भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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भक्तिमार्ग ४१७ लाड़ले सगुण, प्रेमगम्य और व्यक्त याने प्रत्यक्ष-रूपधारी सुलभ परमेश्वरहीके स्वरूपका सहारा मनुष्य 'भक्तिके लिये' स्वभावतः लिया करता है। जो पर- ब्रह्म मूलमें अचिंत्य और 'एकमेवाद्वितीयम्' है, उसके उक्त प्रकारके अंतिम दो स्वरूपोंको - अर्थात् प्रेम, श्रद्धा आदि मनोमय नेत्रोंसे मनुष्यको गोचर होनेवाले स्वरूपोंकोही - वेदान्तशास्त्रकी परिभाषामें 'ईश्वर' कहते हैं। परमेश्वर सर्वव्यापी होकरभी 'विठ्ठल' मर्यादित क्यों हो गया? इसका उत्तर प्रसिद्ध महाराष्ट्र साधु तुकारामने एक पद्यमें (तु. गा. ३८. ७) दिया है, जिसका आशय यह है :- रहता है सर्वत्रही व्यापक एक समान। पर निज भक्तों के लिये छोटा है भगवान् ॥ यही सिद्धान्त वेदान्त-सूत्रमेंभी दिया गया है (वे. सू. १. २. ७) । उपनिषदोंमेंभी जहाँ जहाँ ब्रह्मकी उपासनाका वर्णन है, वहाँ वहाँ प्राण, मन इत्यादि सगुणपर केवल अव्यक्त वस्तुओंहीका निर्देश न कर, उनके साथ साथ सूर्य (आदित्य), अन्न इत्यादि सगुण व्यक्त पदार्थोंकी उपासनाभी कही गई है (तै. ३. २-६; छा. ३) । श्वेताश्वतरोपनिषदमें तो 'ईश्वर' का लक्षण इस प्रकार बतला कर, कि "मायां तु प्रकृतिं विद्यात् मायिनं तु महेश्वरम् " (श्वे. ४. १०) - प्रकृतिहीको माया और इस मायाके अधिपति‌को महेश्वर जानो; आगे गीताहीके समान (गीता १०. ३) सगुण ईश्वरकी महिमाका इस प्रकार वर्णन किया है, कि "ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशै " - इस देवको जान लेनेसे मनुष्य सब पाशोंसे मुक्त हो जाता है (श्वे. ४. १६) । इस उपास्य परब्रह्मके चिन्ह, पहचान, अवतार, अंश य- प्रतिनिधिका तौरपर उपासनाके लिये आवश्यक नाम-रूपात्मक वस्तुकोही वेदान्त- शास्त्रमें 'प्रतीक' कहते हैं। प्रतीक (प्रति + इक) शब्दका धात्वर्थ, (प्रति) अपनी ओर हुआ है। जब किसी वस्तुका कोई एक भाग पहले गोचर हो; और फिर उससे आगे उस वस्तुका ज्ञान हो, तब उस भागको प्रतीक कहते हैं। इस नियमके अनुसार, सर्वव्यापी परमेश्वरका ज्ञान होनेके लिये उसका कोईभी प्रत्यक्ष चिन्ह, अंशरूपी विभूति या भाग 'प्रतीक' हो सकता है। उदाहरणार्थ, महाभारतमें ब्राह्मण और व्याधका जो संवाद है, उसमे व्याधने ब्राह्मणको पहले बहुत-सा अध्यात्मज्ञान बतलाया। फिर अंतमें "हे द्विजवर ! मेरा जो प्रत्यक्ष धर्म है उसे अब देखो" - "प्रत्यक्षं मम यो धर्मस्तं च पश्य द्विजोत्तम" (महा. वन. २१३. ३) ऐसा कहकर उस ब्राह्मणको वह व्याध अपने वृद्ध माता-पिताके समीप ले गया और कहने लगा - येही मेरे 'प्रत्यक्ष' देवता हैं; और मनोभावसे ईश्वरके समान इन्हींकी सेवा करना मेरा 'प्रत्यक्ष' धर्म है। इसी अभिप्रायका मनमें रखकर भगवान् श्रीकृष्णने अपने व्यक्त स्वरूपकी उपासना बतलानेके पहले गीतामे कहा है, कि भक्तिका यह मार्ग - राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् । प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥ गी. र. २७