भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 463

४१८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र “सब विद्याओंमें और गुह्योंमें श्रेष्ठ (राजविद्या और राजगुह्य) है; यह उत्तम, पवित्र, प्रत्यक्ष दीख पड़नेवाला, धर्मानुकूल, सुखसे आचरण करने योग्य और अक्षय है” (गीता ९. २)। इस श्लोकमें राजविद्या और राजगुह्य दोनों सामासिक शब्द हैं; इनका विग्रह इस प्रकार है- 'विद्यानां राजा' और 'गुह्यानां राजा' (विद्याओंका राजा और गुह्योंका राजा)। और जब समास होता है, तब संस्कृत व्याकरणके नियमानुसार 'राज' शब्द उसमें पहले आता है। परंतु इसके बदले कुछ लोग 'राज्ञां विद्या' (राजाओंकी विद्या) ऐसा विग्रह करते हैं; और कहते हैं, कि योगवासिष्ठमें (यो. २. ११. १६-१८) जो वर्णन है, उसके अनुसार जब प्राचीन समयमें ऋषियोंने राजाओंको ब्रह्मविद्याका उपदेश किया, तबसे ब्रह्मविद्या या अध्यात्मज्ञानहीको राजविद्या और राजगुह्य कहने लगे हैं। इसलिये गीतामेंभी इन शब्दोंका वही अर्थ याने अध्यात्मज्ञान-भक्ति नहीं-लिया जाना चाहिये। गीता-प्रतिपादित मार्गभी मनु, इक्ष्वाकु प्रभृति राजपरंपराहीसे प्रवृत्त हुआ है (गीता ४. १); इसलिये नहीं कहा जा सकता, कि गीतामें 'राजविद्या' और 'राजगुह्य' शब्द 'राजाओंकी विद्या' और 'राजाओंका गुह्य'-याने राजमान्य विद्या और गुह्य-के अर्थमें प्रयुक्त न हुए हों। परंतु इन अर्थोंको मान लेनेपरभी यह ध्यान देने योग्य बात है, कि इस स्थानमें ये शब्द ज्ञान-मार्गके लिये प्रयुक्त नहीं हुए हैं। कारण यह है, कि गीताके जिस अध्यायमें यह श्लोक आया है, उसमें भक्ति- मार्गकाही विशेष प्रतिपादन किया गया है (गीता ९. २२-३१); और यद्यपि साध्य ब्रह्म एकही है, तथापि गीतामेंही अध्यात्मविद्याका साधनात्मक ज्ञान-मार्ग केवल 'बुद्धिगम्य' अतएव 'अव्यक्त' और 'दुःखकारक' कहा गया है (गीता १२. ५)। ऐसी अवस्थामें यह असंभव जान पड़ता है, कि भगवान् अब उसके विरुद्ध उसी ज्ञान-मार्गको 'प्रत्यक्षावगमं' याने व्यक्त और 'कर्तुं सुसुखम्' याने आचरण करनेमें सुखकारक कहेंगे। अतएव प्रकरणकी साम्यताके कारण और केवल भक्ति- मार्गहीके लिये सर्वथा उपयुक्त होनेवाले 'प्रत्यक्षावगमं' तथा 'कर्तुं सुसुखम्' पदोंकी स्वारस्य-सत्ताके कारण, अर्थात् इन दोनों कारणोंसे, यही सिद्ध होता है, कि इस श्लोकमें 'राजविद्या' शब्दसे भक्ति-मार्गही विवक्षित है। 'विद्या' शब्द केवल ब्रह्म- ज्ञानसूचक नहीं है; किंतु परब्रह्मका ज्ञान प्राप्तकर लेनेके जो साधन या मार्ग हैं उन्हेंभी उपनिषदोंमें 'विद्या'ही कहा है। उदाहरणार्थ, शांडिल्यविद्या, प्राणविद्या, हार्दविद्या इत्यादि। वेदान्त-सूत्रके तीसरे अध्यायके तीसरे पादमें, उपनिषदोंमें वर्णित सभी ऐसी विद्याओंका अर्थात् साधनाओंका विचार किया गया है। उपनिषदोंसे यहभी विदित होता है, कि प्राचीन समयमें ये सब विद्याएँ गुप्त रखी जाती थीं; और केवल शिष्योंके अतिरिक्त अन्य किसीकोभी उनका उपदेश नहीं किया जाता था। अतएव कोईभी विद्या हो, वह गुह्य अवश्यही होगी। परंतु ब्रह्म-प्राप्तिके लिये साधनभूत होनेवाली ये जो गुह्य विद्याएँ या मार्ग हैं, वे यद्यपि अनेक हों, तथापि