श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गीतासंबंधी सर्वोत्तम ग्रंथ 'ज्ञानेश्वरी' है। इसमें कहा है कि गीताके अठारह अध्या- योंमेंसे प्रथम चार अध्यायोंमें कर्म, बीचके सात अध्यायोंमें भक्ति और अंतिम सात अध्यायोंमें ज्ञानका प्रतिपादन किया गया है; और स्वयं ज्ञानेश्वरमहाराजने अपने ग्रंथके अंतमें कहा है, कि मैंने गीताकी यह टीका शंकराचार्यके भाष्यानुसार की है। परंतु ज्ञानेश्वरीको इस कारणसे बिलकुल स्वतंत्र ग्रंथही मानना चाहिये, कि इसमें गीताका मूल अर्थ बहुत बढ़ाकर अनेक सरस दृष्टान्तोंसे समझाया गया है; और इसमें विशेष करके भक्तिमार्गका तथा कुछ अंगमें निष्काम-कर्मका श्री शंकराचार्यसेभी उत्तम विवेचन किया गया है। ज्ञानेश्वरमहाराज स्वयं योगी थे, इसलिये गीताके छठवें अध्यायके जिस श्लोकमें पातंजल योगाभ्यासका विषय आया है, उसकी उन्होंने विस्तृत टीका की है। उनका कहना है, कि श्रीकृष्ण भगवानने इस अध्यायके अंत (गीता ६. ४६) में अर्जुनको यह उपदेश करके कि "तस्माद्योगी भवार्जुन" - इसलिये हे अर्जुन ! तू योगी हो अर्थात् योगाभ्यासमें प्रवीण हो - अपना यह अभिप्राय प्रकट किया है, कि सब मोक्षपंथोंमें पातंजल योग- ही सर्वोत्तम है; और इसलिये आपने उसे 'पंथराज' कहा है। सारांश यह है, कि भिन्न भिन्न सांप्रदायिक भाष्यकारोंने तथा टीकाकारोंने गीताका अर्थ अपने मतोंके अनुकूलही निश्चितकर लिया है। प्रत्येक संप्रदायका यही कथन है, कि गीताका प्रवृत्तिविषयक कर्ममार्ग अप्रधान (गौण) है अर्थात् केवल ज्ञानका साधन है। गीता- में वही तत्त्वज्ञान पाया जाता है, जो उनके संप्रदायमें स्वीकृत हुआ है। उनके संप्रदायमें मोक्षकी दृष्टिसे जो आचार अंतिम कर्तव्य माने गये हैं, उन्हींका वर्णन गीतामें किया गया है - अर्थात् मायावादात्मक अद्वैत और कर्मसंन्यास, मायासत्यत्व- प्रतिपादक विशिष्टाद्वैत और वासुदेव-भक्ति, द्वैत आणि विष्णुभक्ति, शुद्धाद्वैत और भक्ति, शांकराद्वैत और भक्ति, पातंजल योग आणि भक्ति, केवल भक्ति, केवल योग या केवल ब्रह्मज्ञान (अनेक प्रकारके निवृत्तिविषयक मोक्षमार्ग) ही गीताके प्रधान तथा प्रतिपाद्य विषय है। * भगवद्गीतामें कर्मयोग प्रधान माना गया है, इस प्रकार कोईभी नहीं कहता। हमाराही नहीं किंतु प्रसिद्ध महाराष्ट्र-कवि वामन पंडितकाभी मत ऐसाही है। गीतापर आपने 'यथार्थदीपिका' नामक विस्तृत मराठी टीका लिखी है। उसके उपोद्घातमें वे पहले लिखते हैं :- " हे भगवन् ! इस कलियुगमें जिसके मतमें जैसा जँचता है, उसी प्रकार हरएक आदमी गीताका अर्थ लिख देता है" और फिर शिकायतके तौरपर लिखते हैं :-
- भिन्न भिन्न सांप्रदायिक आचार्योंके गीताके भाष्य और मुख्य मुख्य पंद्रह टीकाग्रंथ बंबईके गुजराती प्रिंटिंग प्रेसके मालिकने, हालहीमें एकत्र प्रकाशित किये हैं। भिन्न भिन्न टीकाकारोंके अभिप्रायको एकस्थ जाननेके लिये यह ग्रंथ बहुत उपयोगी है।