श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
अध्यायमे किये गये स्थितप्रज्ञके वर्णनहीके समान है। इससे यह बात प्रकट होती है, कि यद्यपि आरंभमे ज्ञान-मार्ग और भक्ति-मार्ग भिन्न हों, और यदि कोई अपने अधिकार-भेदके कारण ज्ञान-मार्गमे या भक्ति-मार्गमे चलने लगता है, तोभी अंतमें ये दोनों मार्ग एकत्र मिल जाते हैं, और जो गति ज्ञानीको प्राप्त होती है, वही गति भक्तकोभी मिला करती है। इन दो मार्गोंमें भेद सिर्फ़ इतनाही है, कि ज्ञान-मार्गमें आरंभहीमे बुद्धिके द्वारा परमेश्वर-स्वरूपके आकलन करना पड़ता है; भक्ति-मार्गमे यही तो ज्ञान श्रद्धाकी सहायतासे ग्रहणकर लिया जाता है। परंतु यह प्राथमिक भेद आगे नष्ट हो जाता है; और भगवान् स्वयं कहते हैं, कि :- श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः । ज्ञानं लब्ध्वा परां शांतिं अचिरेणाधिगच्छति ॥ “जब श्रद्धावान् मनुष्य इंद्रियनिग्रह-द्वारा ज्ञान-प्राप्तिका प्रयत्न करने लगता है; तब उसे ब्रह्मात्मैक्यरूप-ज्ञानका प्रत्यक्ष अनुभव होता है; और फिर उस ज्ञानसे उसे शीघ्रही पूर्ण शांति मिलती है” (गीता ४. ३९)। अथवा - भक्त्या मामभिजानाति यावान् यश्चास्मि तत्त्वतः । ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥* “मेरे (याने परमेश्वरके) स्वरूपका तात्त्विक ज्ञान भक्तिसे होता है; और जब यह ज्ञान हो जाता है, तब (पहले नहीं); भक्त मुझमें आ मिलता है” (गीता १८. ५५, ११. ५४) परमेश्वरका पूरा ज्ञान होनेके लिये इन दो मार्गोंके सिवा कोई तीसरा मार्ग नहीं है। इसलिये गीतामे यह बात स्पष्ट रीतिसे कह दी गई है, कि जिसे न तो स्वयं अपनी बुद्धि है और न श्रद्धाभी, उसका सर्वथा नाशही समझिये - “अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति” (गीता ४. ४०)। ऊपर कहा गया है, कि श्रद्धा और भक्तिसे अंतमें पूर्ण ब्रह्मात्मैक्य ज्ञान प्राप्त होता है। इसपर कुछ तार्किकोंका यह आक्षेप है, कि यदि भक्तिमार्गका प्रारंभ इस द्वैतभावसेही किया जाता है, कि उपास्य भिन्न है और उपासकभी भिन्न है, तो अंतमे ब्रह्मात्मैकरूप अद्वैत ज्ञान कैसे होगा? परंतु यह आक्षेप केवल भ्रांतिमूलक है। यदि ऐसे तार्किकोंके कथनका सिर्फ़ इतना अर्थ हो, कि ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञानके होनेपर भक्तिका प्रवाह रुक जाता है, तो उसमें कुछ आपत्ति दीख नहीं पड़ती। क्योंकि अध्यात्मशास्त्रकाभी यही सिद्धान्त है, कि जब उपास्य, उपासक और उपासनारूपी
- इस श्लोकके 'अभि' उपसर्गपर जोर देकर शांडिल्यसूत्रमे (सू १५) यह दिखलानेका प्रयत्न किया गया है, कि भक्ति ज्ञानका साधन नहीं है; किंतु वह स्वतंत्र साध्य या निष्ठा है। परंतु यह अर्थ अन्य सांप्रदायिक अर्थोंके समान आग्रहका है - सरल नहीं है।
४३० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र त्रिपुटीका लय हो जाता है; तब वह व्यापार बंद हो जाता है, जिसे व्यवहारमें भक्ति कहते हैं। परंतु यदि उक्त आक्षेपका यह अर्थ हो, कि द्वैतमूलक भक्ति-मार्गसे अंतमें अद्वैत-ज्ञान होही नहीं सकता; तो यह आक्षेप न केवल तर्कशास्त्रकी दृष्टिसे किंतु बड़े बड़े भगवद्भक्तोंके अनुभवके आधारसेभी मिथ्या सिद्ध हो सकता है। तर्कशास्त्रकी दृष्टिसे इस बातमें कुछ रुकावट नहीं दीख पड़ती, कि परमेश्वर- स्वरूपमें किसी भक्तका चित्त ज्यों ज्यों अधिकाधिक स्थिर होता जावें, त्यों त्यों उसके मनसे भेदभावभी छूटता चला जावे। ब्रह्म-सृष्टिमेंभी हम यही देखते हैं कि यद्यपि आरंभमें पारेकी बूँदे भिन्न भिन्न होती हैं; तथापि आपसमें मिल- कर उनके एकत्र होजानेमें कोई रुकावट नहीं आती। इसी प्रकार अन्य पदार्थोंमेंभी एकीकरणकी क्रियाका आरंभ प्राथमिक भिन्नताहीसे हुआ करता है; और भृंगी-कीटका दृष्टान्त तो सब लोगोंको विदितही है। परंतु इस विषयमें तर्कशास्त्रकी अपेक्षा साधुपुरुषोंके प्रत्यक्ष अनुभवकोही अधिक प्रामाणिक समझना चाहिये। अतः भगवद्भक्त-शिरोमणि तुकाराम महाराजका अनुभव हमारे लिये विशेष महत्त्वका है। सब लोग जानते हैं, कि, तुकाराम महाराजको कुछ उप- निषदादि ग्रंथोंके अध्ययनसे अध्यात्मज्ञान प्राप्त नहीं हुआ था; तथापि उनकी गाथामें लगभग साढ़ेतीनसो 'अभंग' अद्वैत-स्थितिके वर्णनमें कहे गये हैं, और इन सब अभंगोंमें "वासुदेवः सर्वम्” (गीता ७.१९) का भाव प्रतिपादित किया गया है; अथवा बृहदारण्यकोपनिषदमें जैसे याज्ञवल्क्यने 'सर्वमात्मैवाभूत्' कहा है, वैसेही अर्थका प्रतिपादन स्वानुभवसे किया गया है। उदाहरणके लिये उनके एक अभंगका (तु. गा. ३६२७) आशय देखिये – गुड़-सा मीठा है भगवान् बाहर-भीतर एक समान । किसका ध्यान करूँ सविवेक ? जलतरंगसे है हम एक ॥ इसके आरंभका उल्लेख हमने पहलेही अध्यात्म-प्रकरणमें किया है; और वहाँ यह दिखलाया है, कि उपनिषदोंमें वर्णित ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञानसे उसके अर्थकी किस तरह पूरी समता है। जब कि स्वयं तुकाराम महाराज अपने अनुभवसे भक्तोंकी परमा- वस्थाका वर्णन इस प्रकार कर रहे हैं, तब यदि कोई तार्किक यह कहनेका साहस करे, कि “भक्तिमार्गसे अद्वैतज्ञान हो नहीं सकता” अथवा देवताओंका केवल अंधविश्वास करनेसेही मोक्ष मिल जाता है, उसके लिये ज्ञानकी कोई आवश्यकता नहीं, तो इसे आश्चर्यही समझना चाहिये। भक्ति-मार्ग और ज्ञान-मार्गका अंतिम साध्य एकही है; और “परमेश्वरके अनुभवात्मक ज्ञानसेही अंतमें मोक्ष मिलता है,” यह सिद्धान्त दोनों मार्गोंमें एक- ही-सा बना रहता है। यही क्यों; बल्कि अध्यात्म-प्रकरणमें और कर्मविपाक प्रकरणमें पहले जो और सिद्धान्त बतलाये गये हैं; वेभी सब गीताके भक्ति-मार्गमें स्थिर रहते
है । उदाहरणार्थ, भागवत धर्ममें कुछ लोग इस प्रकार चतुर्व्यूहरूपी सृष्टिकी उत्पत्ति बतलाया करते हैं, कि वासुदेवरूपी परमेश्वरसे संकर्षणरूपी जीव उत्पन्न हुआ; और फिर संकर्षणसे प्रद्युम्न अर्थात् मन तथा प्रद्युम्नसे अनिरुद्ध अर्थात् अहंकार हुआ । दूसरे कुछ लोग तो इन चार व्यूहोंमेंसे तीन, दो या एक वासुदेवहीको मानते हैं - परंतु जीवकी उत्पत्तिके विषयमें ये मत सच नहीं है । उपनिषदोंके आधारपर वेदान्त सूत्रमें (वे. सू. २. ३. १७; २. २. ४२-४५) निश्चय किया गया है, कि अध्यात्म- दृष्टिसे जीव सनातन परमेश्वरहीका सनातन अंश है । इसलिये भगवद्गीतामें केवल भक्ति-मार्गकी उक्त चतुर्व्यूहसंबंधी कल्पना छोड़ दी गई है; और जीवके विषयमें वेदान्त-सूत्रकारोंका उपयुक्त सिद्धान्त दिया गया है (गीता २. २४; ८. २०; १३. २२; १५. ७) । इससे यही सिद्ध होता होता है, कि वासुदेवभक्ति और कर्मयोग ये दोनों तत्त्व गीतामें यद्यपि भागवत धर्मसेही लिये गये हैं, तथापि क्षेत्ररूपी जीव और परमेश्वरके स्वरूपके विषयमें अध्यात्मज्ञानसे भिन्न किन्हीं और ऊटपटाँग कल्पनाओको गीतामें स्थान नहीं दिया गया है । अब यद्यपि गीतामें भक्ति और अध्यात्म अथवा श्रद्धा और ज्ञानका पूरा पूरा मेल रखनेका प्रयत्न किया गया है, तथापि यह स्मरण रहे, कि जब अध्यात्मशास्त्रके सिद्धान्त भक्ति-मार्गमें लिये जाते हैं, तब उनमें कुछ-न-कुछ शब्दभेद अवश्य करना पड़ता है; और गीतामें ऐसा भेद किया भी गया है। ज्ञान-मार्गके और भक्ति-मार्गके इस शब्दभेदके कारण कुछ लोगोंने भूलसे समझ लिया है, कि गीतामें जो सिद्धान्त कभी भक्तिकी दृष्टिसे और कभी ज्ञानकी दृष्टिसे कहे गये हैं, उनमें