भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 455

४१० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र तत्त्वको अपने हृदयमें अच्छी तरह जमने दे; और आचरण या कृतिमें दिखाई देने दे। सारांश, यदि यह निश्चयात्मक ज्ञान होनेके लियेभी अंतमें श्रद्धाकी आवश्यकता है, कि सूर्यका उदय कल सबेरे होगा, तो यहभी निर्विवाद सिद्ध है, कि इस बातको पूर्णतया जान लेनेके लिये-कि सारी सृष्टिका मूल तत्त्व अनादि, अनंत, सर्वकर्तृ, सर्वज्ञ, स्वतंत्र और चैतन्यरूप है-पहले हम लोगोंको यथाशक्ति, बुद्धिरूपी बटोहीका अवलंबन करना चाहिये; परंतु उसके अनुरोधसे आगे कुछ दूर तो अवश्यही श्रद्धा तथा प्रेमकी पगडंडीसेही जाना चाहिये, देखिये, मैं जिसे माँ कहकर ईश्वरके समान वंद्य और पूज्य मानता हूँ, उसीही अन्य लोग एक सामान्य स्त्री समझते हैं; या नैयायिकोंके शास्त्रीय शब्दाडंबरके अनुसार "गर्भधारण-प्रसवादिस्त्रीत्वसामान्यावच्छेदकाव- च्छिन्नव्यक्तिविशेषः समझते हैं।" इस एक छोटेसे व्यावहारिक उदाहरणसे यह बात किसीकेभी ध्यानमें सहज आ सकती है, कि जब केवल तर्कशास्त्रके सहारे प्राप्त किया गया ज्ञान, श्रद्धा और प्रेमके साँचेमें ढाला जाता है, तब उसमें कैसा अंतर हो जाता है। इसी कारणसे गीतामें (गीता ६. ४७) कहा है, कि कर्मयोगियोंमेंभी श्रद्धावान् श्रेष्ठ है; और ऐसाही सिद्धांत जैसे पहले कह चुकेभी हैं-अध्यात्मशास्त्रमें कहा गया है, कि इंद्रियातीत होनेके कारण जिन पदार्थोंका चिंतन करते नहीं बनता, उनके स्वरूपका निर्णय केवल तर्कसे नहीं करना चाहिये-"अचिंत्याः खलु ये भावाः न तांस्तर्केण चिंतयेत् ।" यदि यही एक अड़चन हो, कि साधारण मनुष्योंके लिये निर्गुण परब्रह्मका ज्ञान होना कठिन है, तो बुद्धिमान पुरुषोंमें मतभेद होनेपरभी श्रद्धा या विश्वाससे उसका निवारण किया जा सकता है। कारण यह है, कि इन पुरुषोंमें जो अधिक विश्वसनीय होंगे, उन्हींके वचनोंपर विश्वास रखनेसे हमारा काम बन जावेगा (गीता १३. २५)। तर्कशास्त्रमें इस उपायको 'आप्तवचनप्रमाण' कहते हैं। 'आप्त'का अर्थ विश्वसनीय पुरुष है। जगतके व्यवहारपर दृष्टि डालनेसे यही दिखाई देगा कि, हजारों लोग आप्त-वाक्यपर विश्वास रखकरही अपना व्यवहार चलाते हैं। दो पंचे दसके बदले सात क्यों नहीं होते ? अथवा एकपर एक लिखनेसे दो नहीं होते; ग्यारह क्यों होते हैं; इस विषयकी उपपत्ति या कारण बतलानेवाले पुरुष बहुतही कम मिलते हैं। तोभी इन सिद्धांतोंको सत्य मानकरही जगतका व्यवहार चल रहा है। ऐसे लोग बहुत कम मिलेंगे, जिन्हें इस बातका प्रत्यक्ष ज्ञान है, कि हिमालयकी ऊँचाई पाँच मील है या दस मील। परंतु जब कोई यह प्रश्न पूछता है, कि हिमालयकी ऊँचाई कितनी है, तब भूगोलकी पुस्तकमें पढ़ी हुई, 'तेईस हजार फीट' संख्या हम तुरंतही बतला देते हैं। फिर यदि इसी प्रकार कोई पूछे, कि 'ब्रह्म कैसा है' तो यह उत्तर देनेमें क्या हानि है, कि वह 'निर्गुण' है। वह सचमुचही निर्गुण है या नहीं, इस बातकी पूरी जाँचकर उसके साधक-बाधक प्रमाणोंकी मीमांसा करनेके लिये सामान्य लोगोंमें बुद्धिकी तीव्रता भलेही न हो; परंतु श्रद्धा या विश्वास कुछ ऐसा मनोधर्म नहीं है,