श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र भक्तिको स्वतंत्र निष्ठा क्यों नहीं माना है। परंतु ज्ञानप्राप्तिके इस सुलभ, अनादि और प्रत्यक्ष मार्गमेंभी धोखा खा जानेकी जो एक जगह है, उसकाभी कुछ विचार किया जाना चाहिये। नहीं तो संभव है, कि इस मार्गमें चलनेवाला पथिक असाव- धानतासे गड्ढेमें गिर पड़े। भगवद्गीतामें इस गड्ढेका स्पष्ट वर्णन किया गया है; और वैदिक भक्ति-मार्गमें अन्य भक्ति-मार्गोंकी अपेक्षा जो कुछ विशेषता है, वह यही है। यद्यपि इस बातको सब लोग मानते हैं, कि परब्रह्ममें मनको चित्त-शुद्धि- द्वारा साम्य-बुद्धिकी प्राप्तिके लिये साधारण आसक्त कर मनुष्योंके सामने परब्रह्मके 'प्रतीक'के नातेसे कुछ-न-कुछ सगुण अथवा व्यक्त वस्तु अवश्य होनी चाहिये, नहीं तो चित्तकी स्थिरता हो नहीं सकती; तथापि इतिहाससे दीख पड़ता है, कि 'प्रतीक' के स्वरूपके विषयमें अनेक बार झगड़े और बखेड़े हो जाया करते हैं। अध्यात्मशास्त्रकी दृष्टिसे देखा जाय, तो इस संसारमें ऐसा कोई स्थान नहीं, कि जहाँ परमेश्वर न हो। भगवद्गीतामेंभी जब अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णसे पूछा, कि "किन किन विभूतियोंके रूपमे तुम्हारा चिंतन (भजन) किया जावे, सो मुझे बतलाइये" (गीता १०. १८); तब दसवें अध्यायमें भगवान्ने इस स्थावर और जंगम-सृष्टिमें चारों ओर व्याप्त अपनी अनेक विभूतियोंका वर्णन करके कहा है, कि मैं इंद्रियोंमें मन, स्थावरोंमें हिमालय, यज्ञोंमें जपयज्ञ, सर्पोंमें वासुकि, दैत्योंमें प्रह्लाद, पितरोंमें अर्यमा, गंधर्वोंमें चित्ररथ, वृक्षोंमें अश्वत्थ, पक्षियोंमें गरुड़, महर्षियोंमें भृगु, अक्षरोंमें अकार, और आदित्योंमें विष्णु हूँ; और अंतमें यह कहा :- यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम् ॥ "हे अर्जुन ! यह जानो कि जो कुछ वैभव, लक्ष्मी या प्रभावसे युक्त हो, वह मेरेही तेजके अंशसे उत्पन्न हुआ है" (गीता १०. ४१); और अधिक क्या कहा जाय ! मैं अपने एक अंशमात्र से इस सारे जगत्में व्याप्त हूँ ! इतना कहकर अगले अध्यायमें विश्वरूपदर्शनसे अर्जुनको इस सिद्धान्तकी प्रत्यक्ष प्रतीतिभी करा दी है। यदि इस संसारमे दिखलाई देनेवाले सब पदार्थ या गुण परमेश्वरहीके रूप याने प्रतीक हैं तो यह कौन और कैसे कह सकता है, कि उनमें से किसी एकहीमें परमेश्वर है और दूसरेमें नहीं ? न्यायतः यही मानना पड़ता है, कि वह दूर है और समीपभी है, सत् और असत् होनेपरभी वह उन दोनोंसे परे है. अथवा गरुड़ और सर्प, मृत्यु और मारनेवाला, विघ्नकर्ता और विघ्नहर्ता, भयकृत और भयनाशक, घोर और अघोर, शिव और अशिव, वृष्टि करनेवाला और उसको रोकनेवालाभी (गीता ९. १९; १० ३०) वही है। अतएव भगवद्भक्त तुकाराम महाराजनेभी (तु. गा. २० ६७ ४) इसी भावसे कहा है - छोटा बड़ा कहें जो कुछ हम । फबता है सब तुझे महत्तम ॥