परस्पर विरोध है; अतएव उतने भरके लिये गीता असंबद्ध है । परंतु हमारे मतसे यह विरोध वस्तुतः सच नहीं है; और हमारे शास्त्रकारोंने अध्यात्म तथा भक्तिमें जो मेल कर दिया है, उसकी ओर ध्यान न देनेसेही ऐसे विरोध दिखाई दिया करते हैं । इसलिये यहाँ इस विषयका कुछ अधिक स्पष्टीकरण कर देना चाहिये । अध्यात्मशास्त्रका सिद्धान्त है, कि पिंड और ब्रह्मांडमें एक-ही आत्मा नाम-रूपसे आच्छादित है, इसलिये अध्यात्मशास्त्रकी दृष्टिसे हम लोग कहा करते हैं, कि "जो आत्मा मुझमें है, वही प्राणियोंमेंभी है" - "सर्वभूतस्थ- मात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि" (गीता ६. २९) अथवा "यह सब आत्माही है" - "इदं सर्वमात्मैव" । परंतु भक्ति-मार्गमें अव्यक्त परमेश्वरहीको व्यक्त परमेश्वरका स्वरूप प्राप्त हो जाता है, अतएव अब उक्त सिद्धान्तके बदले गीतामें यह वर्णन पाया जाता है, कि "यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति" - मैं (भगवान्) सब प्राणियोंमें हूँ; और सब प्राणी मुझमें हैं (गीता ६. २९); "अथवा वासुदेवः सर्वमिति" जो कुछ है, वह सब वासुदेवमय है (गीता ७. १९); अथवा "येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि" - ज्ञान हो जानेपर तू सब प्राणियोंको मुझमें और स्वयं अपनेमेंभी देखेगा (गीता ४. ३५) । इसी कारणसे भागवत-पुराणमेंभी भगवद्गीताका यह लक्षण इस प्रकार कहा गया है :-
४३२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सर्वभूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः । भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः ॥ “ जो अपने मनमें यह भेदभाव नहीं रखता, कि मैं अलग हूँ; भगवान् अलग हैं; और सब लोग भिन्न हैं; किंतु जो सब प्राणियोंके विषयमें यह भाव रखता है, कि भगवान् और मैं दोनों एक हैं; और जो यह समझता है, कि सब प्राणी भगवानमें और मुझ- मेंभी हैं, वही सब भागवतोंमें श्रेष्ठ है" ( भाग. ११. २. ४५ ; ३. २७. ४६ ) । इसमे दीख पड़ेगा, कि अध्यात्मशास्त्रके 'अव्यक्त परमात्मा' शब्दोंके बदले 'व्यक्त परमेश्वर' शब्दोंका प्रयोग किया गया है – यही सब भेद हुआ है । अध्यात्मशास्त्रमें यह बात युक्तिवादसे सिद्ध हो चुकी है, कि परमात्माके अव्यक्त होनेके कारण सारा जगत् आत्ममय है । परंतु भक्ति-मार्ग प्रत्यक्ष अवगम्य है, इसलिये परमेश्वरकी अनेक व्यक्त विभूतियोंका वर्णन करके और अर्जुनको दिव्य-दृष्टि देकर प्रत्यक्ष विश्वरूप- दर्शनसे इस बातकी साक्षात्प्रतीति करा दी है, कि माग परमेश्वरमय जगत् (आत्म- मय) है ( गीता अ. १०, ११) । अध्यात्मशास्त्रमें कहा गया है, कि कर्मका क्षय ज्ञानसे होता है, परंतु भक्ति-मार्गका यह तत्त्व है, कि सगुण परमेश्वरके सिवा इस जगत्में और कुछ नहीं है – वही ज्ञान है, वही कर्म है, वही ज्ञाता है, वही करने- वाला, करानेवाला और फल देनेवालाभी है । अतएव संचित, प्रारब्ध, क्रियमाण इत्यादि कर्मभेदोंकी झंझटमें न पड़, भक्तिमार्गके अनुसार यह प्रतिपादन किया जाता है, किकर्म करनेकी बुद्धि देनेवाला, कर्मका फल देनेवाला और कर्मका क्षय करने- वाला एक परमेश्वरही है । उदाहरणार्थ, तुकाराम महाराज (तु. गा. ४९०) एकान्तमें ईश्वरकी प्रार्थना करके स्पष्टतासे पर प्रेमपूर्वक कहते हैं :- एक बात एकान्तमें सुन लो, जगदाधार । तारें मेरे कर्म तो प्रभुका क्या उपकार ? ॥ यही भाव अन्य शब्दोंमें दूसरे स्थानपर इस प्रकार व्यक्त किया गया है, कि " प्रारब्ध, क्रियमाण और संचितका झगड़ा भक्तोंके लिये नहीं है । देखो; सब कुछ ईश्वरही है, जो भीतर-बाहर सर्व-व्याप्त है" ( तु. गा. १०२३ ) । भगवद्गीताने यही कहा है, कि “ ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति " ( गीता. १८. ६१ ) - ईश्वरही सब लोगोंके हृदयमें निवास करके उनसे यंत्रके समान सब कर्म करवाता है । कर्म- विपाक-प्रक्रियामे सिद्ध किया गया है, कि ज्ञानकी प्राप्ति कर लेनेके लिये आत्माको पूरी स्वतंत्रता है; परंतु उसके बदले भक्ति-मार्गमें यह कहा जाता है, कि इस बुद्धिको देनेवाला परमेश्वरही है - " तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् " ( गीता ७. २१ ), अथवा " ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्तिते " ( गीता १०. १० ) । ऐसे बारह वर्णन किये गये हैं । इसी प्रकार संसारके सब कर्म परमेश्वरकीही सत्तासे हुआ करते हैं, इसलिये भक्ति-मार्गमें यह वर्णन पाया जाता है, कि वायुभी उसीके भयसे चलती है; और सूर्य तथा चंद्रभी उसीकी शक्तिसे चलते हैं ( कठ. ६. ३;
वृ. ३. ८. ९)। अधिक क्या कहा जाय; उसकी इच्छाके बिना पेड़का एक पत्तातक नहीं हिलता। यही कारण है, कि भक्तिमार्गमें यह कहते हैं, कि मनुष्य केवल निमित्तमात्रहीके लिये सामने रहता है (गीता ११. ३३); और उसके सब व्यवहार परमेश्वरही उसके हृदयमें निवास कर उससे कराया करता है। साधु तुकाराम (तु. गा. २३१०. ४) कहते हैं, कि "यह प्राणी केवल निमित्तहीके लिये स्वतंत्र है; 'मेरा मेरा' कहकर व्यर्थही यह अपना नाशकर लेता है।" इस जगतके व्यवहार और सुस्थितिको स्थिर रखनेके लिये सभी लोगोंको कर्म करना चाहिये। परंतु ईशावास्योपनिषद्का जो यह तत्त्व है- कि जिस प्रकार अज्ञानी लोग किसी कर्मको 'मेरा' कहकर किया करते हैं, वैसे न कर ज्ञानी पुरुषको ब्रह्मा- र्पणबुद्धिसे सब कर्म मृत्युपर्यंत करते रहना चाहिये, उक्त उपदेशका सारांश है। यही उपदेश भगवानने अर्जुनको इस श्लोकमें किया है:- यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ अर्थात् "जो कुछ तू करेगा, खायेगा, हवन करेगा, देगा या तप करेगा, वह सब मुझे अर्पण कर" (गीता ९. २७); इससे तुझे कर्मकी बाधा नहीं होगी। भगवद्- गीताका यही श्लोक शिवगीतामें (१४. ७५) पाया जाता है; और भागवतके इस श्लोकमेंभी उसी अर्थका वर्णन है:- कायेन वाचा मनसेंद्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वाऽनुसृतस्वभावात् । करोति यद्यत्सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयेत्तत् ॥ "काया, वाचा, मन, इंद्रिय, बुद्धि या आत्माकी प्रवृत्तिसे अथवा स्वभावके अनुसार जो कुछ हम किया करते हैं, वह सब परात्पर नारायणको समर्पण कर दिया जावे" (भाग. ११. २. ३६)। सारांश यह है, कि अध्यात्मशास्त्रमें जिसे ज्ञान-कर्म- समुच्चय पक्ष, फलाशात्याग अथवा ब्रह्मार्पणपूर्वक कर्म कहते हैं (गीता ४. २४; ५. १०; १२. १२), उसीको भक्ति-मार्गमें 'कृष्णार्पणपूर्वक कर्म' यह नया नाम मिल जाता है। भक्ति-मार्गवाले भोजनके समय 'गोविंद, गोविंद' कहा करते हैं; उसका रहस्य इस कृष्णार्पण-बुद्धिमेंही है। ज्ञानी जनकने कहा है, कि हमारे सब व्यवहार लोगोंके उपयोगके लिये निष्काम-बुद्धिसे हो रहे हैं; और भगवद्भक्तभी खाना, पीना, इत्यादि अपना सब व्यवहार कृष्णार्पण-बुद्धिमेंही किया करते हैं। उद्यापन, ब्राह्मण-भोजन अथवा अन्य इष्टापूर्त कर्म करनेपर अंतमें 'इदं कृष्णार्पण- मस्तु' अथवा 'हरिर्दाता हरिर्भोक्ता' कहकर पानी छोड़नेकी जो रीति है, उसका मूल तत्त्वभी भगवद्गीताके उक्त श्लोकमें है। यह सच है, कि जिस प्रकार बालियोंके न रहनेपरभी कानोंके छेद मात्र बाकी रह जाय, उसी प्रकार वर्तमान समयमें उक्त संकल्पकी दशा हो गई है, क्योंकि पुरोहित उस संकल्पके सच्चे अर्थको न समझकर गी. र. २८
