श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तिमार्ग ४१५ भक्ति-मार्ग श्रेष्ठ है ? यद्यपि ये दोनों साधन प्रथमावस्थामें अधिकार या योग्यताके अनुसार भिन्न हों, तथापि अंतमें अर्थात् परिणामस्वरूपमें दोनोंकी योग्यता समान है; और गीतामें इन दोनोंको एकही 'अध्यात्म' नाम दिया गया है ( गीता ११. १ ) । अब यद्यपि साधनकी दृष्टिसे ज्ञान और भक्तिकी योग्यता एकही समान है; तथापि इन दोनोंमें यह महत्त्वका भेद है, कि भक्ति कदापि निष्ठा नहीं हो सकती; किंतु ज्ञानको निष्ठा याने सिद्धावस्थाकी अंतिम स्थिति कह सकते हैं। इसमें संदेह नहीं कि, अध्यात्म-विचारसे या अव्यक्तोपासनासे परमेश्वरका जो ज्ञान होता है, वही भक्ति- सेभी हो सकता है ( गीता १८. ५५ ); परंतु इस प्रकार ज्ञानकी प्राप्ति हो जानेपर आगे यदि कोई मनुष्य सांसारिक कार्योंको छोड़ दे, और ज्ञानहीमें सदा निमग्न रहने लगे, तो गीताके अनुसार वह 'ज्ञाननिष्ठ' कहलावेगा; 'भक्तिनिष्ठ' नहीं। इसका कारण यह है, कि जबतक भक्तिकी क्रिया जारी रहती है, तबतक उपास्य और उपासकरूपी द्वैतभावभी बना रहता है; और अंतिम ब्रह्मात्मैक्य स्थितिमें तो भक्तिकी कौन कहे, अन्य किसीभी प्रकारकी उपासना शेष नहीं रह सकती। भक्तिका पर्यवसान या फल ज्ञान है। भक्ति ज्ञानका साधन है - वह अंतिम साध्य नहीं है। सारांश अव्यक्तोपासनाकी दृष्टिसे ज्ञान एक बार साधन हो सकता है; और दूसरी बार ब्रह्मात्मैक्यके अपरोक्षानुभवकी दृष्टिसे उसी ज्ञानको निष्ठा याने (सिद्धावस्थाकी) अंतिम स्थिति कह सकते हैं। जब इस भेदको प्रकट रूपसे दिखलानेकी आवश्यकता, होती है, तब 'ज्ञान-मार्ग' और 'ज्ञाननिष्ठा' इन दोनों शब्दोंका उपयोग समान अर्थमें नहीं किया जाता; किंतु अव्यक्तोपासनाकी साधनावस्थावाली स्थिति दिखलानेके लिये ान-मार्ग' शब्दका उपयोग किया जाता है; और ज्ञान-प्राप्तिके अनंतर सब कर्मोंको छोड़ ज्ञानहीमें निमग्न हो जानेकी जो सिद्धावस्थाकी स्थिति है, उसके लिये 'ज्ञाननिष्ठ' शब्दका उपयोग किया जाता है। अर्थात् अव्यक्तोपासना या अध्यात्म- विचारके अर्थमें ज्ञानको एक बार साधन ( ज्ञान-मार्ग ) कह सकते हैं और दूसरी बार अपरोक्षानुभवके अर्थमें उसी ज्ञानको निष्ठा याने कर्मत्यागरूपी अंतिम अवस्था कह सकते हैं। यही बात कर्मके विषयमेंभी कही जा सकती है। शास्त्रोक्त मर्यादाके अनुसार जो कर्म पहले चित्तकी शुद्धि के लिये किया जाता है, वह साधन कहलाता है। इस कर्मसे चित्तका शुद्धि होती है; और अंतमें ज्ञान तथा शांतिकी प्राप्ति होती है। परंतु यदि कोई मनुष्य आगे इस ज्ञानमेंही निमग्न न रहकर शांतिपूर्वक मृत्यु- पर्यंत निष्काम कर्म करता चला जावे, तो ज्ञानयुक्त निष्काम कर्मकी दृष्टिसे उसके इस कर्मको निष्ठा कह सकते हैं ( गीता ३. ३ )। यह बात भक्तिके विषयमें नहीं कह सकते, क्योंकि भक्ति सिर्फ एक मार्ग या उपाय अर्थात् ज्ञान-प्राप्तिका साधन है, वह निष्ठा नहीं है। इसलिये गीताके आरंभमें ज्ञान ( सांख्य ) और योग ( कर्म ) येही दो निष्ठाएँ कही गई हैं; उनमेंसे कर्म योग-निष्ठाकी सिद्धिके उपाय, साधन, विधि या मार्गका विचार करते समय ( गीता ७. १ ), अव्यक्तोपासना (ज्ञान-मार्ग)