भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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' देवताओंकी भक्ति करनेवाले देवलोकमें, पितरोंकी भक्ति करनेवाले पितृलोकमें, भूतोंकी भक्ति करनेवाले भूतोंमें जाते हैं; और मेरी भक्ति करनेवाले मेरे पास आते हैं ' ( गीता ९. २५ ) । या - ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् । " जो जिस प्रकार मुझे भजते हैं, उसी प्रकार मैं उन्हें भजता हूँ" (गीता ४. ११) । सब लोग जानते हैं, कि शालग्राम सिर्फ एक पत्थर है। उसमें यदि विष्णुका भाव रखा जाय, तो विष्णुलोक मिलेगा; और यदि उसी प्रतीकमें यक्ष, राक्षस आदि भूतोंकी भावना रखके उसकी पूजा की जाय, तो यक्ष, राक्षस आदि भूतोंकेही लोक प्राप्त होंगे। यह सिद्धान्त हमारे सब शास्त्रकारोंको मान्य है, कि फल हमारे भावमें है; प्रतीकमें नहीं और लौकिक व्यवहारमेंभी किसी मूर्तिकी पूजा करनेके पहले उसकी प्राणप्रतिष्ठाभी करनेकी जो रीति है, उसकाभी रहस्य यही है। जिस देवताकी भावनासे उस मूर्तिकी पूजा करनी हो उस देवताकी प्राणप्रतिष्ठा उस मूर्तिमें करते हैं। मूर्तिमें परमेश्वरकी भावना न रख कोई यह समझकर उसकी पूजा या आराधना नहीं करते कि वह मूर्ति केवल किसी विशिष्ट आकारकी; मिट्टी, पत्थर या धातु है, और यदि कोई ऐसा करेभी, तो गीताके उक्त सिद्धान्तके अनुसार उसको मिट्टी, पत्थर या धातुहीकी दशा निस्सन्देह प्राप्त होगी। जब प्रतीकमें और स्थापित या आरोपित प्रतीकमें हमारे आंतरिक भावमें इस प्रकार भेदकर लिया जाता है, तब केवल प्रतीकके विषयमें झगड़ा करते रहनेका कोई कारण नहीं रह जाता। क्योंकि, अब तो यह भावही नहीं रहता, कि प्रतीकही देवता है। सब कर्मोंके फलदाता और सर्वसाक्षी परमेश्वरकी दृष्टि अपने भक्तजनोंके भावकी ओरही रहा करती है। इसी- लिये साधु तुकाराम कहते हैं, कि " देव भावकाही भूखा है !" - प्रतीकका नहीं। भक्ति-मार्गका यह तत्त्व जिसे भली भांति मालूम हो गया है उसके मनमें यह दुराग्रह नहीं रहने पाता, कि " मैं जिस ईश्वरस्वरूप या प्रतीककी उपासना करता हूँ, वही सच्चा है; और अन्य सब मिथ्या हैं; " किंतु उसके अंतःकरणमें ऐसी उदार-बुद्धि जागृत हो जाती है, कि " किसीका प्रतीक कुछभी हो; परंतु जो लोग उसके द्वारा परमेश्वरका भजन-पूजन किया करते हैं, वे सब एकही परमेश्वरसे जा मिलते हैं।" और तब उसे भगवान्के इस कथनकी प्रतीति होने लगती है, कि - येऽप्यन्यदेवताभक्ताः यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥ " चाहे विधि अर्थात् बाह्योपचार या साधन शास्त्रके अनुसार न हो; तथापि अन्य देवताओंका श्रद्धापूर्वक (याने उनमें शुद्ध परमेश्वरका भाव रखकर) यजन करने- वाले लोग ( पर्यायसे) मेराही यजन करते हैं ' ( गीता ९. २३ ) । भागवतमेंभी इसी अर्थका वर्णन कुछ शब्दभेदके साथ किया गया है (भाग. १०. पू. ४०. ८-१०); शिवगीतामें तो उपर्युक्त श्लोकही ज्यों-का-त्यों पाया जाता है (शिव. १२. ४);