४३४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सिर्फ तोतेकी नाईं उसे पढ़ा करता है; और यजमान बहिरेकी नाईं पानी छोड़नेकी कवायत किया करता है ! परंतु विचार करनेसे मालूम होता है, कि इसकी जड़में कर्म-फलाशाको छोड़कर कर्म करनेका तत्त्व है; और इसकी हँसी करनेसे शास्त्रमें तो कुछ दोष न ही आता; किंतु हँसी करनेवालेका अज्ञानही प्रकट होता है। यदि सारी आयुके कर्म - यहां तक कि जिंदा रहनेकाभी कर्म - इस प्रकार कृष्णार्पण-बुद्धिसे अथवा फलाशाका त्यागकर किये जावें, तो पापवासना कैसे रह सकती है ? और कुकर्म कैसे हो सकते हैं ? फिर लोगोंके उपयोगके लिये कर्म करो; संसारकी भलाईके लिये आत्मसमर्पण करो; इत्यादि उपदेश करनेकी आवश्यकताही कहाँ रह जाती है ? तब तो 'मैं' और 'लोग' इन दोनोंका समावेश परमेश्वरमें और परमेश्वरका समावेश इन दोनोंमें हो जाता है, इसलिये स्वार्थ और परार्थ दोनोंभी कृष्णार्पणरूपी परमार्थमें डूब जाते हैं; और तुकाराम महाराज जैसे महात्माओंकी यह उक्तिही चरितार्थ होती है, कि "संतोंकी विभूतियां जगतके कल्याणहीके लिये हुआ करती है; वे लोग परोपकारके लिये अपने शरीरको कष्ट दिया करते हैं।" पिछले प्रकरणमें युक्तिवादसे यह सिद्ध कर दिया गया है, कि जो मनुष्य अपने सब काम कृष्णार्पण-बुद्धिसे किया करता है, उसका 'योगक्षेम' किसी प्रकार रुक नहीं सकता; और भक्ति-मार्गवालोंको तो स्वयं भगवानने गीतामें आश्वासन दिया है, कि "तेषां नित्याभियुक्तानां योग- क्षेमं वहाम्यहम्" (गीता ९. २२)। यह कहनेकी आवश्यकता नहीं, कि जिस प्रकार ऊंचे दर्जेके ज्ञानी पुरुषका कर्तव्य है, कि वह सामान्य जनोंमें बुद्धिभेद न करके उन्हें सन्मार्गमें लगावें (गीता ३. २६), उसी प्रकार परम श्रेष्ठकाभी यही कर्तव्य है, कि वह निम्न श्रेणीके भक्तोंकी श्रद्धाको भ्रष्ट न कर, उनके अधिकारके अनुसारही उन्हें उन्नतिके मार्गमें लगा देवे। सारांश, उक्त विवेचनसे यह मालूम हो जायगा, कि अध्यात्मशास्त्रमें और कर्म-विपाकमें जो सिद्धान्त कहे गये हैं, वे सब कुछ शब्दभेदसे भक्ति-मार्गमेंभी स्थिर रखे गये हैं; और ज्ञान तथा भक्तिमें इस प्रकार मेलकर देनेकी पद्धति हमारे यहाँ बहुत प्राचीन समयसे प्रचलित है। परंतु जहाँ शब्दभेदमे अर्थके अनर्थ हो जानेका भय रहता है, वहाँ इस प्रकारमे शब्दभेदभी नही किया जाता; क्योकि अर्थही प्रधान बात है। उदाहरणार्थ, कर्म- विपाक-प्रक्रियाका सिद्धान्त है, कि ज्ञान-प्राप्तिके लिये प्रत्येक मनुष्य स्वयं प्रयत्न करे; और अपना उद्धार आपही कर ले। यदि इसमें शब्दोंका कुछ भेद करके यह कहा जाय, कि यह कामभी परमेश्वरही करता है; तो मूढ जन आलसी हो जावेंगे। इसलिये "आत्मैव ह्यात्मनो बंधुरात्मैव रिपुरात्मनः" - आप-ही अपना शत्रु और आप-ही अपना मित्र है (गीता ६. ५) - यह तत्त्व भक्ति-मार्गमेंभी प्रायः ज्यों- का-त्यों अर्थात् शब्दभेद न करके बतलाया जाता है। साधु तुकारामके इस भावका उल्लेख पहले हो चुका है, कि "इसमे किसीका क्या नुकसान हुआ ? अपनी बुराई अपने हाथोकर ली" (तु. गा. ४४४८)। इससेभी अधिक स्पष्ट शब्दोंमें उन्होंने
कहा है, कि “ईश्वरके पास कुछ मोक्षकी गठड़ी नहीं धरी है, कि वह किसीके हाथमें दे दे ।। यहाँ तो इंद्रियोंको जीतना और मनको निर्विषय करनाही मुख्य उपाय है (तु. गा. ४२९७)। क्या यह उपनिषदोंके इस मंत्रके - “ मन एव मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयोः ” के - समान नहीं है, जो पहले दसवें प्रकरणमें दिया जा चुका है। यह सच है, कि परमेश्वरही इस जगतकी सब घटनाओंका करने-करानेवाला है। परंतु उसपर निर्दयताका और पक्षपात करनेका दोष न लगाया जावे; इसलिये कर्म-विपाक-प्रक्रियामें जो यह सिद्धान्त कहा गया है, कि परमेश्वर प्रत्येक मनुष्यको उसके कर्मोंके अनुसार फल दिया करता है। वह सिद्धान्त इसी कारणसे, बिना किसी प्रकारका शब्दभेद कियेही भक्ति-मार्गमें ले लिया जाता है। इसी प्रकार यद्यपि उपा- सनाके लिये ईश्वरको व्यक्त मानना पड़ता है, तथापि अध्यात्मशास्त्रका यह सिद्धान्त- भी हमारे यहाँके भक्ति-मार्गमें कभी छूट नहीं जाता, कि जो कुछ व्यक्त है, वह सब माया है और सत्य परमेश्वर उसके परे है। पहले कह चुके हैं, कि इसी कारणसे गीतामें वेदान्तसूत्र-प्रतिपादित जीवका स्वरूपही स्थिर रखा गया है। मनुष्यके मनकी प्रत्यक्षकी ओर अथवा व्यक्तकी ओर झुकनेकी जो स्वाभाविक प्रवृत्ति हुआ करती है. उसमें और तत्त्वज्ञानके गहन सिद्धान्तोंमें मेलकर देनेकी वैदिक धर्मकी यह रीति किसीभी अन्य देशके लोगोंके भक्ति-मार्गमें दीख नहीं पड़ती। जब लोग एक बार परमेश्वरकी किसी सगुण विभूतिका स्वीकार कर व्यक्तका सहारा लेते हैं, तब उसीमें ऐसे आसक्त होकर फँस जाते हैं, कि उसके सिवा उन्हें और कुछ दीखही नहीं पड़ता; और उनके मनमें अपने अपने सगुण प्रतीकके विषयमें वृथाभिमान उत्पन्न हो जाता है। ऐसी अवस्थामें वे लोग यह मिथ्या भेद करनेका यत्न करने लगते हैं, कि तत्त्वज्ञानका मार्ग भिन्न है; और श्रद्धाका भक्ति-मार्ग भिन्न है। परंतु हमारे देशमें तत्त्वज्ञानका उदय बहुत प्राचीन कालमेंही हो चुका था, इसलिये गीता-धर्ममें श्रद्धा और ज्ञानका कुछभी विरोध नहीं है; बल्कि वैदिक ज्ञानमार्ग श्रद्धासे और वैदिक भक्ति-मार्ग ज्ञानसे, पुनीत हो गया है, अतएव मनुष्य किसीभी मार्गका स्वीकार क्यों न करे; अंतमें उसे एकही-सी सद्गति प्राप्त होती है। इसमें कुछ आश्चर्य नहीं, कि अव्यक्त ज्ञान और व्यक्त भक्तिके मेलका यह महत्त्व केवल व्यक्त क्राइस्टमेंही लिपटे रहनेवाले धर्मके पंडितोंके ध्यानमें नहीं आ सका, और इसलिये उनकी एक- देशीय तथा तत्त्वज्ञानकी दृष्टिसे कोती नजरसे गीता-धर्ममें उन्हें विरोध दीख पड़ने लगा। परंतु आश्चर्यकी बात तो यही है, कि वैदिक धर्मके इस गुणकी प्रशंसा न कर हमारे देशके कुछ अनुकरणप्रेमी जन आजकल इसी गुणकी निंदा करते देखे जाते हैं! माघ काव्यका ( १६. ४३ ) यह वचन इसी बातका एक अच्छा उदा- हरण है, कि “अथ वाऽभिनिविष्टबुद्धिषु । व्रजति व्यर्थकतां सुभाषितम् !” – खोटी समझसे जब एक बार मन ग्रस्त हो जाता है, तब मनुष्यको अच्छी बातेंभी ठीक नहीं जँचतीं।
४३६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र स्मार्तमार्गमें चतुर्थाश्रमका जो महत्त्व है, वह भक्ति-मार्गमें अथवा भागवत धर्ममें नहीं है। वर्णाश्रम-धर्मका वर्णन भागवत धर्ममेंभी किया जाता है; परंतु उस धर्मका सारा आधार भक्तिपरही होना है, इसलिये जिसकी भक्ति उत्कट हो, वही सबसे श्रेष्ठ माना जाता है – फिर चाहे वह गृहस्थ हो, वानप्रस्थ या बैरागी हो; इसके विषयमें भागवत धर्ममें कुछ विधिनिषेध नहीं है (भा. ११. १८. १३, १४)। संन्यास- आश्रम स्मार्त-धर्मका एक आवश्यक भाग है, भागवत धर्मका नहीं। परंतु ऐसा कोई नियम नहीं, कि भागवत धर्मके अनुयायी कभी विरक्त न हों; और गीतामेंही कहा है, कि संन्यास और कर्मयोग ये दोनों मोक्षकी दृष्टिसे समान योग्यताके हैं। इसलिये यद्यपि चतुर्थाश्रमका स्वीकार न किया जावे, तथापि सांसारिक कर्मोंको छोड़ बैरागी हो जानेवाले पुरुष भक्ति-मार्गमेंभी पाये जा सकते हैं। यह बात पूर्व समयसेही कुछ कुछ चली आ रही है। परंतु उस समय इन लोगोंको प्रभुता न थी; और ग्यारहवें प्रकरणमें यह बात स्पष्ट रीतिसे बतला दी गई है, कि भगवद्गीतामें कर्मत्यागकी अपेक्षा कर्मयोगहीको अधिक महत्त्व दिया गया है। कालांतरसे कर्मयोगका यह महत्त्व