भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 461, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 461

४१६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

और व्यक्तोपासनाका (भक्ति-मार्ग) - अर्थात् जो दो साधन प्राचीन समयमे एक साथ चले आ रहे हैं उनका - वर्णन करके, गीतामें सिर्फ इतनाही कहा है, कि "इन दोनोंमेंसे अव्यक्तोपासना बहुत क्लेशमय है; और व्यक्तोपासना या भक्ति अधिक सुलभ है याने इस साधनका स्वीकार सब साधारण लोग कर सकते हैं"। प्राचीन उपनिषदोंमें ज्ञान-मार्गहीका विचार किया गया है; और शांडिल्य आदि सूत्रोंमें तथा भागवत आदि ग्रंथोंमें भक्ति-मार्गहीकी महिमा गाई गई है। परंतु साधन-दृष्टिसे ज्ञान-मार्ग और भक्ति-मार्गमें योग्यतानुसार भेद दिखलाकर, अंतमें निष्काम कर्मके साथ दोनोंका मेल जैसा गीताने सम-बुद्धिसे किया है, वैसा अन्य किसीभी प्राचीन धर्मग्रंथने नहीं किया है। ईश्वरके स्वरूपका यह यथार्थ और अनुभवात्मक ज्ञान होनेके लिये, कि "सब प्राणियोंमें एकही परमेश्वर है;" देहेंद्रियधारी मनुष्यको क्या करना चाहिये, इस प्रश्नका विचार उपर्युक्त रीतिसे करनेपर जान पड़ेगा, कि यद्यपि परमेश्वरका श्रेष्ठ स्वरूप अनादि, अनंत, अनिर्वाच्य, अचिंत्य और 'नेति नेति' है, तथापि वह निर्गुण, अज्ञेय और अव्यक्तभी है, और जब उसका अनुभव होता है, तब उपास्य- उपासकरूपी द्वैतभाव शेष नहीं रहता, इसलिये उपासनाका आरंभ वहाँसे नहीं हो सकता। वह तो केवल अंतिम साध्य है, साधन नहीं; और तद्रूप होनेकी अद्वैत स्थितिकी प्राप्तिके लिये उपासना केवल एक साधन या उपाय है। अतएव उस उपासनामें जिस वस्तुको स्वीकार करना पड़ता है, उसका सगुण होना अत्यंत आवश्यक है। सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापी और निराकार ब्रह्मस्वरूप वैसा अर्थात् सगुण है। परंतु वह केवल बुद्धिगम्य और अव्यक्त अर्थात् इंद्रियोंको अगोचर होनेके कारण उपासनाके लिये अत्यंत क्लेशमय है। अतएव प्रत्येक धर्ममें यही दीख पड़ता है, कि इन दोनों परमेश्वर-स्वरूपोंकी अपेक्षा जो परमेश्वर अचिंत्य, सर्वसाक्षी, सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान् जगदात्मा होकरभी हमारे समान हमसे बोलेगा, हमसे प्रेम करेगा, हमको सन्मार्ग दिखावेगा और हमें सद्गति देगा; जिसे हम लोग 'अपना' कह सकेंगे, जिसे हमारे सुखदुःखोंके साथ सहानुभूति होगी अथवा जो हमारे अपराधोंको क्षमा करेगा, जिसके साथ हम लोगोंका यह प्रत्यक्ष संबंध उत्पन्न हो, कि "हे परमेश्वर ! मैं तेरा हूँ और तू मेरा है," जो पिताके समान मेरी रक्षा करेगा और माताके समान प्यार करेगा; अथवा जो "गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्" (गीता ९. १७, १८) है -- अर्थात् जिसके विषयमें मैं यह कह सकूँगा, कि "तू मेरी गति है, तू पोषणकर्ता है, तू मेरा स्वामी है, तू मेरा साक्षी है, तू मेरा विश्रामस्थान है, तू मेरा अंतिम आधार है, तू मेरा सखा है," और ऐसा कहकर बच्चोंकी नाईं प्रेमपूर्वक तथा लाड़से जिसके स्वरूपका आकलन मैं कर सकूँगा - ऐसे सत्यसंकल्प, सकलैश्वर्यसंपन्न, दयासागर, भक्तवत्सल, परम पवित्र, परम उदार, परम कारुणिक, परमपूज्य, सर्वसुंदर, सकलगुणनिधान अथवा संक्षेपमें कहे तो ऐसे