भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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जितने गीतासंबंधी ग्रंथ हैं, उनमें यह निर्णय किया गया है, कि भगवान्ने अर्जुन- को पहले सांख्यज्ञान और कर्मयोग बतलाया है; एवं अंतमें उसको भक्त्यमृत पिला- कर कृतकृत्य किया है। इसलिये भगवद्भक्ति और विशेषतः निवृत्ति-विषयक पुष्टिमार्गीय भक्तिही गीताका प्रधान तात्पर्य है। यही कारण है कि भगवान्ने गीतामें यह उपदेश दिया है, कि "सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज"- सब धर्मोंको छोड़कर केवल मेरीही शरण ले (गीता १८. ६६)। उपर्युक्त संप्रदायोके अतिरिक्त निंबार्कका चलाया हुआ एक और वैष्णव संप्रदाय है, जिसमें राधाकृष्णकी भक्ति कही गयी है। डाक्टर भांडारकरने निश्चित किया है, कि ये आचार्य रामानुजके बाद और मध्वाचार्यके पहले करीब संवत् १२१६ में हुए थे। जीव, जगत् और ईश्वरके संबंधमें निंबार्काचार्यका यह मत है, कि यद्यपि ये तीनों भिन्न हैं, तथापि जीव और जगतका व्यापार तथा अस्तित्व ईश्वरकी इच्छापर अवलंबित है स्वतंत्र नहीं है और परमेश्वरमही जीव और जगतके सूक्ष्म तत्त्व रहते हैं। इस मतको सिद्ध करनेके लिये निंबार्काचार्यने वेदान्तसूत्रोंपर एक स्वतंत्र भाष्य लिखा है। इसी संप्रदायके केशव काश्मीरिभट्टाचार्यने गीतापर 'तत्त्वप्रकाशिका' नामक टीका लिखी है; और उसमें यह बतलाया है, कि गीताका वास्तविक अर्थ इसी संप्रदायके अनुकूल है। रामानुजाचार्यके विशिष्टाद्वैत पंथसे इस संप्रदायको अलग करनेके लिये इसे 'द्वैताद्वैत' संप्रदाय कह सकेंगे। यह बात स्पष्ट है, कि ये सब भिन्न भिन्न भक्तिपर संप्रदाय शांकर-संप्रदायके मायावादको स्वीकृत न करकेही पैदा हुए हैं; क्योंकि इनकी यह समझ थी, कि आँखसे दिखनेवाली वस्तुको सच्ची माने बिना व्यक्त की उपासना अर्थात् भक्ति निराधार या कुछ अंशोंमें मिथ्याभी हो जाती है। परंतु यह कोई आवश्यक बात नहीं है, कि भक्तिकी उपपत्तिकाके लिये अद्वैत और मायावादको बिलकुल छोड़ देनाही चाहिये। क्योंकि महाराष्ट्रके और अन्य साधु-संतोंने, मायावाद और अद्वैतका स्वीकार करकेभी भक्तिका समर्थन किया है; और मालूम होता है, कि यह पंथ श्रीशंकरा- चार्यके पहलेहीसे चला आ रहा है। इस पंथमें शांकर-संप्रदायके कुछ सिद्धान्त अद्वैत, मायाका मिथ्या होना, और कर्मत्यागकी आवश्यकता ग्राह्य और मान्य हैं। परंतु इस पंथका यहभी मत है, कि ब्रह्मात्मैक्यरूप मोक्षकी प्राप्तिका सबसे सुगम साधन भक्ति है। गीतामें भगवानने पहले यही कारण बतलाया है, कि "क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्" (गीता १२. ५) अर्थात् अव्यक्त ब्रह्ममें चित्त लगाना अधिक क्लेशमय है; और फिर अर्जुनको यही उपदेश दिया है, कि "भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः" (गीता १२. २०) अर्थात् मेरे भक्तही मुझको अतिशय प्रिय हैं। अतएव यह बात है कि अद्वैतपर्यवसायी भक्तिमार्गही गीताका मुख्य प्रतिपाद्य विषय है। श्रीधरस्वामीनेभी गीताकी अपनी टीका (गीता १८. ७८) में गीताका ऐसाही तात्पर्य निकाला है। मराठी भाषामें इस संप्रदायका