लुप्त हो गया; और वर्तमान समयमें भागवत धर्मीय लोगोंकोभी यही समझ हो गई है, कि भगवद्भक्त वही है, कि जो सांसारिक कर्मोंको छोड़, विरक्त होकर केवल भक्तिमेंही निमग्न हो जावे। इसलिये यहाँ भक्तिकी दृष्टिसे फिरभी कुछ थोड़ा-सा विवेचन करना आवश्यक प्रतीत होता है, कि इस विषयमें गीताका मुख्य सिद्धान्त और सच्चा उपदेश क्या है ? भक्ति-मार्गका अथवा भागवत धर्मका ब्रह्म स्वयं सगुण भगवान्ही हैं। यदि येही भगवान् स्वयं सारे संसारके कर्ता-धर्ता हैं, और साधुजनोंकी रक्षा करने तथा दुष्टजनोंको दंड देनेके लिये समय समयपर अवतार लेकर इस जगतका धारण-पोषण किया करते हैं, तो यह कहनेकी आवश्यकता नहीं, कि भगवद्भक्तोंकोभी लोकसंग्रहके लिये उन्हीं भगवान्का अनुकरण करना चाहिये। हनुमान्जी रामचंद्रके बड़े भक्त थे; परंतु उन्होंने रावण आदि दुष्टजनोंका निर्दलन करनेका काम कुछ छोड़ नहीं दिया था। भीष्मपितामहकी गणनाभी परम भगवद्- भक्तोंमें की जाती है; परंतु यद्यपि वे स्वयं मृत्युपर्यंत ब्रह्मचारी रहे, तथापि उन्होंने स्वधर्मानुसार स्वकीयोंकी और राज्यकी रक्षा करनेका काम अपने जीवनभर जारी रखा था। यह बात सच है, कि जब भक्तिके द्वारा परमेश्वरका ज्ञान प्राप्त हो गया हो, तब भक्तको स्वयं अपने हितके लिये कुछ प्राप्त कर लेना शेष नहीं रह जाता। परंतु प्रेममूलक भक्ति-मार्गमें दया, करुणा, कर्तव्य-प्रीति इत्यादि श्रेष्ठ मनो- वृत्तियोंका नाश नहीं हो सकता, बल्कि वे औरभी अधिक शुद्ध हो जाती हैं। ऐसी दशामें यह प्रश्नही नहीं उठ सकता, कि कर्म करें या न करें ? वरन् भगवद्भक्त तो वही है, कि जिसके मनमें ऐसा अभेदभाव उत्पन्न हो जाय :- जिसका कोई न हो हृदयसे उसे लगावे, प्राणिमात्रके लिये प्रेमकी ज्योति जगावे।
भक्तिमार्ग ४३७ सबमें विभुको व्याप्त जान सबको अपनावे, है बस ऐसा वही भक्तकी पदवी पावे। ऐसी अवस्थामें स्वभावतः उन लोगोंकी वृत्ति लोकसंग्रहके अनुकूल हो जाती है, जैसा कि ग्यारहवें प्रकरणमें कह चुके हैं - "संतोंकी विभूतियां जगतके कल्याणहीके लिये हुआ करती हैं। वे लोक परोपकारके लिये अपने शरीरको कष्ट दिया करते हैं।" जब यह मान लिया, कि परमेश्वरही इस सृष्टिको उत्पन्न करता है, और उसके सब व्यवहारोंकोभी किया करता है; तब यह अवश्यही मानना पड़ेगा, कि उसी सृष्टिके व्यवहारोंको सरलतासे चलानेके लिये चातुर्वर्ण्य आदि जो व्यवस्थाएँ हैं, वे उसीकी इच्छासे निर्मित हुई हैं। गीतामेंभी भगवानने स्पष्ट रीतिसे यही कहा है, कि "चातु- र्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्म विभागशः" (गीता ४. १३)। अर्थात् यह परमेश्वरहीकी इच्छा है, कि प्रत्येक मनुष्य अपने अपने अधिकारके अनुसार समाजके इन कामोंको लोकसंग्रहके लिये करता रहे। इसीसे आगे यहभी सिद्ध होता है, कि सृष्टिके जो व्यवहार परमेश्वरकी इच्छासे चल रहे हैं, उनका एक-आध विशेष भाग किसी मनुष्यके द्वारा पूरा करानेके लियेही परमेश्वर उसको उत्पन्न किया करता है; और यदि परमेश्वर-द्वारा नियत किया गया उसका यह काम मनुष्य न करे, तो परमेश्वर- हीकी अवज्ञा करनेका पाप उसे लगेगा। यदि तुम्हारे मनमें यह अहंकार-बुद्धि जागृत होगी, कि ये काम मेरे हैं अथवा मैं उन्हें अपने स्वार्थके लिये करता हूँ; तो उन कर्मोंके भले-बुरे फल तुम्हें अवश्य भोगने पड़ेंगे। परंतु यदि तुम इन्हीं कर्मोंको केवल स्वधर्म जानकर परमेश्वरार्पणपूर्वक इस भावसे करोगे, कि "परमेश्वरके मनमें जो कुछ करना है, उसके लिये मुझे निमित्त करके वह मुझसे काम कराता है" (गीता ११. ३३); तो उसमें कुछ अनुचित या अयोग्य नहीं। बल्कि गीताका यह कथन है, कि इस स्वधर्माचरणसेही सर्वभूतान्तर्गत परमेश्वरकी सात्त्विक भक्ति हो जाती है। भगवानने अपने सब उपदेशोंका तात्पर्य गीताके अंतिम अध्यायमें उपसंहाररूपसे अर्जुनको इस प्रकार बतलाया है, कि "सब प्राणियोंके हृदयमें निवास करके परमे- श्वरही उन्हें यंत्रके समान नचाता है; इसलिये ये दोनों भावनाएँ मिथ्या हैं, कि मैं अमुक कर्मको छोड़ता हूँ या अमुक कर्मको करता हूँ। फलाशाको छोड़ सब कर्म कृष्णार्पण-बुद्धिसे करते रहो। यदि तू ऐसा निग्रह करेगा, कि मैं इन कर्मोंको नही करता; तोभी प्रकृतिधर्मके अनुसार तुझे उन कर्मोंको करनाही होगा। अतएव परमे- श्वरमें अपने सब स्वार्थोंका लय करके स्वधर्मानुसार प्राप्त व्यवहारको परमार्थ-बुद्धिसे और वैराग्यसे लोकसंग्रहके लिये तुझे अवश्य करनाही चाहिये; मैंभी यही करता हूँ; मेरे उदाहरणको देख और उसके अनुसार बर्ताव कर।" जैसे ज्ञानका और निष्काम कर्मका विरोध नहीं, वैसेही भक्तिमें और कृष्णार्पण-बुद्धिसे किये गये कर्मोंमेंभी विरोध उत्पन्न नहीं होता। महाराष्ट्रके प्रसिद्ध भगवद्भक्त तुकाराम महाराजभी भक्तिके द्वारा परमेश्वरके "अणोरणीयान् महतो महीयान्" (कठ. २. २०; गीता ८. ९) -
४३८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र परमाणुसेभी छोटा और बड़ेसेभी बड़ा - ऐसे स्वरूपके साथ अपने तादात्म्यका वर्णन करके कहते हैं, कि "अब मैं केवल परोपकारहीके लिये बचा हूँ।" उन्होंने संन्यास- मार्गके अनुयायियोंके समान यह नहीं कहा, कि अब मेरा कुछभी काम शेष नहीं है (तु. गा. ३५८७)। बल्कि वे कहते हैं, कि "भिक्षापात्रका अवलंबन करना लज्जा- स्पद जीवन है, वह नष्ट हो जावे। नारायण ऐसे मनुष्यकी सर्वथा उपेक्षाही करता है।" (तु. गा. २५९५)। अथवा "सत्यवादी मनुष्य संसारके सब काम करता है; परंतु जलमें कमलपत्रके समान उनसे अलिप्त रहता है। जो उपकार करता है और प्राणियोंपर दया करता है, उसीमें आत्मस्थितिका निवास जानो" (तु. गा. ३७८०. २. ३)। इन वचनोंसे साधु तुकारामका इस विषयमें स्पष्ट अभिप्राय व्यक्त हो जाता है। यद्यपि तुकाराम महाराज संसारी थे, तथापि उनके मनका झुकाव कुछ कर्मत्यागहीकी ओर था। परंतु प्रवृत्तिप्रधान भागवत धर्मका लक्षण अथवा गीताका सिद्धान्त यह है, कि उत्कट भक्तिके साथ साथ मृत्युपर्यंत ईश्वरार्पणपूर्वक निष्काम कर्म करतेही रहना चाहिये; और यदि कोई इस सिद्धान्तका पूरा पूरा स्पष्टीकरण देखना चाहे, तो उसे श्रीसमर्थ रामदासस्वामीके दासबोध ग्रंथको ध्यानपूर्वक पढ़ना चाहिये (स्मरण रहे, कि साधु तुकारामनेही शिवाजी महाराजको जिन 'सद्गुरुकी शरण' में जानेको कहा था, उन्हींका यह प्रासादिक ग्रंथ है)। रामदासस्वामीने अनेक बार कहा है, कि भक्तिके द्वारा अथवा परमेश्वरके शुद्ध-स्वरूपको पहचान कर जो सिद्ध-पुरुष कृतकृत्य हो चुके हैं, वे "सब लोगोंको 'सयाना' बनानेके लिये" (दास. १९. १०. १६) जिस प्रकार निःस्पृहतासे अपना काम यथाधिकार किया करते हैं, उसे देखकर साधारण लोगभी अपना अपना व्यवहार करना सीखें; क्योंकि "बिना किये कुछभी नहीं होता" (दास. १९. १०. २५; १२. ९. ६; १८. ३. ३); और अंतिम दशकमें (दास. २०. ४. २६) उन्होंने कर्मकी सामर्थ्यका भक्तिकी तरफ शक्तिके साथ पूरा पूरा मेल इस प्रकार कर दिया है:- हलचलमें सामर्थ्य है। जो करेगा वही पावेगा। परंतु उसमें भगवान्का । अधिष्ठान चाहिये ॥ गीताके आठवें अध्यायमें अर्जुनको जो उपदेश किया गया है, कि "मामनुस्मर युध्य च" (गीता ८. ७) - नित्य मेरा स्मरण कर; और युद्ध कर - उसका तात्पर्य, और छठे अध्यायके अंतमें जो कहा है, कि "कर्मयोगियोंमें भक्तिमान् श्रेष्ठ है" (गीता ६. ४७) उसकाभी तात्पर्य वही है, कि जो रामदासस्वामीके उक्त वचनमें है। गीताके अठारहवें अध्यायमेंभी भगवानने यही कहा है :- यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् । स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥ "जिसने इस सारे जगत्को उत्पन्न किया है, उसकी अपने स्वधर्मानुरूप निष्काम कर्माचरणसे (न कि केवल वाचासे अथवा पुष्पोंसे) पूजा करके मनुष्य सिद्धि
