुझे विज्ञानसहित ज्ञान बतलाता हूँ (गीता. ९. १) । इससे स्पष्ट होता है, कि गीतामें भक्तिका समावेश ज्ञानहीमें गया प्रकट किया हैं। दसवें अध्यायमें भगवान्ने अपनी विभूतियोंका वर्णन किया है; परंतु ग्यारहवें अध्यायके आरंभमें अर्जुनने उसेही 'अध्यात्म' कहा है (गीता ११. १), और ऊपर यह बतलाही दिया गया है, कि परमेश्वरके व्यक्त स्वरूपका वर्णन करते समय बीच-बीचमें व्यक्त स्वरूपकी अपेक्षा अव्यक्त स्वरूपकी श्रेष्ठताकाभी बातें आ गई हैं। इन्हीं सब बातोंसे बारहवें अध्यायके आरंभमें अर्जुनने यह प्रश्न किया है, कि उपासना व्यक्त परमे- श्वरकी की जावे या अव्यक्तकी ? तब यह उत्तर देकर, कि अव्यक्तकी अपेक्षा व्यक्तकी उपासना अर्थात् भक्ति सुगम है, भगवानने तेरहवें अध्यायमें क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका 'ज्ञान' बतलाना आरंभ कर दिया; और सातवें अध्यायके आरंभके समान चौदहवें अध्यायके आरंभमेंभी कहा है, कि "परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् " -
फिरसे मैं तुझे वही 'ज्ञानविज्ञान' पूरी तरहसे बतलाता हूँ ( गीता १८. १ )। इस ज्ञानका वर्णन करते समय भक्तिका सूत्र या संबधभी टूटने नहीं पाया है। इसमे यह बात स्पष्ट मालूम हो जाती है, कि भगवान्का उद्देश्य और ज्ञान इन दोनोंको पृथक् रीतिसे बतलानेका नहीं था; किंतु सातवें अध्यायमे जिस ज्ञान-विज्ञानका आरंभ किया गया है, उसीमें दोनों एकत्र गूंथ दिये गये हैं। भक्ति भिन्न है और ज्ञान भिन्न है - यह कहना उस संप्रदायके अभिमानियोंकी नासमझी है, वास्तवमें गीताका अभिप्राय ऐसा नहीं है। अव्यक्तोपासनामें ( ज्ञानमार्गमें ) अध्यात्मविचारमे परमे- श्वरके स्वरूपका जो ज्ञान प्राप्त कर लेना पड़ता है, वही भक्ति-मार्गमेंभी आवश्यक है; परंतु व्यक्तोपासनामें ( भक्ति-मार्गमें ) आरंभमें वह ज्ञान दूसरोंसे श्रद्धापूर्वक ग्रहण किया जा सकता है ( गीता १३. २५ ); इसलिये भक्ति-मार्ग प्रत्यक्षावगम्य और सामान्यतः सभी लोगोंके लिये सुखकारक है ( गीता ९. २ ), और ज्ञान-मार्ग ( या अव्यक्तोपासना ) क्लेशमय ( गीता १२. ५ ) है - बस, इसके अतिरिक्त इन दो साधनोंमें गीताकी दृष्टिसे और कुछभी भेद नहीं है। परमेश्वर-स्वरूपका ज्ञान प्राप्त करके बुद्धिको सम करनेका जो कर्मयोगका उद्देश्य या साध्य है, वह इन दोनों साधनोंके द्वारा एक-सा-ही प्राप्त होता है। इसलिये चाहे व्यक्तोपासना कीजिये या अव्यक्तोपासना; भगवान्को दोनों एकही समान ग्राह्य हैं। तथापि ज्ञानी पुरुष- कोभी उपासनाकी थोड़ी-बहुत आवश्यकता होतीही है; इसलिये चतुर्विध भक्तोंमें भक्तिमान् ज्ञानीको श्रेष्ठ कहकर ( गीता. ७. १७ ) भगवान्ने ज्ञान और भक्तिके विरोधको हटा दिया है। कुछभी हो; परंतु जब कि ज्ञान-विज्ञानका वर्णन किया जा रहा है, तब प्रसंगानुसार एक-आध अध्यायमे व्यक्तोपासनाका और किसी दूसरे अध्यायमें अव्यक्तोपासनाका विशेष वर्णन हो जाना अपरिहार्य है। परंतु इतनेहीसे यह संदेह न हो जावे, कि ये दोनों पृथक् पृथक् हैं; इसलिये परमेश्वरके व्यक्त स्वरूपका वर्णन करते समय व्यक्त स्वरूपकी अपेक्षा अव्यक्तकी श्रेष्ठता और अव्यक्त स्वरूपका वर्णन करते समय भक्तिकी आवश्यकता बतला देनाभी भगवान् नहीं भूले हैं। अब विश्वरूपके और विभूतियोंके