श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र वासुदेव-भक्तिमें तत्पर रहना, कर्मयोगकी दृष्टिसे एकही बात है। दोनों मार्ग निवृत्ति-विषयक हैं। यही आक्षेप, रामानुजके बाद प्रचलित हुए संप्रदायोंपरभी हो सकता है। मायाको मिथ्या कहनेवाले संप्रदायको झूठा मानकर वासुदेव-भक्तिकोही सच्चा मोक्ष-साधन बतलानेवाले रामानुज संप्रदायके बाद तीसरा संप्रदाय निकला। उसका मत है कि परब्रह्म और जीवको कुछ अंशोंमें एक, और कुछ अंशोंमें भिन्न मानना परस्पर-विरुद्ध और असंबद्ध बात है। इसलिए दोनोंको सदैव भिन्न मानना चाहिए; क्योंकि इन दोनोंमें पूर्ण अथवा अपूर्ण रीतिसेभी एकता नहीं हो सकती। इस तीसरे संप्रदायको 'द्वैत संप्रदाय' कहते हैं। इस संप्रदायके लोगोंका कहना है, कि इसके प्रवर्तक श्रीमध्वाचार्य (श्रीमदानंदतीर्थ) थे, जो संवत् १२५५में समाधिस्थ हुए और उस समय उनकी अवस्था ७९ वर्षकी थी। परंतु डॉक्टर भांडारकरने जो एक अंग्रेजी ग्रंथ- "वैष्णव, शैव, और अन्य पंथ" नामका हालहीमें प्रकाशित किया है उसके पृष्ठ ५६ में शिलालेख आदि प्रमाणोंसे यह सिद्ध किया गया है, कि मध्वाचार्यका समय संवत् १२५४ से १३३३ तक था। प्रस्थानत्रयी पर (अर्थात् गीतापरभी) श्रीमध्वाचार्यके जो भाष्य हैं, उनमें प्रस्थानत्रयीके सब ग्रंथोंका द्वैतमत-प्रतिपादक होनाही बतलाया गया है। गीताके अपने भाष्यमें मध्वाचार्य कहते हैं, कि यद्यपि गीतामें निष्काम कर्मके महत्त्वका वर्णन है, तथापि वह केवल साधन है, और भक्तिही अंतिम निष्ठा है। भक्तिकी सिद्धि हो जानेपर कर्म करना या न करना एकही बात है। "ध्यानात् कर्म- फलत्यागः" - परमेश्वरके ध्यान अथवा भक्तिकी अपेक्षा कर्मफलत्याग अर्थात् निष्काम कर्म करना श्रेष्ठ है इत्यादि गीताके कुछ वचन इस सिद्धान्तके विरुद्ध हैं; परंतु गीताके माध्वभाष्य (गीता मा. भा. १२.१३) में लिखा है, कि इन वचनोंको अक्षरशः सत्य न समझकर अर्थवादात्मक ही समझना चाहिये। चौथा संप्रदाय श्रीवल्लभाचार्य (जन्म संवत् १५३६) का है। रामानुजीय और माध्वसंप्रदायोंके समानही यह संप्रदाय वैष्णवपंथी है। परंतु जीव, जगत् और ईश्वरके संबंधमें. इस संप्रदायका मत, विशिष्टाद्वैत और द्वैत मतोंसे भिन्न है। यह पंथ इस मतको मानता है, कि मायारहित अर्थात् शुद्ध जीव और परब्रह्म एकही वस्तु है; दो नहीं। इसलिये इसको 'शुद्धाद्वैती' संप्रदाय कहते हैं। तथापि वह श्रीशंकराचार्यके समान इस बातको नहीं मानता, कि जीव और ब्रह्म एकही हं; और इसके सिद्धान्त कुछ ऐसे हैं- जैसे जीव अग्निकी चिनगारीके समान ईश्वरके अंश हैं; मायात्मक जगत् मिथ्या नहीं है; माया परमेश्वरकी इच्छासे उससे विभक्त हुई एक शक्ति है; मायाधीन जीवको बिना ईश्वरकी कृपाके मोक्षज्ञान नही हो सकता; इसलिये मोक्षका मुख्य साधन भगवद्भक्तिही है जिससे यह संप्रदाय शांकर-संप्रदायसेभी भिन्न हो गया है। इस मार्गवाले परमेश्वरके अनुग्रहको 'पुष्टि' और 'पोषण'भी कहते हैं, जिससे यह पंथ 'पुष्टिमार्ग'भी कहलाता है। इस संप्रदायके तत्त्वदीपिका आदि