भक्तिमार्ग ४३९ पाना है” (गीता १८. ४६)। अधिक क्या कहें, इस श्लोकका और समस्त गीता- काभी भावार्थ यही है, कि स्वधर्मानुरूप निष्काम कर्म करनेमे सर्वभूतान्तर्गत विराट्- रूपी परमेश्वरकी एक प्रकारकी भक्ति, पूजा या उपासनाही हो जाती है। ऐसा कहनेमे, कि “अपने धर्मानुरूप कर्मोंसे परमेश्वरकी पूजा करो,” यह नहीं समझना चाहिये, कि “श्रवणं कीर्तनं विष्णोः” इत्यादि नवविधा भक्ति गीताको मान्य नहीं। परंतु गीताका कथन है, कि कर्मोंको गौण समझकर उन्हें छोड़ देना और इस नव- विधा भक्तिमेंही बिल्कुल निमग्न हो जाना उचित नहीं है, शास्त्रतः प्राप्त अपने सब कर्मोंको यथोचित रीतिसे अवश्य करनाही चाहिये। परंतु उन्हें 'स्वयं अपने लिये' समझकर नहीं, किंतु परमेश्वरका स्मरणकर इस निर्मम बुद्धिसे करना चाहिये, कि “ईश्वरनिर्मित सृष्टिके संग्रहार्थ उसीके ये सब कर्म हैं।” ऐसा करनेसे कर्मका लोप नहीं होगा; उलटे इन कर्मोंसेही परमेश्वरकी सेवा, भक्ति वा उपासना हो जायगी, और उन कर्मोंके पाप-पुण्यके भागी हम न होकर अंतमें पूर्ण सद्गतिभी मिल जायगी। गीताके इस सिद्धान्तपर ध्यान न देकर गीताके भक्ति-प्रधान टीकाकार अपने ग्रंथोंमें यह भावार्थ बतलाया करते हैं, कि गीतामें भक्तिहीको प्रधान माना है; और कर्मको गौण। परंतु संन्यासमार्गीय टीकाकारोंके समान भक्ति-प्रधान टीका- कारोंका यह तात्पर्यार्थभी एक-पक्षीय है। गीता-प्रतिपादित भक्ति-मार्ग कर्म-प्रधान है; और उसका मुख्य तत्त्व यह है, कि परमेश्वरकी पूजा न केवल पुष्पोंसे वा वाचामेही होती है; किंतु वह स्वधर्मोक्त निष्काम कर्मोंसेभी होती है; और ऐसी पूजा प्रत्येक मनुष्यको अवश्य करनी चाहिये। जब कि कर्ममय भक्तिका यह तत्त्व गीताके समान अन्य किसीभी स्थानमें प्रतिपादित नहीं हुआ है, तब इसी तत्त्वको गीता- प्रतिपादित भक्ति-मार्गका विशेष लक्षण कहना चाहिये। इस प्रकार कर्मयोगकी दृष्टिसे ज्ञान-मार्ग और भक्ति-मार्गका पूरा पूरा मेल यद्यपि हो गया, तथापि ज्ञान-मार्गसे भक्ति-मार्गमें जो एक महत्त्वकी विशेषता है, उसकाभी अब अंतमें स्पष्ट रीतिसे वर्णन हो जाना चाहिये। यह तो पहलेही कह चुके हैं, कि ज्ञान-मार्ग केवल बुद्धिगम्य होनेके कारण अल्प बुद्धिवाले सामान्य जनोंके लिये क्लेशमय है; और भक्ति-मार्गके श्रद्धामूलक, प्रेमगम्य तथा प्रत्यक्ष होनेके कारण उसका आचरण करना सब लोगोंके लिये सुगम है। परंतु क्लेशके सिवा ज्ञान-मार्गमें एक औरभी अड़चन है। जैमिनीकी मीमांसा, या उपनिषद् और वेदान्त-सूत्रोंको देखें, तो मालूम होगा, कि उनमें श्रौत-यज्ञयाग आदिकी अथवा कर्म-संन्यासपूर्वक 'नेति नेति'- स्वरूपी परब्रह्मकीही चर्चा भरी पड़ी है; और अंतमें यही निर्णय किया है, कि स्वर्ग- प्राप्तिके लिये साधनभूत होनेवाले श्रौत यज्ञ-यागादिक कर्म करनेका अथवा मोक्ष- प्राप्तिके लिये आवश्यक उपनिषदादि वेदाध्ययन करनेका अधिकारभी पहले तीन वर्णोंके पुरुषोंको है (वे. सू. १. ३. ३४-३८)। इन ग्रंथोंमें इस बातका विचार नहीं किया गया है, कि उक्त तीन वर्णोंका, स्त्रियोंको अथवा चातुर्वर्ण्यके अनुसार सारे
४४० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र समाजके हितके लिये खेती या अन्य व्यवसाय करनेवाले साधारण स्त्री-पुरुषोंको मोक्ष कैसे मिले। अच्छा; स्त्री-शूद्रादिकोंके साथ वेदोंकी ऐसी अनबन होनेसे यदि यह कहा जाय, कि उन्हें मुक्ति कभी मिलही नहीं सकती; तो उपनिषदों और पुराणोंमेंही ऐसे वर्णन पाये जाते हैं, कि गार्गी प्रभृति स्त्रियोंको और विदुर प्रभृतिको ज्ञानकी प्राप्ति होकर सिद्धि मिल गई थी (वे. सू. ३. ४. ३६-३९) । ऐसी दशामें यह सिद्धान्त नहीं किया जा सकता, कि सिर्फ पहले तीन वर्णोंके पुरुषोंहीको मुक्ति मिलती है; और यदि यह मान लिया जावे, कि स्त्री-शूद्र आदि सभी लोगोंको मुक्ति मिल सकती है; तो अब बतलाना चाहिये, कि उन्हें किस साधनसे ज्ञानकी प्राप्ति होगी। बादरायणाचार्य कहते हैं, कि 'विशेषानुग्रहश्च' (वे. सू. ३. ४. ३८) अर्थात् परमेश्वरका विशेष अनुग्रहही उनके लिये एक साधन है; और भागवतमें (भाग. १. ४. २५) कहा है, कि कर्म-प्रधान भक्ति-मार्गके रूपमें इसी विशेषानु- ग्रहात्मक साधनका "महाभारतमें और अतएव गीतामेंभी निरूपण किया गया है, क्योंकि स्त्रियों, शूद्रों या (कलियुगके) नामधारी ब्राह्मणोंके कानोंतक श्रुतिकी आवाज नहीं पहुँचती है।" इस मार्गसे प्राप्त होनेवाला ज्ञान और उपनिषदोंका ब्रह्मज्ञान - दोनों यद्यपि एकहीसे हों, तथापि अब स्त्री-पुरुषसंबंधी या ब्राह्मण-क्षत्रिय- वैश्य-शूद्रसंबंधी कोई भेद शेष नहीं रहता; और इस मार्गके विशेष गुणके बारेमें गीता कहती है, कि- मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ॥ स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥ "हे पार्थ! स्त्री, वैश्य और शूद्र या अंत्यज आदि जो पाप-योनियोंमें उत्पन्न हुए हैं, मेरा आश्रय करके वेभी सब उत्तम गति पा जाते हैं" (गीता. ९. ३२)। यही श्लोक महाभारतके अनुगीता पर्वमेंभी आया है (मभा. अश्व. १९. ६१); और ऐसी कथाएँभी हैं, कि वनपर्वान्तर्गत ब्राह्मण-व्याध-संवादमें मांस बेचनेवाले व्याधने किसी ब्राह्मणको, तथा शांतिपर्वमें तुलाधारने अर्थात् बनियेने जाजलि नामक तपस्वी ब्राह्मणको, यह निरूपण सुनाया है, कि स्वधर्मके अनुसार निष्काम बुद्धिसे आचरण करनेही मोक्ष कैसे मिल जाता है (मभा. वन. २०६--२१४; शां. २६०-२६३) इनसे प्रकट होता है, कि जिसकी बुद्धि सम हो जावे, वही श्रेष्ठ है, फिर चाहे वह सुनार हो, बढ़ई हो, बनिया हो या कसाई। किसी मनुष्यकी योग्यता उसके धंधेपर, व्यवसायपर या जातिपर, अवलंबित नहीं; किंतु सर्वथा उसके अंतःकरणकी शुद्धतापर अवलंबित होती है; और यही भगवान्काभी अभिप्राय है। इस प्रकार किसी समाजके सब लोगोंके लिये मोक्षके दरवाजे खुल जानेसे, उस समाजमें जो एक प्रकारकी विलक्षण जागृति उत्पन्न होती है, उसका स्वरूप महाराष्ट्रके भागवत धर्मके इतिहासमे भली भाँति दीख पड़ता है। परमेश्वरको क्या स्त्री, क्या चांडाल क्या ब्राह्मण-सभी समान हैं; "देव भावका भूखा है"- न प्रतीकका, न