वर्णनमेंही तीन-चार अध्याय लग गये हैं, इस- लिये यदि इन तीन-चार अध्यायोंको ( षडध्यायीको नहीं ) स्थूलमानसे 'भक्ति-मार्ग' नाम देनाही किसीको पसंद हो, तो ऐसा करनेमें कोई हानि नहीं। कुछभी कहिये; परंतु यह तो निश्चित रूपसे मानना पड़ेगा, कि गीतामें भक्ति और ज्ञानको न तो पृथक् किया है; और न इन दोनों मार्गोंको स्वतंत्रभी कहा है। संक्षेपमें उक्त निरूपणका यही भावार्थ ध्यानमें रहे, कि कर्मयोगमें जिस साम्य-बुद्धिको प्रधानता दी जाती है, उसकी प्राप्तिके लिये परमेश्वरके सर्वव्यापी स्वरूपका ज्ञान हो जाना, चाहिये, फिर यह ज्ञान चाहे व्यक्तकी उपासनासे हो, चाहे अव्यक्तकी; सुगमताके अतिरिक्त इनमें अन्य कोई भेद नहीं है; और गीतामें सातवेंसे लगाकर सत्रहवें अध्यायतक सब विषयोंको 'ज्ञानविज्ञान'को 'अध्यात्म' यही नाम दिया गया है।
गीताध्याय-संगति ४६३ जब भगवान्ने अर्जुनके कर्मचक्षुओंको विश्वरूप-दर्शनके द्वारा यह प्रत्यक्ष अनुभव करा दिया, कि परमेश्वरही सारे ब्रह्मांडमें या क्षराक्षर-सृष्टिमें समाया हुआ है; तब तेरहवें अध्यायमें ऐसा क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार बतलाया है, कि यही परमेश्वर पिंडमें अर्थात् मनुष्यके शरीरमें या क्षेत्रमें आत्माके रूपमे निवास करता है; और इस आत्माका अर्थात् क्षेत्रज्ञका जो ज्ञान है, वही परमेश्वरकाभी ( परमात्माका ) ज्ञान है। प्रथम परमात्माका अर्थात् परब्रह्मका “ अनादिमत्परं ब्रह्म।” इत्यादि प्रकार-से उपनिषदोंके आधार-से वर्णन करके आगे बतलाया गया है, कि यही क्षेत्र- क्षेत्रज्ञ-विचार 'प्रकृति' और 'पुरुष' नामक सांख्य-विवेचनमें अंतर्भूत हो गया है; और अंतमें यह वर्णन किया गया है, कि जो 'प्रकृति' और 'पुरुष'के भेदको पहचान- कर अपने 'ज्ञानचक्षुओं'के द्वारा निर्गुण परमात्माको जान लेता है, वह मुक्त हो जाता है। परंतु उसमेंभी कर्मयोगका यह मूल स्थिर रखा गया है, कि “ सब काम प्रकृति करती है, आत्मा कर्ता नहीं है — यह जाननेसे कर्म बंधक नहीं होते ” ( गीता १३. २९) ; और भक्तिका “ ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति ” (गीता. १३. २४) यह सूत्रभी स्थिर रखा है। चौदहवें अध्यायमें इसी ज्ञानका वर्णन करते हुए सांख्य-शास्त्रके अनुसार बतलाया गया है, कि सर्वत्र एकही आत्मा या परमेश्वरके होनेपरभी प्रकृतिके सत्त्व, रज और तम गुणोंके भेदोंके कारण संसारमें वैचित्र्य उत्पन्न होता है। आगे कहा गया है, कि जो मनुष्य प्रकृतिके इस खेलको जानकर और अपनेको कर्ता न समझ भक्तियोगसे परमेश्वरकी सेवा करता है, वही सच्चा त्रिगुणातीत या मुक्त है। अंतमें अर्जुनके प्रश्न करनेपर स्थितप्रज्ञ और भक्तिमान् पुरुषकी स्थितिके समानही त्रिगुणातीतकी स्थितिका वर्णन किया गया है। श्रुति-ग्रंथोंमें परमेश्वरका कहीं कहीं वृक्षरूपमे जो वर्णन पाया जाता है, उसीका पंद्रहवें अध्यायके आरंभमें वर्णन करके भगवान्ने बतलाया है, कि जिसे सांख्यवादी “ प्रकृतिका पसारा ” कहते हैं, वही यह अश्वत्थ वृक्ष है; और अंतमें भगवान्ने अर्जुनको यह उपदेश किया है, कि क्षर और अक्षर दोनोंके परे जो पुरुषोत्तम है, उसे पहचानकर उसकी 'भक्ति' करनेसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है; तूभी ऐसाही कर। सोलहवें अध्यायमें कहा गया है, कि प्रकृतिभेदके कारण संसारमें जैसे वैचित्र्य उत्पन्न होता है, उसी प्रकार मनुष्योंमेंभी दो भेद अर्थात् दैवी संपत्तिवाले और आसुरी संपत्तिवाले होते हैं; इसके बाद उनके कर्मोंका वर्णन किया गया है; और यह बतलाया गया है, कि उन्हें कौन-सी गति प्राप्त होती है। अर्जुनके पूछनेपर सत्रहवें अध्यायमें इस बातका विवेचन किया गया है, कि त्रिगुणात्मक प्रकृतिके गुणोंकी विषमताके कारण उत्पन्न होनेवाला वैचित्र्य श्रद्धा, दान, यज्ञ, तप इत्यादिमेंभी दीख पड़ता है। इसके बाद यह बतलाया गया है, कि 'ॐ तत्सत्' इस ब्रह्मनिर्देशके 'तत्' पदका अर्थ “ निष्कामबुद्धिसे किया गया कर्म ” और 'सत्' पदका अर्थ “ अच्छा परंतु काम्य- बुद्धिसे किया गया कर्म ” होता है; और इस अर्थके अनुसार वह सामान्य ब्रह्म-निर्देशभी
४६४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कर्मयोग-मार्गकेही अनुकूल है। सारांश-रूपसे सातवें अध्यायसे लेकर सत्रहवें अध्याय- तक ग्यारह अध्यायोंका तात्पर्य यही है, कि संसारमें चारों ओर एकही परमे- श्वर व्याप्त है, फिर तुम चाहे उसे विश्वरूप-दर्शनके द्वारा पहचानो, चाहे ज्ञान- चक्षुके द्वारा। शरीरमें क्षेत्रज्ञभी वही है, और क्षर-सृष्टिमें अक्षरभी वही है। वही दृश्य सृष्टिमें व्याप्त है, और उसके बाहर अथवा परेभी है। यद्यपि वह एक है, तोभी प्रकृतिके गुणभेदके कारण व्यक्त सृष्टिमें नानात्व या वैचित्र्य दीख पड़ता है, और इस मायामे अथवा प्रकृतिके गुणभेदके कारणही दान, श्रद्धा, तप, यज्ञ, धृति, ज्ञान इत्यादि तथा मनुष्योंमेंभी अनेक भेद हो जाते हैं। परंतु इन सब भेदोंमें जो एकता है, उसे पहचानकर उस एक और नित्य तत्त्वकी उपासनाके द्वारा - फिर वह उपासना चाहे व्यक्तकी हो, अथवा अव्यक्तकी - प्रत्येक मनुष्य अपनी बुद्धिको स्थिर और सम करे, तथा उस निष्काम, सात्त्विक अथवा साम्य-बुद्धि- सेही संसारमें स्वधर्मानुसार प्राप्त सब व्यवहार केवल कर्तव्य समझ किया करे। इस ज्ञान-विज्ञानका प्रतिपादन, इस ग्रंथके अर्थात् गीतारहस्यके पिछले प्रकरणोंमें विस्तृत रीतिसे किया गया है, इसलिये हमने सातवें अध्यायसे लगाकर सत्रहवें अध्यायतकका सारांशही इस प्रकरणमें दिया है - अधिक विस्तार नहीं किया। हमारा प्रस्तुत उद्देश्य केवल गीताके अध्यायोंकी संगति देखनाही है; अतएव उस कामके लिये जितना भाग आवश्यक है, उतनेकाही हमने यहाँ उल्लेख किया है। कर्मयोगमें कर्मकी अपेक्षा बुद्धिही श्रेष्ठ है, इसलिये इस बुद्धिको शुद्ध और सम करनेके लिये परमेश्वरकी सर्वव्यापकता अर्थात् सर्वभूतान्तर्गत आत्मैक्यका जो 'ज्ञानविज्ञान' आवश्यक होता है, उसका वर्णन आरंभ करके अबतक इस बातका निरूपण किया गया, कि भिन्न भिन्न अधिकारके अनुसार व्यक्त या अव्यक्तकी उपासनाके द्वारा जब यह यह ज्ञान हृदयमें भिद जाता है, तब बुद्धिको स्थिरता और समता प्राप्त हो जाती है; और कर्मोंका त्याग न करनेपरभी अंतमें मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है। इसीके साथ क्षराक्षरका और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञकाभी विचार किया गया है। परंतु भगवानने निश्चित रूपसे कह दिया है, कि इस प्रकार बुद्धिके सम हो जानेपरभी कर्मोंका त्याग करनेकी अपेक्षा फलाशाको छोड़ देना और लोकसंग्रहके लिये आमरण कर्मही करते रहना अधिक श्रेयस्कर है ( गीता ५.