श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजाय, पर जबतक देहधारी मनुष्य अपने मनके इस स्वभावको अलग नहीं कर सकता, तबतक उपासनाके लिये याने भक्तिके लिये निर्गुणसे सगुणमें – और उसमेंभी अव्यक्त सगुणकी अपेक्षा व्यक्त सगुणहीमें – आना पड़ता है; इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं। यही कारण है, कि व्यक्त-उपासनाका मार्ग अनादि कालसे प्रचलित है; रामतापनीय आदि उपनिषदोंमें प्रत्यक्ष मनुष्य-रूपधारी व्यक्त ब्रह्म- स्वरूपकी उपासनाका वर्णन है; और भगवद्गीतामेंभी यह कहा गया है, कि :- क्लेशोऽधिकतरस्तेषां अव्यक्तासक्तचेतसाम् । अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ “अव्यक्तमें चित्तकी ( मनकी ) एकाग्रता करनेवालेको बहुत कष्ट होते हैं; क्योंकि इस अव्यक्त गतिको पाना देहेंद्रियधारी मनुष्यके लिये स्वभावतः कष्टदायक है” ( गीता १२. ५ )। इस ‘प्रत्यक्ष’ मार्गहीको ‘भक्ति-मार्ग’ कहते हैं। इसमें कुछ संदेह नहीं, कि कोई बुद्धिमान् पुरुष अपनी बुद्धिसे परब्रह्मके स्वरूपका निश्चय कर उसके अव्यक्त स्वरूपमें केवल अपने विचारोंके बलसे अपने मनको स्थिरकर सकता है। परंतु इस रीतिसे अव्यक्तमें ‘मन’को आसक्त करनेका कामभी तो अंतमें श्रद्धा और प्रेमसेही सिद्ध करना होता है, इसलिये इस मार्गमेंभी श्रद्धा और प्रेमकी आवश्यकता छूट नहीं सकती। सच पूछो तो तात्विक दृष्टिसे सच्चिदानंद ब्रह्मो- पासनाका समावेशभी प्रेममूलक भक्ति-मार्गमेंही किया जाना चाहिये। परंतु इस मार्गमें ध्यान करनेके लिये जिस ब्रह्मस्वरूपका स्वीकार किया जाता है, वह पहलेसे अव्यक्त और केवल बुद्धिगम्य अर्थात् ज्ञानगम्य होता है; और उसीको प्रधानता दी जाती है, इसलिये इस क्रियाको भक्ति-मार्ग न कहकर अध्यात्म-विचार, अव्यक्तो- पासना या केवल उपासना, अथवा ज्ञान-मार्ग कहते हैं; और उपास्य ब्रह्मके सगुण- ही रहनेपरभी जब उसका अव्यक्तके बदले व्यक्त – और विशेषतः मनुष्यदेहधारी – रूप स्वीकृत किया जाता है, तब वही भक्ति-मार्ग कहलाता है। इस प्रकार यद्यपि मार्ग दो हैं, तथापि उन दोनोंसे एकही परमेश्वरकी प्राप्ति होती है; और अंतमें एकही-सी साम्यबुद्धि मनमें उत्पन्न होती है, इसलिये स्पष्ट दीख पड़ेगा, कि जिस प्रकारकिसी छतपर जानेके लिये दो जीने होते हैं, उसी प्रकार भिन्न भिन्न मनुष्योंकी योग्यताके अनुसार ये दो ( ज्ञान-मार्ग और भक्ति-मार्ग ) अनादि-सिद्ध भिन्न भिन्न मार्ग हैं, इन मार्गोंकी भिन्नतासे अंतिम साध्य अथवा ध्येयमें कुछ भिन्नता नहीं होती। इनमेंसे एक जीनेकी पहली सीढ़ी बुद्धि है, तो दूसरे जीनेकी पहली सीढ़ी श्रद्धा और प्रेम है; और किसीभी मार्गसे जाओ; अंतमें एकही परमेश्वरका एकही प्रकारका ज्ञान होता है; एवं एकही-सी मुक्तिभी प्राप्त होती है। इस लिये दोनों मार्गोंमें यही सिद्धांत एकही-सा स्थिर रहता है, कि “अनुभवात्मक ज्ञानके बिना मोक्ष नहीं मिलता।” फिर यह व्यर्थ बखेड़ा करनेमे क्या लाभ है, कि ज्ञान-मार्ग श्रेष्ठ है या