श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र परमेश्वर हो नहीं सकता । अधिक क्या कहें, नाम-रूपात्मक व्यक्त अर्थात् सगुण वस्तुओंमेंसे किसीकोभी लीजिये; वह मायाही है। जो सत्य परमेश्वरको देखना चाहता है, उसे इस सगुण रूपकेभी परे अपनी दृष्टिको ले जाना चाहिये । यह प्रकट है, कि भगवान्की जो अनेक विभूतियाँ हैं, उनमें अर्जुनको दिखलाये गये विश्वरूपसे अधिक व्यापक और कोईभी विभूति हो नहीं सकती। परंतु जब यही विश्वरूप भगवान्ने नारदको दिखलाया, कि तब उन्होंने कहा है, कि “तू मेरे जिस रूपको देख रहा है, कि वह सत्य नहीं है, यह माया है; मेरे सत्य स्वरूपको देखनेके लिये इसकेभी आगे तुझे जाना चाहिये” (मभा. शां. ३३९. ४४); और गीतामेंभी भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनसे स्पष्ट रीतिसे यही कहा है :– अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ “यद्यपि मैं अव्यक्त हूँ, तथापि मूर्ख लोग मुझे व्यक्त (गीता ७. २४) अर्थात् मनुष्यदेहधारी मानते हैं (गीता ९. ११); परंतु यह बात सच नहीं है। मेरा अव्यक्त स्वरूपही सत्य है।” इसी तरह उपनिषदोंमेंभी यद्यपि उपासनाके लिये मन, वाचा, सूर्य, आकाश इत्यादि अनेक व्यक्त या अव्यक्त ब्रह्मप्रतीकोंका वर्णन किया गया है, तथापि अंतमें यह कहा है, कि जो वाचा, नेत्रों या कानोंको गोचर हो वह ब्रह्म नहीं; जैसे :– यन्मनसा न मनुते येनाऽऽहुर्मनो मतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ “मनसे जिसका मनन नहीं किया जा सकता, किंतु मनही जिसकी मनन-शक्तिमें आ जाता है, उसे तू सत्य ब्रह्म समझ । जिसकी (प्रतीक समझकर) उपासना की जाती है, वह (सत्य) ब्रह्म नहीं है” (केन. १. ५-८)। 'नेति नेति' सूत्रकाभी यही अर्थ है । मन या आकाशको लीजिये अथवा व्यक्त उपासना मार्गके अनुसार शालग्राम, शिवलिंग इत्यादिको लीजिये, या श्रीराम, कृष्ण आदि अवतारी पुरुषोंकी अथवा साधु-पुरुषोंकी व्यक्त मूर्त्तिका चिंतन कीजिये, मंदिरोंमें शिलामय अथवा धातुमय देवकी मूर्तिको देखिये, अथवा बिना मूर्त्तिका मंदिर, या मसजिद लीजिये; – ये सब छोटे बच्चेकी ढकेलगाड़ीके समान मनको स्थिर करनेके लिये अर्थात् चित्तकी वृत्तिको परमेश्वरकी ओर झुकानेके साधन हैं। प्रत्येक मनुष्य अपनी अपनी इच्छा और अधिकारके अनुसार उपासनाके लिये किसी प्रतीकका स्वीकारकर लेता है। यह प्रतीक चाहे कितनाही प्यारा हो; परंतु इस बातको नहीं भूलना चाहिये, कि सत्य परमेश्वर इस “प्रतीकमें नहीं है” – “न प्रतीके न हि सः” (वे. सू. ४. १. ४) – उसके परे है। इसी हेतुसे भगवद्गीतामेंभी सिद्धान्त किया गया है, कि “जिन्हें मेरी माया मालूम नहीं होती, वे मूढ़ जन मुझे नहीं जानते” (गीता ७. १३-१५)। भक्ति-मार्गमें मनुष्यका उद्धार करनेकी जो शक्ति है, वह सजीव अथवा निर्जीव