२ ) । अतएव स्मृति-ग्रंथोंमें वर्णित 'संन्यासाश्रम' इस कर्मयोगमें नहीं होता; और इससे मन्वादि स्मृति-ग्रंथोंका तथा इस कर्मयोगका विरोध हो जाना संभव है। इसी शंकाको मनमें लाकर अठारहवें अध्यायके आरंभमें अर्जुनने 'संन्यास' और 'त्याग' का रहस्य पूछा है। भगवान् इस विषयमे यह उत्तर देते हैं, कि 'संन्यास'का मूल अर्थ 'छोड़ना' है; और कर्मयोग-मार्गमें यद्यपि कर्मोंको नहीं छोड़ते, तथापि फलाशाको छोड़ते हैं, इसलिये, कर्मयोग तत्त्वतः संन्यासही होता है; क्योंकि यद्यपि संन्यासीका भेष धारण करके भिक्षा न मांगी जावे, तथापि वैराग्यका और संन्यासका जो तत्त्व स्मृतियोंमें कहा
गया है - अर्थात् बुद्धिका निष्काम होना - वह कर्मयोगमेंभी स्थिर रहता है। परंतु फलाशाके छूटनेसे स्वर्ग-प्राप्तिकीभी आशा नहीं रहती, इसलिये यहाँ एक और शंका उपस्थित होती है, कि ऐसी दशामें यज्ञायागादिक श्रौतकर्म करनेकी क्या आवश्यकता है? इसपर भगवानने अपना यह निश्चित मत बतलाया है, कि उपर्युक्त कर्म चित्त- शुद्धिकारक हुआ करते हैं; इसलिये उन्हेंभी अन्य कर्मोंके साथ निष्काम बुद्धिसे करते रहना चाहिये और इस प्रकार लोकसंग्रहके लिये यज्ञचक्रको हमेशा जारी रखना चाहिये। अर्जुनके प्रश्नोंका इस प्रकार उत्तर देनेपर प्रकृति-स्वभावानुरूप ज्ञान, कर्म_ कर्त्ता, बुद्धि, धृति और सुखके जो सात्त्विक, तामस और राजस भेद हुआ करते हैं, उनका निरूपण करके गुणवैचित्र्यका विषय पूरा किया है। इसके बाद निश्चय किया गया है, कि निष्काम कर्म, निष्काम कर्त्ता, आसक्ति-रहित बुद्धि, अनासक्तिसे होनेवाला सुख, और 'अविभक्तं विभक्तेषु' इस नियमके अनुसार होनेवाला आत्मैक्य-ज्ञान - येही सात्त्विक या श्रेष्ठ हैं। इसी तत्त्वके अनुसार चातुर्वर्ण्यकीभी उपपत्ति बतलाई गई है और कहा गया है, कि चातुर्वर्ण्य-धर्मसे प्राप्त हुए कर्मोंको सात्त्विक अर्थात् निष्काम बुद्धिसे केवल कर्तव्य मानकर करते रहनेसेही मनुष्य इस संसारमें कृतकृत्य हो जाता है और अंतमें उसे शांति तथा मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है। अंतमें भगवानने अर्जुनको भक्ति-मार्गका यह निश्चित उपदेश किया है, कि कर्म तो प्रकृतिका धर्म है, इसलिये यदि तू उन्हें छोड़ना चाहे, तोभी वे न छूटेंगे, अतएव यह समझकर, कि सब करनेवाला और करानेवाला परमेश्वरही है, तू उसकी शरणमें जा और सब काम निष्काम बुद्धिसे करता जा। मैंही वह परमेश्वर हूँ, मुझपर विश्वास रख, मुझे भज, मैं तुझे सब पापोंसे मुक्त करूँगा। ऐसा उपदेश करके भगवानने गीताके प्रवृत्ति-प्रधान धर्मका निरूपण पूरा किया है। सारांश यह है, कि इस लोक और परलोक इन दोनोंका विचार करके ज्ञानवान् एवं शिष्ट जनोंने 'सांख्य' और 'कर्मयोग' नामक जिन दो निष्ठाओंको प्रचलित किया है, उन्हींसे गीताके उपदेशका आरंभ हुआ है। इन दोनोंमें-से, पांचवें अध्यायके निर्णयानुसार, जिस कर्मयोगीकी योग्यता अधिक है, जिस कर्मयोगकी सिद्धिके लिये छठे अध्यायमें पातंजलयोगका वर्णन किया है, जिस कर्मयोगके आचरणकी विधिका वर्णन अगले ग्यारह अध्यायोंमें (७ से १७ तक) पिण्डब्रह्मांड-ज्ञानपूर्वक विस्तारसे