भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 458

भक्तिमार्ग ४१३ कही गई है, वहाँ वहाँ उपास्य ब्रह्मके अव्यक्त होनेपरभी सगुण-रूपसेही उसका वर्णन किया गया है। उदाहरणार्थ, शांडिल्यविद्यामें जिस ब्रह्मकी उपासना कही गई है, वह यद्यपि अव्यक्त अर्थात् निराकार है, तथापि छांदोग्योपनिषदमें (छां. ३. १४) कहा है, कि वह प्राणशरीर, सत्यसंकल्प, सर्वगंध, सर्वरस, सर्वकर्म, अर्थात् मनको गोचर होनेवाले सब गुणोंमें युक्त हो। स्मरण रहे, कि यहाँ उपास्य ब्रह्म यद्यपि सगुण है; तथापि वह अव्यक्त अर्थात् निराकार है। परंतु मनुष्यके मनकी स्वाभाविक रचनाही ऐसी है, कि सगुण वस्तुओंमेंसेभी जो वस्तु अव्यक्त होती है; अर्थात् जिसका कोई विशेष रूप, गंध आदि नहीं; और इसलिये जो नेत्रादि इंद्रियोंको अगोचर है, उससे प्रेम करना या हमेशा उसका चिंतनकर मनको उसीमें स्थिर करके वृत्तिको तदाकार करना, मनुष्यके लिये बहुत कठिन और दुःसाध्यभी है। क्योंकि, मन स्वभावसेही चंचल है, इसलिये जबतक मनके सामने आधारके लिये कोई इंद्रियगोचर स्थिर वस्तु न हो, तबतक मन बारबार भूल जाया करता है, स्थिर कहाँ होना है। चित्तकी स्थिरताका यह मानसिक कार्य बड़े बड़े ज्ञानी पुरुषोंकोभी दुष्कर होता है, तो फिर साधारण मनुष्योंके लिये कहनाही क्या? अतएव रेखा- गणितके सिद्धान्तोंकी शिक्षा देते समय जिस प्रकार ऐसी रेखाकी कल्पना करनेके लिये – कि जो अनादि, अनंत और बिना चौड़ाईकी (अव्यक्त) है; किंतु जिसमें लंबाईका गुण होनेसे सगुण है – उस रेखाका एक छोटा-सा नमूना स्लेट या तख्ते- पर व्यक्त करके दिखलाना पड़ता है; उसी प्रकार ऐसे परमेश्वरसे प्रेम करने और उसमें अपनी वृत्तिको लीन करनेके लिये, कि जो सर्वकर्ता, सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ अतएव सगुण है; परंतु निराकार अर्थात् अव्यक्त है, मनके सामने कुछ-न-कुछ अर्थात् 'प्रत्यक्ष' नामरूपात्मक किसी व्यक्त वस्तुके रहे-बिना कमसे-कम साधारण मनुष्योंका काम चल नहीं सकता।* यही क्यों, पहले किसी व्यक्त पदार्थको देखे बिना कमसे- कम मनुष्यके मनमें अव्यक्तकी कल्पनाही जागृत हो नहीं सकती। उदाहरणार्थ, जब हम लाल, हरे इत्यादि अनेक व्यक्त रंगोंको पहले आँखोंसे देख लेते हैं, तभी 'रंग'की सामान्य और अव्यक्त कल्पना हमारे मनमें जागृत होती है, अन्यथा होही नहीं सकती। अब चाहे इसे कोई मनुष्यके मनका स्वभाव कहे या दोष; कुछभी कहा

  • इस विषयपर एक श्लोक है, जो योगवासिष्ठका कहा जाता है :- अक्षरावगमलब्धये यथा स्थूलवर्तुलदृषत्परिग्रहः । शुद्धबुद्धपरिलब्धये तथा दारुमृन्मयशिलामयार्चनम् ॥ “अक्षरोंका परिचय करानेके लिये लड़कोंके सामने जिस प्रकार छोटे छोटे कंकड़ रखकर अक्षरोंका आकार दिखलाना पड़ता है, उसी प्रकार (नित्य,) शुद्ध-बुद्ध परब्रह्मका ज्ञान होनेके लिये लकड़ी, मिट्टी या पत्थरकी मूर्तिका उपयोग किया जाता है।” परंतु यह श्लोक बृहद्योगवासिष्ठमें नहीं मिलता।