काले-गोरे वर्णका; और न स्त्री-पुरुष आदि या ब्राह्मण-चांडाल आदि भेदोंकाभी। साधु तुकारामका इस विषयका अभिप्राय, इस हिंदी पदसे प्रकट हो जायगा :- क्या द्विजति क्या शूद्र ईशको वेश्या भी भज सकती है, श्वपचोंकोभी भक्तिभावमें शुचिता कब तज सकती है। अनुभवसे कहता हूँ, मैने उसे कर लिया है बस में, जो चाहे सो पिये प्रेमसे अमृत भरा है इस रसमें ॥ अधिक क्या कहें ? गीताशास्त्रकाभी यह सिद्धान्त है, कि “ मनुष्य कितनाभी दुरा- चारी क्यों न हो; परन्तु यदि अंतकालमें वह अनन्य भावसे भगवान्की शरणमें जावे तो परमेश्वर उसे नही भूलता ” ( गीता ९. ३०; ८. ५-८ )। उक्त पद्यमें 'वेश्या' शब्दको (जो साधु तुकाराम महाराजके मूल वचनके आधारमे रखा गया है) देखकर, पवित्रताका ढोंग करनेवाले बहुतेरे विद्वानोंका कदाचित् बुरा लगे। परंतु सच बात तो यह है, कि ऐसे लोगोंको सच्चा धर्म-तत्त्व मालूमही नहीं है। न केवल हिंदु धर्ममें, किंतु बौद्ध धर्ममेंभी यही सिद्धान्त स्वीकार किया गया है ( मिलिंदप्रश्न ३. ७ २ ); और उनके धर्म-ग्रंथोंमें ऐसी कथाएँ हैं, कि बुद्धने आम्रपाली नामक किसी वेश्याको और अंगुलीमाल नामके चोरको दीक्षा दी थी। ईसाइयोके धर्म ग्रंथमेंभी यह वर्णन है, कि ईसाके साथ जो दो चोर सूलीपर चढ़ाये गये थे, उनमेसे एक चोर मृत्युके समय ईसाकी शरणमें गया; और ईसाने उसे सद्गति दी ( ल्यूक. २३. ४२, ४३ )। स्वयं ईसानेभी एक स्थानमें कहा है, कि हमारे धर्ममें श्रद्धा रखनेवाली वेश्याएँभी मुक्त हो जाती हैं ( मेथ्यु. २१. ३१; ल्यूक. ७. ५० )। यह बात दसवें प्रकरणमें हम बतला चुके हैं, कि अध्यात्मशास्त्रकी दृष्टिमेभी यही सिद्धान्त निष्पन्न होता है। परंतु यह धर्म-तत्त्व शास्त्रतः यद्यपि निर्विवाद है ; तथापि जिसका सारा जन्म दुराचरणमें व्यतीत हुआ है, उसके अंतःकरणमें केवल मृत्युके समयही अनन्य भावसे भगवान्की शरणमें जानेकी बुद्धि कैसे जागृत रह सकती है ? ऐसी अवस्थामें अंतः- कालकी वेदनाओंको सहते हुए केवल यंत्रके समान एक बार 'रा' कहकर और कुछ देरसे 'म' कहकर, मुँह खोलने और बंद करनेके परिश्रमके सिवा कुछ अधिक लाभ नहीं होता। इसलिये भगवानने सब लोगोंम निश्चित रीतिसे कहा है, कि “ न केवल मृत्युके समयही किंतु सारे जीवनभर सदैव मेरा स्मरण मनमें रहने दो; और स्वधर्मके अनुसार अपने सब व्यवहारोंको परमेश्वरार्पणबुद्धिसे करते रहो, फिर चाहे तुम किसीभी जातिके रहो, तोभी तुम कर्मोको करते हुएभी मुक्त हो जाओगे ” ( गीता ९. २६-२८, ३०-३४ )। इस प्रकार उपनिषदोंका ब्रह्मात्मैक्य ज्ञान आबालवृद्ध सभी लोगोंके लिये सुलभ तो कर दिया गया है; परंतु ऐसा करते समय न तो व्यवहारका लोप होने दिया है; और न वर्ण, आश्रम, जाति-पांति अथवा स्त्री-पुरुष आदिका कोईभी भेद रखा गया है। जब हम गीता-प्रतिपादित भक्ति-मार्गकी इस शक्ति अथवा समताकी
४४२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र ओर ध्यान देते हैं, तब गीताके अंतिम अध्यायमें भगवान्ने प्रतिज्ञापूर्वक गीताशास्त्रका जो उपसंहार किया है, उसका मर्म प्रकट हो जाता है। वह ऐसा है - " सब धर्म छोड़कर मेरे अकेलेकी शरणमें आ जा; मैं तुझे सब पापोंसे मुक्त करूँगा, घबराना नहीं।" यहाँपर धर्म शब्दका उपयोग इसी व्यापक अर्थमें किया गया है, कि सब व्यवहारोंको करते हुएभी पाप-पुण्यमे अलिप्त रहकर परमेश्वर-रूपी प्राप्ति या आत्मश्रेय जिस मार्ग प्रत्यक्ष उपायके द्वारा संपादन किया जा सकता है, वही धर्म है। अनुगीताके गुरुशिष्य-संवादमें ऋषियोंने ब्रह्मासे यह प्रश्न किया (अश्व. ४९), कि अहिंसाधर्म, सत्यधर्म, व्रत तथा उपवास ज्ञान, यज्ञयाग, दान, कर्म, संन्यास आदि जो जो अनेक प्रकारके मुक्तिके साधन अनेक लोग बतलाते हैं, उनमेंसे सच्चा साधन कौन है ? शांतिपर्वके (मभा. शां. ३५४) उच्छवृत्ति उपाख्यानमेंभी यह प्रश्न है, कि गार्हस्थ्यधर्म, वानप्रस्थधर्म, राजधर्म, मातृ-पितृसेवा-धर्म, क्षत्रियोंका रणांगणमें मरण, ब्राह्मणोंका स्वाध्याय, इत्यादि जो अनेक धर्म या स्वर्ग-प्राप्तिके साधन शास्त्रोंमें बत- लाये हैं, उनमेंसे ग्राह्य धर्म कौन है ? ये भिन्न धर्म-मार्ग या धर्म दिखनेमें तो परस्पर- विरुद्ध मालूम होते हैं, परंतु शास्त्रकार इन सब प्रत्यक्ष मार्गोंकी योग्यताको एक-सीही समझते हैं, क्योंकि समस्त प्राणियोंमें साम्य-बुद्धि रखनेका जो अंतिम साध्य है, वह इनमेंसे किसीभी धर्मपर प्रीति और श्रद्धाके साथ मनको एकाग्र किये बिना प्राप्त नहीं हो सकता ! तथापि, इन अनेक मार्गोंकी अथवा प्रतीक-उपासनाकी झंझटमें फँसनेसे मन घबग जा सकता है, इसलिये अकेले अर्जुनकोही नहीं; किंतु उसे निमित्त करके सब लोगोंको भगवान् इस प्रकार निश्चित आश्वासन देते हैं, कि चित्त-शुद्धिके इन अनेक धर्म-मार्गोंको छोड़कर "तू केवल मेरी शरणमें आ; मैं तुझे समस्त पापोंसे मुक्त कर दूँगा; डर मत।" साधु तुकारामभी इसी प्रकार सब धर्मोंका निरसन करके अंतमें भगवानसे यही माँगते हैं, कि :- चतुराई चेतना सभी चुल्हेमें जावें, बस मेरा मन एक ईश-चरणाश्रय पावे । आग लगे आचार-विचारोंके उपचयमें, उस विभु का विश्वास सदा दृढ रहे हृदयमें ॥ निश्चयपूर्वक उपदेशकी या प्रार्थनाकी अंतिम सीमा हो चुकी । श्रीमद्भगवद्गीतारूपी सोनेकी थालीका यह भक्तिरूपी अंतिम कौर है, यही प्रेमग्रास है। इसे पा चुके, अब आगे चलिये।
चौदहवाँ प्रकरण गीताध्याय-संगति प्रवृत्तिलक्षणं धर्मं ऋषिर्नारायणोऽब्रवीत् । * – महाभारत, शांति. ३४७. २ अबतक किये गये विवेचनमे दीख पड़ेगा, कि भगवद्गीतामें अर्थात् भगवानके द्वारा गाये गये उपनिषद्में यह प्रतिपादन किया गया है, कि कर्मोंको करते हुएही अध्यात्मविचारसे या भक्तिसे सर्वात्मैकरूप साम्य-बुद्धि पूर्णतया प्राप्त कर लेना; और उसे प्राप्त कर लेनेपरभी संन्यास लेनेकी झंझटमें न पड़ संसारमें शास्त्रतः प्राप्त सब कर्मोंको केवल अपना कर्तव्य समझकर करते रहनाही, इस संसारमें मनुष्यका परम पुरुषार्थ अथवा जीवन व्यतीत करनेका उत्तम मार्ग है। परंतु जिस क्रमसे हमने इस ग्रंथमें उक्त अर्थका वर्णन किया है, उसकी अपेक्षा गीता ग्रंथका क्रम भिन्न है; इसलिये अब यहभी देखना चाहिये, कि भगवद्गीतामें उस विषयका वर्णन किस प्रकार किया गया है। किसीभी विषयका निरूपण दो रीतियोंसे किया जाता है: एक शास्त्रीय और दूसरी पौराणिक । शास्त्रीय पद्धति वह है, कि जिसके द्वारा तर्क- शास्त्रानुसार साधकबाधक प्रमाणोंको क्रमसहित उपस्थित करके यह दिखला दिया जाता है, कि सब लोगोंकी समझमे सहजही आ सकनेवाली बातोंसे किसी प्रतिपाद्य विषयके मूलतत्त्व किस प्रकार निष्पन्न होते हैं । भूमितिशास्त्र इस पद्धतिका एक अच्छा उदाहरण है; और न्यायसूत्र या वेदान्त-सूत्रका उपपादनभी उसी वर्गका है । इसीलिये भगवद्गीतामें जहाँ ब्रह्मसूत्र याने वेदान्त-सूत्रोंका उल्लेख किया है, वहाँ यहभी वर्णन है, कि उसका विषय हेतुयुक्त और निश्चयात्मक प्रमाणोंसे सिद्ध किया गया है – “ ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ” (गीता १३. ४) परंतु भगवद्गीताका निरूपण सशास्त्र भलेही हो; तथापि वह इस शास्त्रीय पद्धतिमें नहीं किया गया है। भगवद्गीतामें जो विषय है, उसका वर्णन अर्जुन और श्रीकृष्णके संवादरूपमें अत्यंत मनोरंजक और सुलभ रीतिसे किया गया है। इसीलिये प्रत्येक अध्यायके अंतमें “ भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे ” कहकर आगे गीतानिरूपणके स्वरूपके द्योतक ‘श्रीकृष्णार्जुनसंवादे’ इन शब्दोंका उपयोग किया गया
- “ नारायण ऋषिने धर्मको प्रवृत्तिप्रधान बतलाया है।” नर और नारायण नामक ऋषियोंमेंसेही ये नारायण ऋषि हैं। पहले बतला चुके हैं, कि इन्हीं दोनोंके अवतार श्रीकृष्ण और अर्जुन थे। इसी प्रकार महाभारतका वह वचनभी पहले उद- धृत किया गया है; जिससे यह मालूम होता है, कि गीतामें नारायणीय धर्मकाही प्रतिपादन किया गया है।
४४४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