किया गया है; और यह कहा गया है, कि उस विधिसे आचरण करनेपर परमेश्वरका पूरा ज्ञान हो जाता है, एवं अंतमें मोक्षकी प्राप्ति होती है, उसी कर्मयोगका समर्थन अठारहवें अध्यायमें अर्थात् अंतमेंभी है। और मोक्षरूपी आत्मकल्याणके आड़े न आकर परमेश्वरार्पण-पूर्वक केवल कर्तव्य- बुद्धिसे स्वधर्मानुसार लोकसंग्रहके लिये सब कर्मोंको करते रहनेका जो यह योग या युक्ति है, उसकी श्रेष्ठताका यह भगवत्प्रणीत उपपादन जब अर्जुनने सुना, तभी उसने संन्यास लेकर भिक्षा माँगनेका अपना पहला विचार छोड़ दिया और अब
- केवल भगवानके कहनेहीसे नहीं; किंतु कर्माकर्म-शास्त्रका पूर्ण ज्ञान हो जानेके गी. र. ३०
४६६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कारण - वह स्वयं अपनी इच्छासे युद्ध करनेके लिये प्रवृत्त हो गया है। अर्जुनको युद्धमें प्रवृत्त करनेके लियेही गीताका आरंभ हुआ है; और उसका अंतभी वैसेही हुआ है ( गीता १८. ७३ ) । गीताके अठारह अध्यायोंकी जो संगति ऊपर बतलाई गई है, उससे यह प्रकट हो जायगा, कि गीता केवल कर्म, भक्ति और ज्ञान इन तीन स्वतंत्र निष्ठाओंकी खिचड़ी नहीं है; अथवा वह सूत, रेशम और जरीके चिथड़ोंकी सिली हुई गुदड़ी नहीं है; वरन् दीख पड़ेगा, कि सूत, रेशम और जरीके ताने-बानेको यथास्थानमें योग्य रीतिसे एकत्र करके, यह कर्मयोग नामक मूल्यवान् और मनोहर गीतारूपी वस्त्र आदिसे अंत तक " अत्यन्त योगयुक्त चित्तसे " एक-सा बुना गया है। यह सच है, कि निरूपणकी पद्धति संवादात्मक होनेके कारण शास्त्रीय पद्धतिकी अपेक्षा वह, जरा ढीली है, परंतु यदि इस बातपर ध्यान दिया जाय, कि संवादात्मक निरूपणसे शास्त्रीय पद्धतिकी रुक्षता हट गई है; और उसके बदले गीतामें सुलभता और प्रेमरस भरगया है; तो शास्त्रीय पद्धतिके हेतु-अनुमानोंकी केवल बुद्धिग्राह्य तथा नीरस कटकट छूट जानेका किसीकोभी तिलमात्र बुरा न लगेगा। इसी प्रकार यद्यपि गीता-निरूपणकी पद्धति पौराणिक या संवादात्मक है, तोभी यह बात इस ग्रंथके कुल- विवेचन-से मालूम हो जायगी, कि ग्रंथपरीक्षणकी मीमांसकोंकी सब कसौटियोंपर कसनेपरभी गीताका तात्पर्य निश्चित करनेमें कुछभी बाधा नहीं होती। गीताका आरंभ देखा जाय तो मालूम होगा, कि अर्जुन क्षात्र-धर्मके अनुसार लड़ाई करनेके लिये चला था। जब धर्माधर्मकी विचिकित्साके चक्करमें पड़ गया, तब उसे वेदान्त- शास्त्रके आधारपर प्रवृत्ति-प्रधान कर्मयोग-धर्मका उपदेश करनेके लिये गीता प्रवृत्त हुई है; और हमने पहलेही प्रकरणमें यह बतला दिया है, कि गीताके उपसंहार और फल दोनों इसी प्रकारके अर्थात् प्रवृत्ति-प्रधानही हैं। इसके बाद हमने बतलाया है, कि गीतामें अर्जुनको जो उपदेश किया है, उसमें " तू युद्ध अर्थात् कर्मही कर " ऐसा दस-बारह बार स्पष्ट रीतिसे और पर्यायसे तो अनेक बार ( अभ्यास ) बतलाया है; और हमने यहभी बतलाया है, कि संस्कृत-साहित्यमें कर्मयोगकी उपपत्ति बतलानेवाला गीताके सिवा दूसरा ग्रंथ नहीं है, इसलिये अभ्यास और अपूर्वता इन दो प्रमाणोंसे गीतामें कर्मयोगकी प्रधानताही अधिक व्यक्त होती है। मीमांसकोंने ग्रंथ-तात्पर्यका निर्णय करनेके लिये जो कसौटियाँ बतलाई हैं, उनमेंसे अर्थवाद और उपपत्ति ये दोनों शेष रह गई थीं। उनके विषयमें पहले पृथक् पृथक् प्रकरणोंमें और अब गीताके अध्यायोंके क्रमानुसार इस प्रकरणमें जो विवेचन किया गया है, उससे यही निष्पन्न हुआ है, कि गीतामें अकेला 'कर्मयोग' ही प्रतिपाद्य विषय है। इस प्रकार ग्रंथतात्पर्य-निर्णयके मीमांसकोंके सब नियमोंका उपयोग करनेपर यही बात निर्विवाद सिद्ध होती है, कि गीता-ग्रंथमें ज्ञानमूलक और भक्ति-प्रधान कर्मयोगहीका प्रतिपादन किया गया है। अब इसमें संदेह नहीं, कि इसके अतिरिक्त शेष सब गीता-तात्पर्य
