भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 468, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 468

भक्तिमार्ग ४२३ मूर्तिमें या पत्थरोंकी इमारतोंमें नहीं है; किंतु उस प्रतीकमें उपासक अपने सुभीतेके लिये जो उस प्रतीकसेभी श्रेष्ठ ईश्वरभावना रखता है, वही यथार्थमें तारक होती है। चाहे प्रतीक पत्थरका हो, मिट्टीका हो, धातुका हो या अन्य किसी पदार्थका हो; उसकी योग्यता 'प्रतीक'से अधिक कभी नहीं हो सकती। इस प्रतीकमें जैसा हमारा भाव होगा, ठीक उसीके अनुसार हमारी भक्तिका फल परमेश्वर — प्रतीक नहीं — हमें दिया करता है। फिर ऐसा बखेड़ा मचानेसे क्या लाभ, कि हमारा प्रतीक श्रेष्ठ है और तुम्हारा निकृष्ट ? यदि भाव शुद्ध न हो, तो केवल प्रतीककी उत्तमतासेही क्या लाभ होगा ? दिनभर लोगोंको धोखा देने और फँसानेका धंधा करके सुबह- शाम या किसी त्योहारके दिन देवालयमें देवदर्शनके लिये, अथवा किसी निराकार देवके मंदिरमें उपासनाके लिये, जानेसे परमेश्वरकी प्राप्ति होना असंभव है। कथा सुननेके बहाने देवालयमें जानेवाले कुछ मनुष्योंका वर्णन रामदासस्वामीने इस प्रकार किया है — “कोई कोई विषयी लोग कथा सुननेके बहानेसे आते हैं और स्त्रियोंकीही ओर घूरा करते हैं; चोर लोग पादत्राण ( जूते ) चुरा ले जाते हैं” (दास. १८. १०. २६)। यदि केवल देवालयमें या देवताकी मूर्तिहीमें तारक-शक्ति हो तो ऐसे लोगोंकोभी मुक्ति मिल जानी चाहिये। कितनेक लोगोंकी समझ है, कि परमेश्वरकी भक्ति केवल मोक्षहीके लिये की जाती है; परंतु जिन्हें कोई व्यावहारिक या स्वार्थकी वस्तु चाहिये, वे भिन्न भिन्न देवताओंकी आराधना करें और गीतामेंभी इस बातका उल्लेख किया गया है, कि ऐसी स्वार्थ-बुद्धिसे वे लोग भिन्न भिन्न देवताओंकी पूजा किया करते हैं ( गीता ७. २०)। परंतु इसके आगे गीताहीका कथन है, कि यह समझ तात्त्विक दृष्टिसे सच नहीं मानी जा सकती, कि इन देवताओंकी आराधना करनेसे वे स्वयं कुछ फल देते हैं ( गीता ७. २१)। अध्यात्मशास्त्रका यह चिर- स्थायी सिद्धान्त है ( वे. सू. ३. २. ३८-४१); और यही सिद्धान्त गीताकोभी मान्य है ( गीता ७. २२), कि मनमें किसीभी वासना या कामनाको रखकर किसीभी देवताकी आराधना की जावे; उसका फल सर्वव्यापी परमेश्वरही दिया करता है, न कि देवता। यद्यपि फलदाता परमेश्वर इस प्रकार एकही हो, तथापि वह प्रत्येकके भले-बुरे भावोंके अनुसार भिन्न भिन्न फल दिया करता है ( वे. सू. २. १. ३४-३७)। इसलिये यह दीख पड़ता है, कि भिन्न भिन्न देवता- ओंकी या प्रतीकोंकी उपासनाके फलभी भिन्न भिन्न होते हैं। इसी अभिप्रायको मनमें रखकर भगवान्ने अन्यत्रभी कहा है :— श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः। “मनुष्य श्रद्धामय है। प्रतीक कुछभी हो; परंतु जिसकी जैसी श्रद्धा होती है, वैसाही वह हो जाता है” ( गीता १७. ३, मैत्र्यु. ४. ६)। अथवा — यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन् यान्ति पितृव्रताः । भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक) · पृष्ठ 468, कुल 956 में से · BharatKosha