श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविषयप्रवेश १९ " हे परमात्मन् ! सब लोगोंने किसी-न-किसी बहानेसे गीताका मनमाना अर्थ किया है, परंतु इन लोगोंका मनमाना अर्थ मुझे पसंद नहीं। भगवन् ! मैं क्या करूं ?" अनेक सांप्रदायिक टीकाकारोंके मतोंकी इस भिन्नताको देखकर कुछ लोग कहते हैं, कि जब कि ये सब मोक्ष-संप्रदाय परस्परविरोधी हैं; और जब कि इस बातका निश्चय नहीं किया जा सकता, कि इनमेंसे कोई एकही संप्रदाय गीतामें प्रतिपादित किया गया है, तब तो यही मानना उचित है, कि इन सब मोक्ष- साधनोंका - विशेषतः कर्म, भक्ति और ज्ञानका-वर्णन स्वतंत्र रीतिसे संक्षेपमें और पृथक् पृथक् करके भगवान्ने गीतामें अर्जुनका समाधान किया है। कुछ लोग कहते हैं, कि मोक्षके अनेक उपायोंका यह सब वर्णन पृथक् पृथक् नहीं है; किंतु इन सबकी एकताही गीतामें सिद्ध की गयी है। और, अंतमें, कुछ लोग तो यहभी कहते हैं, कि गीतामें प्रतिपादित ब्रह्मविद्या ऊपर ऊपरपर देखनेसे यद्यपि सुलभ मालूम होती है, तथापि उसका वास्तविक मर्म अत्यंत गूढ है, जो बिना गुरुके किसीकीभी समझ- में नहीं आ सकता (गीता ४. ३४) गीतापर भलेही अनेक टीकाएँ हो जायें, परंतु उसका गूढार्थ जाननेके लिये गुरुदीक्षाके सिवा और कोई उपाय नहीं है। अब यह बात स्पष्ट है, कि गीताके अनेक प्रकारके तात्पर्य कहे गये हैं। पहले तो स्वयं महाभारतकारने भागवत-धर्मानुसार अर्थात् प्रवृत्तिविषयक तात्पर्य बतलाया है। इसके बाद अनेक पंडित, आचार्य, कवि, योगी और भक्तजनोंने अपने अपने संप्रदायोंके अनुसार शुद्ध निवृत्तिविषयक तात्पर्य बतलाया है। इन भिन्न भिन्न तात्पयोंको देखकर कोईभी मनुष्य घबड़ाकर सहजही यह प्रश्न कर सकता है ! - क्या, ऐसे परस्पर-विरोधी अनेक तात्पर्य एकही गीताग्रंथसे निकल सकते हैं ? और, यदि निकल सकते हैं, तो इस भिन्नताका हेतु क्या है ? इसमें संदेह नहीं, कि भिन्न भिन्न भाष्योंके आचार्य बड़े विद्वान्, धार्मिक और सुशील थे। यदि कहा जाय, कि शंकराचार्यके समान महातत्त्वज्ञानी आजतक संसारमें कोईभी नहीं हुआ है, तोभी अतिशयोक्ति न होगी। तब फिर इनमें और इनके बादके आचार्योंमें इतना मतभेद क्यों हुआ ? गीता कोई इंद्रजाल नहीं है, कि जिससे मनमाना अर्थ निकाल लिया जावे । उपर्युक्त संप्रदायके जन्मके पहलेही गीता बन चुकी थी और भगवान्ने अर्जुनको गीताका उपदेश इसलिये दिया था कि उसका भ्रम दूर हो; कुछ इसलिये नहीं कि उसका भ्रम औरभी बढ़ जाय । गीतामें एक- ही विशेष और निश्चित अर्थका उपदेश किया गया है (गीता ५. १, २) और अर्जुनपर उस उपदेशका अपेक्षित परिणामभी हुआ है। इतना सब कुछ होनेपरभी गीताके तात्पर्यार्थके विषयमें इतनी गड़बड़ क्यों हो रही है ? यह प्रश्न कठिन है सही; परंतु इसका उत्तर उतना कठिन नहीं है, जितना पहले पहल मालूम पड़ता है। उदाहरणार्थ, एक मीठे और सुरस पक्वान्न (मिठाई) को देखकर अपनी अपनी रुचिके अनुसार किसीने उसे गेहूँका, किसीने घीका और किसीने शक्करका