गीताध्याय-संगति ४६७ केवल सांप्रदायिक है। यद्यपि ये सब तात्पर्य सांप्रदायिक हों, तथापि यह प्रश्न किया जा सकता है, कि कुछ लोगोंको गीतामें ये सांप्रदायिक अर्थ — विशेषतः संन्यास-प्रधान अर्थ — ढूँढ़नेका मौक़ा कैसे मिल गया ? जबतक इस प्रश्नका भी विचार न हो जायगा, तब तक यह नहीं कहा जा सकता, कि सांप्रदायिक अर्थोंकी चर्चा पूरी हो चुकी है, इसलिये अब संक्षेपमें इसी बातका विचार किया जायगा, कि ये सांप्रदायिक टीकाकार गीताका संन्यास-प्रधान अर्थ कैसे कर सके, और फिर यह प्रकरण पूरा किया जायगा। हमारे शास्त्रकारोंका यह सिद्धान्त है, कि चूंकि मनुष्य बुद्धिमान् प्राणी है, इसलिये पिंड-ब्रह्मांडके तत्त्वको पहचाननाही उसका मुख्य काम या पुरुषार्थ है, और इसीको धर्मशास्त्रमें 'मोक्ष' कहते हैं। परंतु दृश्य सृष्टिके व्यवहारोंकी ओर ध्यान देकर शास्त्रोंमेंही यह प्रतिपादन किया गया है, कि पुरुषार्थ चार प्रकारके हैं — जैसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। यह पहलेही बतला दिया गया है, कि इस स्थानपर 'धर्म' शब्दका अर्थ व्यावहारिक, सामाजिक और नैतिक धर्म समझना चाहिये। अब पुरुषार्थको इस प्रकार चतुर्विध माननेपर यह प्रश्न सहजही उत्पन्न हो जाता है, कि पुरुषार्थके चारों अंग या भाग परस्पर पोषक हैं या नहीं ? इसलिये स्मरण रहे, कि पिंडमें और ब्रह्मांडमें जो तत्त्व है, उसका ज्ञान हुए बिना मोक्ष नहीं मिलता, फिर वह ज्ञान किसीभी मार्गसे प्राप्त हो। इस सिद्धान्तके विषयमें शाब्दिक मतभेद भलेही हो; परंतु तत्त्वतः कुछ मतभेद नहीं है। कमसे कम गीता-शास्त्रका तो यह सिद्धान्त सर्वथैव ग्राह्य है। इसी प्रकार गीताको यह तत्त्वभी पूर्णतया मान्य है, कि यदि अर्थ और काम, इन दोनों पुरुषार्थोंको प्राप्त करना हो, तो वेभी नीति- धर्मसेही प्राप्त किये जावें। अब केवल धर्म '(अर्थात् व्यावहारिक चातुर्वर्ण्य-धर्म) और मोक्षके पारस्परिक संबंधकाही निर्णय करना शेष रह गया। उनमेंसे धर्मके विषयमें तो यह सिद्धान्त सभी पक्षोंको मान्य है, कि धर्म के द्वारा चित्तको शुद्ध किये बिना मोक्षकी बात ही करना व्यर्थ है। परंतु इस प्रकार चित्तको शुद्ध करनेके लिये बहुत समय लगता है; इसलिये मोक्षकी दृष्टिसे विचार करनेपरभी यही सिद्ध होता है, कि तत्पूर्वकालमें पहले पहल संसारके सब कर्तव्योंको 'धर्म-से' पूरा कर लेना चाहिये (मनु. ६. ३५-३७)। संन्यासका अर्थ है 'छोड़ना'; और जिसने धर्मके द्वारा इस संसारमें कुछ प्राप्त या सिद्ध नहीं किया है वह त्यागही क्या करेगा ? अथवा जो 'प्रपंच' (सांसारिक कर्म) ही ठीक ठीक साध नहीं सकता, उस 'अभागी'से परमार्थभी कैसे ठीक सधेगा (दास. १२. १. १-१०; १२. ८. २१-३१)? किसीका अंतिम उद्देश्य या साध्य चाहे सांसारिक हो अथवा पारमार्थिक, परंतु यह बात प्रकट है, कि उसकी सिद्धिके लिये दीर्घ प्रयत्न, मनोनिग्रह और सामर्थ्य इत्यादि गुणोंकी एक-सी आवश्यकता होती है; और जिसमें ये गुण विद्यमान नहीं होते उसे किसीभी उद्देश्य या साध्यकी प्राप्ति नहीं होती। इस बातको मान लेनेपरभी कुछ
