भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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४१२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

भक्ति राजस कहलाती है; और फिर उससे चित्तकी शुद्धिही पूरी पूरी नहीं होती, और जब चित्तकी शुद्धिही पूरी नहीं हुई, तब कहना नहीं होगा कि, आध्यात्मिक उन्नतिमें मोक्षकी प्राप्तिमें बाधा आ जायगी। अध्यात्मशास्त्र-प्रतिपादित पूर्ण निष्कामताका तत्त्व इस प्रकार भक्तिमार्गमेंभी बना रहता है और इसीलिये गीतामें भगवद्भक्तोंकी चार श्रेणियां करके कहा है, कि "उनमेंसे जो 'अर्थार्थी' है याने जो कुछ पानेके हेतु परमेश्वरकी भक्ति करता है, वह निकृष्ट श्रेणीका भक्त है; और परमेश्वरका ज्ञान होनेके कारण जो स्वयं अपने लिये कुछ प्राप्त करनेकी इच्छा नहीं रखता" (गीता ३.१८); परंतु नारद आदिकोंके समान जो 'ज्ञानी' पुरुष अन्य निष्काम कर्मोंकी तरह केवल कर्तव्य-बुद्धिसेही परमेश्वरकी भक्ति करता है, वही सब भक्तोंमें श्रेष्ठ है (गीता ७. १६-१८)। यह भक्ति भागवतपुराणके (भाग ७. ५. २३) अनुसार नौ प्रकारकी है; जैसे :- श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् । अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यं आत्मनिवेदनम् ।। नारदके भक्तिसूत्रमें इसी भक्तिके ग्यारह भेद किये गये हैं (ना. सू. ८२)। परंतु भक्तिके इन सब भेदोंका निरूपण दासबोध आदि अनेक भाषा-ग्रंथोंमें विस्तृत रीतिसे किया गया है; इसलिये हम यहाँ उनकी विशेष चर्चा नहीं करते। भक्ति किसीभी प्रकारकी हो; यह प्रकट है, कि परमेश्वरमें निरतिशय और निर्हेतुक प्रेम रखकर अपनी वृत्तिको तदाकार करनेका भक्तिका सामान्य काम प्रत्येक मनुष्यको अपने मनहीसे करना पड़ता है। छठे प्रकरणमें कह चुके हैं, कि बुद्धि नामक जो अंतरिंद्रिय है, वह केवल भले-बुरे, धर्म-अधर्म अथवा कार्य-अकार्यका निर्णय करनेके सिवा और कुछ नहीं करती, शेष मानसिक कार्य मनहीको करने पड़ते हैं। अर्थात् अब मनहीके दो भेद हो जाते हैं।- एक भक्ति करनेवाला मन और दूसरा उसका उपास्य याने जिससे प्रेम किया जाता है वह वस्तु। उपनिषदोंमें जिस श्रेष्ठ ब्रह्म-स्वरूपका प्रति- पादन किया गया है, वह इंद्रियातीत, अव्यक्त, अनंत, निर्गुण और 'एकमेवाद्वितीयम्' है, इसलिये उपासनाका आरंभ उस स्वरूपसे नहीं हो सकता। कारण यह है, कि जब इस श्रेष्ठ ब्रह्म-स्वरूपका अनुभव होता है, तब मन अलग नहीं रहता; किंतु उपास्य और उपासक, अथवा ज्ञाता और ज्ञेय, दोनों एकरूप हो जाते हैं; यह 'अध्यात्म' प्रकरणमें कह चुके हैं, निर्गुण ब्रह्म अंतिम साध्य वस्तु है, साधन नहीं; और जबतक किसी-न-किसी साधनसे निर्गुण ब्रह्मके साथ एकरूप होनेकी पात्रता मनमें न आवे, तबतक इस श्रेष्ठ ब्रह्म-स्वरूपका साक्षात्कार हो नहीं सकता। अतएव साधनकी दृष्टिसे की जानेवाली उपासनाके लिये जिस ब्रह्म-स्वरूपका स्वीकार करना होता है, वह दूसरी श्रेणीका - अर्थात् उपास्य और उपासकके भेदसे - मनको गोचर होनेवाला, याने सगुणही होता है; और इसी लिये उपनिषदोंमें जहाँ जहाँ ब्रह्मकी उपासना

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