है । इस निरूपणमें और 'शास्त्रीय' निरूपणमें जो भेद है, उसको स्पष्टतासे बतलानेके लिये हमने संवादात्मक निरूपणकोही 'पौराणिक' नाम दिया है । सात सौ श्लोकोंके इस संवादात्मक अथवा पौराणिक निरूपणमे 'धर्म' जैसे व्यापक शब्दमें शामिल होनेवाले सभी विषयोंका विस्तारपूर्वक विवेचन कभी होही नही सकता । परंतु आश्चर्यकी बात है, कि गीतामें जो अनेक विषय उपलब्ध होते हैं, उनकाही संग्रह ( संक्षेपमेंही क्यों न हो ) अविरोधसे कैसे किया जा सका ! इस बातसे गीताकारकी अलौकिक शक्ति व्यक्त होती है; और अनुगीताके आरंभमें जो यह कहा गया है, कि गीताका उपदेश " अत्यंत योगयुक्त चित्तसे " बतलाया गया है, उसकी सत्यताकी प्रतीतिभी हो जाती है । अर्जुनको जो विषय पहलेसेही मालूम थे, उन्हें फिरसे विस्तारपूर्वक कहनेकी कोई आवश्यकता नही थी । उसका मुख्य प्रश्न तो यही था, कि मैं लड़ाईका घोर कृत्य करूं या न करूं ? और करूंभी तो किस प्रकार करूं ? जब श्रीकृष्ण अपने उत्तरमे एकाध युक्ति बतलाते थे, तब अर्जुन उसपर कुछ-न-कुछ आक्षेप किया करता था । इस प्रकारके प्रश्नोत्तररूपी संवादमें गीताका विवेचन स्वभावहीसे कहीं संक्षिप्त और कहीं द्विरुक्त हो गया है । उदाहरणार्थ, त्रिगुणात्मक प्रकृतिके फैलावका वर्णन कुछ थोड़े भेदसे दो जगह है ( गीता अ. ७. १४ ) ; और स्थितप्रज्ञ, भगवद्भक्त, त्रिगुणातीत, तथा ब्रह्मभूत इत्यादिकी स्थितिका वर्णन एक-सा होनेपरभी, भिन्न भिन्न दृष्टियोंसे प्रत्येक प्रसंगपर बार बार किया गया है । इसके विपरीत " यदि अर्थ और काम धर्मसे विभक्त न हों, तो वे ग्राह्य हैं " - इस तत्त्वका दिग्दर्शन गीतामें केवल " धर्माविरुद्धः कामोऽस्मि " (गीता ७. ११) इसी एक वाक्यमें कर दिया गया है। इसका परिणाम यह होता है, कि यद्यपि गीतामे सब विषयोंका समावेश किया गया है, तथापि गीता पढ़ते समय उन लोगोंके मन उलझनमें पड़ जाते हैं; जो श्रौत धर्म, स्मार्त धर्म, भागवत धर्म, सांख्यशास्त्र, पूर्वमीमांसा, वेदान्त, कर्म-विपाक इत्यादिके उन प्राचीन सिद्धान्तोंकी परंपरासे परिचित नहीं हैं, कि जिनके आधारपर गीताके ज्ञानका निरूपण किया गया है। और जब गीताके प्रतिपादनकी पद्धति ठीक ठीक ध्यानमें नहीं आती, तब वे लोग कहने लगते हैं कि, गीता मानों बजी- गरकी झोली है; अथवा शास्त्रीय पद्धतिके प्रचारके पूर्व गीताकी रचना हुई होगी; इसलिये उसमे स्थान-स्थानपर अधूरापन और विरोध दीख पड़ता है, अथवा गीताका ज्ञानही हमारी बुद्धिके लिये अगम्य है ! इस संशयको हटानेके लिये यदि टीकाओंका अवलोकन किया जाय, तो उनमेभी कुछ लाभ नहीं होता, क्योंकि वे बहुधा भिन्न भिन्न संप्रदायानुसार बनी हैं ! इसलिये टीकाकारोंके मतोंके परस्पर-विरोधोंकी एकवाक्यता करना असंभव-सा हो जाता है; और पढ़नेवालेका मन अधिकाधिक घबराने लगता है। इस प्रकारके भ्रममें पड़े हुए कई सुप्रबुद्ध पाठकोंको हमने देखा है। इस अड़चनको हटानेके लिये हमने अपनी बुद्धिके अनुसार गीताके प्रतिपाद्य विषयोंका शास्त्रीय क्रम बाँधकर अबतक विवेचन किया है। अब यहाँ इतना और
गीताध्याय-संगति ४४५ बतला देना चाहिये, कि येही विषय श्रीकृष्ण और अर्जुनके संभाषणमे, अर्जुनके प्रश्नों या शंकाओंके अनुरोधसे, कुछ न्यूनाधिक होकर कैसे उपस्थित हुए हैं। इससे यह विवेचन पूरा हो जायगा; और अगले प्रकरणमें सुगमतासे सब विषयोंका उपसंहार कर दिया जायगा। पाठकोंको प्रथम इस ओर ध्यान देना चाहिये, कि जब हमारा हिंदुस्थान देश ज्ञान, वैभव, यश और स्वराज्यके सुखका अनुभव ले रहा था, उस समय एक सर्वज्ञ, महापराक्रमी, यशस्वी और परमपूज्य क्षत्रियने दूसरे क्षत्रियको, जो महान् धनुर्धारी था, क्षात्र धर्मके स्वकार्यमें प्रवृत्त करनेके लिये गीताका उपदेश किया है। जैन और बौद्ध धर्मोंके प्रवर्तक महावीर और गौतम बुद्धभी क्षत्रियही थे। परंतु इन दोनोंने वैदिक धर्मके केवल संन्यास-मार्गको अंगीकार कर क्षत्रिय आदि सब वर्णोंके लिये संन्यास-धर्मका दरवाजा खोल दिया था; परंतु भगवान् श्रीकृष्णने ऐसा नहीं किया, क्योंकि भागवत-धर्मका यह उपदेश है, कि न केवल क्षत्रियोंको परंतु ब्राह्मणोंकोभी निवृत्ति-मार्गकी शांतिके साथ साथ निष्काम-बुद्धिसे सब कर्म आमरणान्त करते रहनेका प्रयत्न करना चाहिये। किसीभी प्रकारका उपदेश करनेके लिये किसी-न-किसी कारणकी आवश्यकता होती है, और उस उपदेशकी सफलताके लिये शिष्यके मनमें उस उपदेशका ज्ञान प्राप्त कर लेनेकी इच्छाभी प्रथमहीसे जागृत रहनी चाहिये। अतएव इन दोनों बातोंका स्पष्टीकरण करनेके लियेही व्यासजीने, गीताके पहले अध्यायमें, इस बातका विस्तारपूर्वक वर्णन कर दिया है, कि श्रीकृष्णने अर्जुनको यह उपदेश क्यों दिया है। कौरव-पांडवोंकी सेनाएँ युद्धके लिये तैयार होकर कुरुक्षेत्रपर खड़ी हैं; थोड़ीही देरमें लड़ाई छिड़नेवालीही थी, कि इतनेमें अर्जुनके कहनेसे श्रीकृष्णने उसका रथ दोनों सेनाओंके बीचमें ले जाकर खड़ा कर दिया; और अर्जुनसे कहा, कि “तुझे जिनसे युद्ध करना है, उन भीष्म, द्रोण आदिको देख।” तब अर्जुनने दोनों सेनाओंकी ओर दृष्टि पहुँचाई और देखा, कि अपनेही बापदादा, काका, आजा, मामा, बंधु, पुत्र नाती, स्नेही, आप्त, गुरु, गुरुबंधु आदि दोनों सेनाओंमें खड़े हैं; और इस युद्धमें सब लोगोंका नाश होनेवाला है! लड़ाई एकाएक उपस्थित नहीं हुई थी; लड़ाई करनेका निश्चय पहलेही हो चुका था; और बहुत दिनोंसे दोनों ओरकी सेनाओंका प्रबंध हो रहा था। परंतु इस आपसकी लड़ाईसे होनेवाले कुलक्षयका प्रत्यक्ष स्वरूप जब पहले पहल अर्जुनकी नजरमें आया, तब उसके समान महायोद्धाकेभी मनमें विषाद उत्पन्न हुआ; और उसके मुखसे ये शब्द निकल पड़े, “ओह ! आज हम लोग अपनेही कुलका भयंकर क्षय इसीलिये करनेवाले हैं न, कि राज्य हमींको मिले; इसकी अपेक्षा भिक्षा मांगना क्या बुरा है ?” और इसके बाद उसने श्रीकृष्णसे कहा, कि “शत्रु चाहे मुझे जानसे मार डाले, मुझे इसकी चिंता नहीं; परंतु त्रैलोक्यके राज्यके लियेभी मैं पितृहत्या, गुरुहत्या, बंधुहत्या या कुलक्षयके समान घोर पातक करना नहीं चाहता।” उसकी सारी देह थर-थर काँपने लगी; हाथ-पैर
४४६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
शिथिल हो गये; मुह सूख गया; और खिन्नवदन हो अपने हाथका धनुष्यबाण फेंक- कर वह बेचारा रथमें चुपचाप बैठ गया। इतनी कथा पहले अध्यायमें है। इस अध्यायको 'अर्जुन-विषादयोग' कहते हैं। क्योंकि यद्यपि पूरी गीतामें ब्रह्मविद्यान्तर्गत- (कर्म) योगशास्त्र नामक एक ही विषय प्रतिपादित हुआ है; तोभी प्रत्येक अध्यायमें जिस विषयका वर्णन प्रधानतासे किया जाता है, उस विषयको इस कर्म- योग शास्त्रकाही एक भाग समझना चाहिये; और ऐसा समझकरही प्रत्येक अध्यायको उसके विषयानुसार अर्जुन-विषादयोग, सांख्ययोग, कर्मयोग इत्यादि भिन्न भिन्न नाम दिये गये हैं। इन सब 'योगों'को एकत्र करनेसे "ब्रह्मविद्याका कर्मयोग- शास्त्र" हो जाता है! पहले अध्यायकी कथाका महत्त्व हम इस ग्रंथके आरंभमें कह चुके हैं। इसका कारण यह है, कि जबतक हम उपस्थित प्रश्नके स्वरूपको ठीक तौरसे जान न लें, तबतक उस प्रश्नका उत्तरभी भली भाँति हमारे ध्यानमें नहीं आता। यदि कहा जाय, कि गीताका यही तात्पर्य है, कि "सांसारिक कर्मोंसे निवृत्त होकर भगवद्भजन करो या संन्यास ले लो;" तो फिर अर्जुनको उपदेश करनेकी कुछ आवश्यकताही न थी, क्योंकि वह तो लड़ाईका घोर कर्म कर भिक्षा माँगनेके लिये आप-ही-आप तैयार हो गया था। पहलेही अध्यायके अंतमें श्रीकृष्णके मुखसे ऐसे अर्थका एक-आध श्लोक कहलाकर वहीं गीताकी समाप्ति कर देनी चाहिये थी, "वाह! क्या ही अच्छा कहा! तेरी इस उपरतीको देख मुझे आनंद मालूम होता है। चल, हम दोनों इस कर्ममय संसारको छोड़ संन्यासाश्रमके द्वारा या