४६८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र लोग इससे आगे बढ़कर कहते हैं, कि जब दीर्घ प्रयत्न और मनोनिग्रहके द्वारा आत्मज्ञान हो जाता है, तब अंतमें संसारके विषयोपभोगरूपी सब व्यवहार निस्सार प्रतीत होने लगते हैं; और जिस प्रकार साँप अपनी निरुपयोगी केंचुलीको छोड़ देता है, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुषभी सब सांसारिक विषयोंको छोड़ केवल परमेश्वर-स्वरूपमेंही लीन हो जाया करते हैं (बृ. ४. ४. ७) । जीवन व्यतीत करनेके इस मार्गमें चूंकि सब व्यवहारोंका त्यागकर अंतमें केवल ज्ञानकोही प्रधानता दी जाती है, अतएव उसे ज्ञाननिष्ठा, सांख्यनिष्ठा अथवा सब व्यवहारोंका त्याग करनेसे संन्यास निष्ठाभी कहते हैं। परंतु इसके विपरीत गीताशास्त्रमें कहा है, कि आरंभमें चित्तकी शुद्धताके लिये 'धर्म'की आवश्यकता तो हैही, परंतु आगे चित्तकी शुद्धि होनेपरभी - स्वयं अपने लिये विषयोपभोगरूपी व्यवहार चाहे तुच्छ हो जावें; तोभी - उन्हीं व्यवहारोंको केवल स्वधर्म और कर्तव्य समझकर, लोकसंग्रहके लिये निष्काम बुद्धिसे करते रहना आवश्यक है। यदि ज्ञानी मनुष्य ऐसा न करेगा, तो लोगोंको आदर्श बतलानेवाला कोईभी न रहेगा, और फिर इस संसारका नाश हो जायगा। इस कर्मभूमिमें किसी- केभी कर्म छूट नहीं सकते; और यदि बुद्धि निष्काम हो जावे, तो कोईभी कर्म मोक्षके आड़े आ नहीं सकता। इसलिये संसारके कर्मोंका त्याग न कर सब व्यवहारोंको विरक्त-बुद्धिसे अन्य जनोंकी नाईं मृत्यपर्यंत करते रहनाही ज्ञानी पुरुषकाभी कर्तव्य हो जाता है। गीता-प्रतिपादित जीवन व्यतीत करनेके इस मार्गकोही कर्मनिष्ठा या कर्मयोग कहते हैं। परंतु यद्यपि कर्मयोग इस प्रकार श्रेष्ठ निश्चित किया गय- है, तथापि उसके लिये गीतामें संन्यास-मार्गकी कहींभी निंदा नहीं की गई है, उलटे, यह कहा है, कि वहभी मोक्षका देनेवालाही है। स्पष्टही है, कि सृष्टिके आरंभमें सनत्कुमार प्रभृतिने और आगे चल कर शुक-याज्ञवल्क्य आदि ऋषियोंने जिस मार्गका स्वीकार किया है, उसे भगवानभी किस प्रकार सर्वथैव त्याज्य कहेंगे ? संसारके व्यवहार किसी मनुष्यको अंशतः उसके प्रारब्ध-कर्मानुसार प्राप्त हुए जन्म-स्वभावसे नीरस या मधुर मालूम होते हैं; और यह पहले कह चुके हैं, कि ज्ञान हो जानेपरभी प्रारब्ध-कर्मको भोगे बिना छुटकारा नहीं। इसलिये इस प्रारब्ध-कर्मानुसार प्राप्त हुए जन्म-स्वभावके कारण यदि किसी ज्ञानी पुरुषका जी सांसारिक व्यवहारोंसे ऊब जावे; और यदि वह संन्यासी हो जाये, तो उसकी निंदा करनेसे कोई लाभ नहीं। आत्मज्ञानके द्वारा जिस सिद्ध पुरुषकी बुद्धि निःसंग और पवित्र हो गई है, वह इस संसारमें चाहे और कुछ करे, या न करे, परंतु इस बातको नहीं भूलना चाहिये, कि वह मानवी बुद्धिकी शुद्धताकी परम सीमा, और विषयोंमें स्वभावतः लुब्ध होनेवाली हठीली मनोवृत्तियोंको अपने ताबेमें रखनेकी सामर्थ्यकी पराकाष्ठा सब लोगोंको प्रत्यक्ष रीति-से दिखला देता है। उसका यह कार्य लोकसंग्रहकी दृष्टिसेभी कुछ छोटा नहीं है। लोगोंके मनमें संन्यास-धर्मके विषयमें जो आदर-बुद्धि विद्यमान है, उसका सच्चा कारण यही है; और मोक्षकी दृष्टिमे वह गीताकोभी संमत है। परंतु केवल
