भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 456

जो केवल महाबुद्धिमान् पुरुषोंमेंही पाया जाय। अज्ञ जनोंमेंभी श्रद्धाकी कुछ न्यूनता नहीं होती। और जब कि श्रद्धामेही वे लोग अपने सैकड़ों सांसारिक व्यवहार सदैव किया करते हैं, तो उसी श्रद्धासे यदि वे ब्रह्मको निर्गुण मान लेवें, तो कोई प्रत्यवाय नहीं दीख पड़ता। मोक्ष-धर्मका इतिहास पढ़नेसेभी मालूम होगा, कि जब ज्ञाता पुरुषोंने ब्रह्मस्वरूपकी मीमांसाकर उसे निर्गुण बतलाया, उसके पहलेही मनुष्यने केवल अपनी श्रद्धामे यह जान लिया था, कि सृष्टिकी जड़मेंभी सृष्टिके नाशवान् और अनित्य पदार्थोंसे भिन्न या विलक्षण कोई एक तत्त्व है; जो अनाद्यन्त, अमृत, स्वतंत्र, सर्वशक्तिमान्, सर्वत्र और सर्वव्यापी है; और मनुष्य उसी समयसे उस तत्त्वकी उपासना किसी-न-किसी रूपमें करना चला आया है। यह सच है, कि वह उस समय इस ज्ञानकी उपपत्ति बतला नही सकता था; परंतु आधिभौतिकशास्त्रमें यही क्रम दीख पड़ता है, कि पहले अनुभव होता है; और पश्चात् उसकी उपपत्ति बतलाई जाती है। उदाहरणार्थ, भास्कराचार्यको पृथ्वीके अथवा अंतमें न्यूटनको सारे विश्वके, गुरुत्वाकर्षणकी कल्पना सूझनेके पहलेभी यह बात अनादि कालसे सब लोगोंको मालूम थी, कि पेड़से गिरा हुआ फल नीचे पृथ्वीपर गिर पड़ता है। अध्यात्मशास्त्रकोभी यही नियम उपयुक्त है। श्रद्धासे प्राप्त हुए ज्ञानकी जाँच करना और उसकी उपपत्तिकी खोज करना बुद्धिका काम है सही; परंतु सब प्रकार योग्य उपपत्तिके न मिलनेसेही यह नहीं कहा जा सकता, कि श्रद्धासे प्राप्त होनेवाला ज्ञान केवल भ्रम है। यदि सिर्फ इतनाही जान लेनेसे हमारा काम चल जाय, कि ब्रह्म निर्गुण है; तो इसमें संदेह नहीं, कि वह काम उपर्युक्त कथनके अनुसार श्रद्धासे चला जा सकता है (गीता १३. २५)। परंतु नवें प्रकरणके अंतमें कह चुके हैं, कि ब्राह्मी स्थिति या सिद्धावस्थाकी प्राप्ति कर लेनाही इस संसारमे मनुष्यका परम साध्य या अंतिम ध्येय है; और उसके लिये केवल यह कोरा ज्ञान कि ब्रह्म निर्गुण है, किसी कामका नहीं। दीर्घ समयके अभ्यास और नित्यकी आदतसे इस ज्ञानका प्रवेश हृदयमें तथा देहेंद्रियोंमें अच्छी तरह हो जाना चाहिये; और आचरणके द्वारा ब्रह्मात्मैक्य-बुद्धिही हमारा देह; स्वभाव हो जाना चाहिये और ऐसा होनेके लिये परमेश्वरके स्वरूपका प्रेमपूर्वक चिंतन करके मनको तदाकार करनाही एक सुलभ उपाय है। यह मार्ग अथवा साधन हमारे देशमें बहुत प्राचीन समयसे प्रचलित है; और इसीको उपासना या भक्ति कहते हैं। भक्तिका लक्षण शांडिल्यसूत्रमें (शां. सू. २) इस प्रकार है, कि “सा (भक्तिः) परानुरक्तिरीश्वरे।”- ईश्वरके प्रति ‘परा’ अर्थात् निरतिशय जो प्रेम है, उसे भक्ति कहते हैं। ‘पर’ शब्दका अर्थ केवल निरतिशयही नहीं है; किंतु भागवतपुराणमें कहा है, कि वह प्रेम निर्हेतुक, निष्काम और निरंतर हो - “अहैतुक्य व्यवहिता या भक्तिः पुरुषोत्तमे” (भाग. ३. २९. १२)। कारण यह है, कि जब भक्ति इस हेतुसे की जाती है, कि हे ईश्वर! मुझे कुछ दे; तब वैदिक यज्ञयागादिक काम्य-कर्मोंके समान उमेभी कुछ-न-कुछ व्यापारका स्वरूप प्राप्त हो जाता है। ऐसी