भक्तिके द्वारा अपने आत्माका कल्याण कर लें!" फिर, इधर लड़ाई हो जानेपर व्यासजी उसका वर्णन करनेमें तीन वर्षतक (मभा. आ. ६२. ५२) अपनी वाणीका भलेही दुरुपयोग करते रहते; परंतु उसका दोष बेचारे अर्जुन और श्रीकृष्णपर तो आरोपित न हुआ होता। हाँ; यह सच है, कि कुरुक्षेत्रमें जो सैकड़ों महारथी एकत्र हुए थे, वे अवश्यही अर्जुन और श्रीकृष्णका उपहास करते; परंतु जिसको अपने आत्माका कल्याणकर लेना है, वह ऐसे उपहासकी चिंताही क्यों करता? संसार कुछभी कहे; उपनिषदोंमें तो यही कहा है, कि "यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेत्" (जा. ४) - जिस क्षण उपरति हो, उसी क्षण संन्यास धारण करो; विलंब न करो। यदि यह कहा जाय, कि अर्जुनकी उपरति ज्ञानपूर्वक न थी, वह केवल मोहकी थी; तोभी वह थी तो उपरतिही। बस; उपरति होनेसे आधा काम हो चुका, अब मोहको हटाकर उसी उपरतिका पूर्ण ज्ञानमूलक कर देना भगवानके लिये कुछ असंभव बात न थी। भक्ति-मार्गमें या संन्यास-मार्गमेंभी ऐसे अनेक उदाहरण हैं; कि जब कोई किसी कारणसे संसारसे उकता गये, तो वे दुःखित हो इस संसारको छोड़ जंगलमें चल गये; और आगे उन लोगोंने पूरी सिद्धीभी प्राप्त कर ली है। इसी प्रकार अर्जुनकीभी यही दशा कर दी होती। ऐसा तो भी होही नहीं सकता था, कि कभी संन्यास लेनेके समय वस्त्रोंको गेरुआ रंग देनेके लिये मुट्ठीभर लाल मिट्टी, या
भक्तिमें भगवन्नाम-संकीर्तन करनेके लिये झांझ, मृदंग आदि सामग्री सारे कुरु- क्षेत्रमेंभी न मिलती। परंतु ऐसा कुछभी न करके उलटे दूसरे अध्यायके आरंभमेंही श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा है, कि "अरे ! तुझे यह दुर्बुद्धि (कश्मल) कहाँसे सूझ पड़ी? यह नामर्दी (क्लैब्य) तुझे शोभा नहीं देती। यह तेरी कीर्तिको धूलिमें मिला देगी। इसलिये इस दुर्बलताका त्याग कर युद्धके लिये खड़ा हो जा।" परंतु अर्जुनने किसी अबलाकी तरह अपना रोनाधोना जारी रक्खा और वह अत्यंत दीनहीन वाणीमे बोला- "मैं भीष्म, द्रोण आदि महात्माओंको कैसे मारूँ? मेरा मन इसी संशयमें चक्कर खा रहा है, कि मरना भला है, या मारना? इसलिये मुझे यह बतलाओ, कि इन दोनोंमें कौन-सा धर्म श्रेयस्कर है। मैं तुम्हारी शरणमें आया हूँ।" अर्जुनकी इन बातोंको सुनकर श्रीकृष्ण जान गये, कि अब यह मायाके चंगुलमें फँस गया है, इसलिये जग हँसकर उन्होंने उसे 'अशोच्यानन्वशोचस्त्वम्' इत्यादि ज्ञान बतलाना आरंभ किया। अर्जुन ज्ञानी पुरुषके सदृश बर्ताव करना चाहता था; और वह कर्म- संन्यासकी बातेंभी करने लग गया था। इसलिये, संसारमें ज्ञानी पुरुषके आचरणके जो दो पंथ अथवा निष्ठाएँ दीख पड़ती हैं-अर्थात्, 'कर्म करना' और 'कर्म छोड़ना' वहींसे भगवान्ने उपदेशका आरंभ किया है; और अर्जुनको पहली बात यही बतलाई है, कि इन दो पंथो या निष्ठाओंमेंसे तू किसीकोभी ले; परंतु तू भूल कर रहा है। इसके बाद, जिस ज्ञान या सांख्यनिष्ठाके आधारपर अर्जुन कर्म-संन्यासकी बातें करने लगा था, उसी सांख्यनिष्ठाके आधारपर श्रीकृष्णने प्रथम 'एषा तेऽभिहिता बुद्धिः" (गीता. २. ११-३९) तक उपदेश किया है, और फिर अध्यायके अंत- तक कर्मयोग-मार्गके अनुसार अर्जुनको यही बतलाया है, कि युद्धही तेरा सच्चा कर्तव्य है। यदि "एषा तेऽभिहिता सांख्ये" सरीखा श्लोक 'अशोच्यानन्वशोचस्त्वम्' श्लोकके पहले आता, तो यही अर्थ औरभी अधिक व्यक्त हो गया होता। परंतु संभाषणके प्रवाहमें सांख्य-मार्गका प्रतिपादन हो जानेपर वह इस रूपमें आया है- "यह तो सांख्य-मार्गके अनुसार प्रतिपादन हुआ; अब योगमार्गके अनुसार प्रति- पादन करता हूँ।" कुछभी हो; परंतु अर्थ एकही है। हमने ग्यारहवें प्रकरणमें सांख्य (या संन्यास) और योगका (या कर्मयोग) भेद पहलेही स्पष्ट करके बतला दिया है। इसलिये उसकी पुनरावृत्ति न कर इतनाही कह देते हैं, कि चित्तकी शुद्धताके लिये स्वधर्मानुसार वर्णाश्रम-विहित कर्म करके ज्ञान-प्राप्ति होनेपर मोक्षके लिये अंतमें सब कर्मोंको छोड़ संन्यास लेना सांख्य-मार्ग है; और कर्मोंका कभी त्याग न कर अंततक उन्हें निष्काम बुद्धिसे करते रहना योग अथवा कर्मयोग है। अर्जुनसे भगवान् प्रथम यह कहते हैं, कि सांख्य-मार्गके अध्यात्मज्ञानानुसार आत्मा अविनाशी और अमर है, इसलिये तेरी यह समझ गलत है, कि "मैं भीष्म, द्रोण आदिको मारूँगा।" क्योंकि न तो आत्मा मरता है; और न मारताही है। जिस प्रकार मनुष्य अपने वस्त्र
४५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र बदलता है, उसी प्रकार आत्मा एक देह छोड़कर दूसरी देहमें चला जाता है; परंतु इससे उसे मृत मानकर शोक करना उचित नहीं। अच्छा; मान लिया, कि 'मैं मारूँगा' यह भ्रम है, तबभी तू कहेगा, कि युद्धही क्यों करना चाहिये ? तो उसका उत्तर यह है, कि शास्त्रतः प्राप्त हुए युद्धसे परावृत्त न होनाही क्षत्रियोंका धर्म है; और जब कि इस सांख्य-मार्गमें प्रथमतः वर्णाश्रम-विहित कर्म करनाही श्रेयस्कर माना जाता है; तब यदि तू वैसा न करेगा, तो लोग तेरी निंदा करेंगे - अधिक क्या कहें, युद्धमें मरनाही क्षत्रियोंका धर्म है। फिर व्यर्थ शोक क्यों करता है ? "मैं मारूँगा और वह मरेगा" यह केवल कर्मदृष्टि है - इसे छोड़ दे; तू अपना प्रवाहपतित कार्य ऐसी बुद्धिसे करता चला जा, कि मैं केवल स्वधर्म कर रहा हूँ; इससे तुझे कुछभी पाप नहीं लगेगा : यह उपदेश सांख्य मार्गानुसार हुआ। परंतु चित्तकी शुद्धताके लिये प्रथमतः कर्म करके चित्तशुद्धि हो जानेपर अंतमें सब कर्मोंको छोड़ संन्यास लेनाही यदि इस मार्गके अनुसार श्रेष्ठ माना जाता है, तो यह शंका रहही जाती है, कि उपति होतेही युद्धको छोड़ (यदि हो सके तो) एकदम संन्यास ले लेना क्या अच्छा नहीं है ? केवल इतना कह देनेसे काम नहीं चलता, कि मनु आदि स्मृतिकारोंकी आज्ञा है, कि गृहस्था- श्रमके बाद फिर कहीं बुढ़ापेमें संन्यास लेना चाहिये, युवावस्थामें तो गृहस्थाश्रमीही होना चाहिये। क्योंकि किसीभी समय यदि संन्यास लेनाही श्रेष्ठ है, तो ज्योंही संसारसे जी हटा, त्योंही तनिकभी देर न कर संन्यास लेना उचित है; और इसी हेतुसे उपनिषदोंमेंभी ऐसे वचन पाये जाते हैं, कि "ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत् गृहाद्वा वनाद्वा" (जा. ४)। संन्यास लेनेसे जो गति प्राप्त होगी, वही युद्धक्षेत्रमें मरनेसे क्षत्रियको प्राप्त होती है। महाभारतमें कहा है :- द्वाविमौ पुरुषव्याघ्र सूर्यमंडलभेदिनौ । परिव्राड् योगयुक्तश्च रणे चाभिमुखो हतः ॥ "हे पुरुष-व्याघ्र ! सूर्यमंडलको पार कर ब्रह्मलोकको जानेवाले केवल दोही पुरुष हैं। एक तो योगयुक्त संन्यासी और दूसरा युद्धमें लड़कर मर जानेवाला वीर" (उद्यो. ३२. ६५)। इसी अर्थका एक श्लोक कौटिल्यके, याने चाणक्यके अर्थ- शास्त्रमेंभी है. - यान् यज्ञसंघैस्तपसा च विप्राः स्वर्गैषिणः पात्रचयैश्च यान्ति । क्षणेन तानप्यतियान्ति शूराः प्राणान् सुयुद्धेषु परित्यजन्तः ॥ स्वर्गकी इच्छा करनेवाले ब्राह्मण अनेक यज्ञोंसे, यज्ञपात्रोंसे और तपोंसे जिस लोकमें जाते हैं, उस लोककेभी परे युद्धमें प्राण अर्पण करनेवाले शूर पुरुष एक क्षणमें जा पहुँचते हैं - अर्थात् न केवल तपस्वियोंको या संन्यासियोंको वरन् यज्ञयाग आदि करनेवाले दीक्षितोंकोभी जो गति प्राप्त होती है, वही युद्धमें मरनेवाले क्षत्रियकोभी मिलती है (कौटि. १०. ३. १५०-५२; महा. शां. ९८-१००)। "क्षत्रियको