भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 466

भक्तिमार्ग ४२१ इस प्रकार विचार करनेपर मालूम होता है, कि संसारकी प्रत्येक वस्तु यदि अंशतः परमेश्वरहीका स्वरूप है, तो फिर जिन लोगोंके ध्यानमें परमेश्वरका यह सर्वव्यापी स्वरूप एकाएक नहीं आ सकता, वे यदि इस अव्यक्त और शुद्ध रूपको पहचाननेके लिये इन अनेक वस्तुओंमेंसे किसी एकको साधन या प्रतीक समझकर उसकी उपासना करें, तो क्या हानि है ? कोई मनकी उपासना करेंगे, तो कोई द्रव्ययज्ञ या जपयज्ञ करेंगे । कोई गरुडकी भक्ति करेंगे, तो कोई ॐ मंत्राक्षरहीका जप करेंगे; कोई विष्णुका, तो कोई शिवका, कोई गणपतिको तो कोई भवानीका भजन करेंगे । कोई अपने मातापिताके चरणोंमें ईश्वरभाव रखकर उनकी सेवा करेंगे; और कोई उससेभी अधिक व्यापक सर्वभूतात्मक विराट् पुरुषकी उपासना पसंद करेंगे । कोई कहेंगे, सूर्यको भजो; और कोई कहेंगे, कि राम या कृष्णही सूर्यसे श्रेष्ठ हैं । परंतु अज्ञानसे या मोहसे जब यह दृष्टि छूट जाती है, कि " सब विभूतियोंका मूल स्थान एकही परब्रह्म है ", अथवा जब किसी धर्मके मूल सिद्धान्तोंमेंही यह व्यापक दृष्टि नहीं होती, तब अनेक प्रकारके उपास्योंके विषयमें वृथाभिमान और दुराग्रह उत्पन्न हो जाता है; और कभी कभी तो लड़ाइयाँ हो जानेतक नौबत आ पहुँचती है । वैदिक, बौद्ध, जैन, ईसाई या मुहंमदी धर्मोंके परस्पर-विरोधकी बात छोड़ दें और केवल ईसाई धर्मकोही देखें : तो यूरोपके इतिहाससे यही दीख पड़ता है, कि एक-ही सगुण और व्यक्त ईसा मसीहके उपासकोंमेंभी विधिभेदोंके कारण एक दूसरेकी जान लेने- तककी नौबत आ चुकी थी । हमारे देशके सगुण उपासकोंमेंभी अबतक यह झगड़ा दीख पड़ता है, कि हमारा देव निराकार होनेके कारण अन्य लोगोंके साकार देवसे श्रेष्ठ है । भक्ति-मार्गमें उत्पन्न होनेवाले इन झगड़ोंका निर्णय करनेके लिये कोई उपाय है या नहीं ? यदि है तो वह कौन-सा उपाय है ? जब तक इसका ठीक ठीक विचार नहीं हो जाता, तबतक भक्तिमार्ग बेखटकेका या बगैर धोखेका नहीं कहा जा सकता । इसलिये अब यही विचार किया जायगा, कि गीतामें इस प्रश्नका क्या उत्तर दिया गया है । कहना नहीं होगा, कि हिंदुस्थानकी वर्तमान दशामें इस विषयका यथोचित विचार करना विशेष महत्त्वकी बात है । साम्य-बुद्धिकी प्राप्तिके लिये मनको स्थिर करके परमेश्वरकी अनेक सगुण विभूतियोंमेंसे किसी एक विभूतिके स्वरूपका प्रथमतः चिंतन करना अथवा उसको प्रतीक समझकर प्रत्यक्ष नेत्रोंके सामने रखना, इत्यादि साधनोंका वर्णन प्राचीन उपनिषदोंमेंभी पाया जाता है; और रामतापनी सरीखे उत्तरकालीन उपनिषदमें या गीतामेंभी मानव-रूपधारी सगुण परमेश्वरकी निस्सीम और एकांतिक भक्ति- कोही परमेश्वर-प्राप्तिका मुख्य साधन माना है । परंतु साधनकी दृष्टिसे यद्यपि वासुदेव-भक्तिको गीतामें प्रधानता दी गई है, तथापि अध्यात्म-दृष्टिसे विचार करने पर, वेदान्त-सूत्रकी नाईं (वे. सू. ४. १. ४) गीतामेंभी आगे यही स्पष्ट रीतिसे कहा है, कि 'प्रतीक' एक प्रकारका साधन है - वह सत्य, सर्वव्यापी और नित्य