गीताध्याय-संगति ४६९ जन्म-स्वभावकी ओर, अर्थात् प्रारब्ध-कर्मकीही ओर ध्यान न देकर यदि शास्त्रकी नीतिके अनुसार इस बातका विचार किया जावे, कि जिसने पूरी आत्म-स्वतंत्रता प्राप्त कर ली है, उस ज्ञानी पुरुषको इस कर्म-भूमिमें किस प्रकार बर्ताव करना चाहिये; तो गीताके अनुसार यह सिद्धान्त करना पड़ता है, कि कर्मत्याग-पक्ष गौण है; और सृष्टिके आरंभमे मरीचि प्रभृतिने तथा आगे चल कर जनक आदिकोंने जिस कर्मयोगका आचरण किया है, उसीको ज्ञानी पुरुष लोकसंग्रहके लिये स्वीकार करे। क्योंकि, अब न्यायतः यही कहना पड़ता है, कि परमेश्वरकी निर्माण की हुई सृष्टिको चलानेका कामभी ज्ञानी मनुष्यकोही करना चाहिये; और, इस मार्गमे ज्ञान-सामर्थ्यके साथही कर्म-सामर्थ्यकाभी विरोधरहित मेल होनेके कारण, यह कर्मयोग केवल सांख्यमार्गकी अपेक्षा कहीं अधिक योग्यताका निश्चित होता है। सांख्य और कर्मयोग, इन दोनों निष्ठाओमें जो मुख्य भेद है, उसका उक्त रीति-से विचार करने पर सांख्य + निष्काम कर्म = कर्मयोग यह समीकरण निष्पन्न होता है, और वैशंपायनके कथनानुसार गीता-प्रतिपादन प्रवृत्ति-प्रधान कर्मयोगके प्रतिपादनमेंही सांख्य-निष्ठाके निरूपणकाभी सरलतासे समावेश हो जाता है (मभा. शां. ३४८. ५३) ; और इसी कारणसे गीताके संन्यास-मार्गीय टीकाकारोंको यह बतलानेके लिये अच्छा अवसर मिल गया है, कि गीतामें उनका सांख्य या संन्यास- मार्गही प्रतिपादित है। गीताके जिन श्लोकोंमें कर्मको श्रेयस्कर निश्चित कर कर्म करनेको कहा है, उन श्लोकोंकी ओर ध्यान न देनेसे अथवा यह मनगढ़ंत बात कह देनेसे, कि वे सब श्लोक अर्थवादात्मक अर्थात् आनुषंगिक एवं प्रशंसात्मक हैं या किसी अन्य युक्तिसे उपर्युक्त समीकरणके 'निष्काम कर्म' को उड़ा देनेसे, उसी समीकरणका 'सांख्य = कर्मयोग' यह रूपान्तर हो जाता है; और फिर यह कहनेके लिये अवसर मिल जाना है, कि गीतामें सांख्य-मार्गकाही प्रतिपादन किया है। परंतु इस रीतिसे गीताका अर्थ किया है, वह गीताके उपक्रमोपसंहारके अत्यंत विरुद्ध है; और इस ग्रंथमें हमने स्थान-स्थानपर स्पष्ट रीतिसे दिखला दिया है, कि गीतामें कर्मयोगको गौण तथा संन्यासको प्रधान मानना वैसेही अनुचित है, जैसे घर-मालिकको कोई उसीके घरमें पाहुना कह दे; और पाहुनेको घर-मालिक ठहरा दे; और जिन लोगोंका मत है, कि गीतामे केवल वेदान्त, केवल भक्ति या सिर्फ पातंजलयोगहीका प्रतिपादन किया गया है, उनके उन मतोंकाभी खंडन हम करही चुके हैं। गीतामें कौन-सी बात नहीं है? वैदिक धर्ममे मोक्ष-प्राप्तिके जितने साधन या मार्ग हैं, उनमेंसे प्रत्येक मार्गका कुछ-न-कुछ भाग गीतामें है; और इतना होनेपरभी, "भूतभृन्न च भूतस्थो"के (गीता ९. ५) न्यायसे गीताका सच्चा रहस्य इन मार्गोंकी अपेक्षा भिन्नही है। संन्यास-मार्ग अर्थात् उपनिषदोंका यह तत्त्व गीताको ग्राह्य है, कि ज्ञानके बिना मोक्ष नहीं; परंतु उसे निष्काम कर्मके साथ जोड़ देनेके कारण गीता-प्रतिपादित भागवत धर्ममेंही यति-धर्मकाभी सहजही समावेश हो गया है। तथापि गीताम