श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 67, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ें२० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र बना हुआ बतलाया, तो हम उनमेंसे किसको झूठ समझें ? अपने अपने मता- नुसार तीनोंका कहना ठीक है। इतना होनेपरभी इस प्रश्नका निर्णय नहीं हुआ कि वह पक्वान्न ( मिठाई ) बना किस चीजसे है। गेहूँ, घी और शक्करसे अनेक प्रकारके पक्वान्न ( मिठाई ) बन सकते हैं। परंतु प्रस्तुत पक्वान्नका निश्चय केवल इतना कहनेसेही नहीं हो सकता कि वह गोधूमप्रधान, घृतप्रधान, या शर्कराप्रधान है। समुद्र-मंथनके समय किसीको अमृत, किसीको विष, किसीको लक्ष्मी, ऐरावत, कौस्तुभ, पारिजात आदि भिन्न भिन्न पदार्थ मिले; परंतु इतनेहीसे समुद्रके यथार्थ स्वरूपका कुछ निर्णय नहीं हो गया । ठीक इसी तरह सांप्रदायिक रीतिसे गीतासागरको मथने- वाले टीकाकारोंकी अवस्था हो गई है। दूसरा उदाहरण लीजिये । कंसवधके समय भगवान् श्रीकृष्ण जब रंग-मंडपमें आये तब वे प्रेक्षकोंको भिन्न भिन्न स्वरूपके - जैसे योद्धाको वज्र-सदृश, स्त्रियोंको कामदेव-सदृश, माता-पिताको पुत्र-सदृश - दिखने लगे थे । (भाग. १०, पू. ४३. १७) । इसी तरह गीताके एक होनेपरभी वह भिन्न भिन्न संप्रदायवालोंको भिन्न भिन्न स्वरूपोंमें दिखने लगे है। आप किसीभी संप्रदायको लें; यह बात स्पष्ट मालूम हो जायगी, कि उसको सामान्यतः प्रमाणभूत धर्मग्रंथोंका अनुसरणही करना पड़ता है; क्योंकि ऐसा न करनेसे वह संप्रदाय सब लोगोंकी दृष्टिमें सर्वथा अप्रमाणित एवम् अमान्य हो जायगा ! इसलिये वैदिक धर्ममें अनेक संप्रदायोंके होनेपरभी कुछ विशेष बातोंको छोड़कर - जैसे ईश्वर, जीव और जगतका परस्पर संबंध - शेष सब बातें सब संप्रदायोंमें प्रायः एकही-सी होती हैं। इसका परिणाम यह देख पड़ता है, कि हमारे धर्मके प्रमाणभूत ग्रंथोंपर जो सांप्र- दायिक भाष्य या टीकाएँ हैं, उनमें मूलग्रंथोंके फी - सदी नब्बेसेभी अधिक वचनों या श्लोकोंका भावार्थ, एकही-सा है। जो कुछ भेद है, वह शेष वचनों या श्लोकोंके विषयहीमें है। यदि इन वचनोंका सरल अर्थ लिया जाय तो वह सभी संप्रदायोंके लिये समान अनुकूल नहीं हो सकता । इसलिये भिन्न भिन्न सांप्रदायिक टीकाकार इन वचनोंमेंसे जो अपने संप्रदायके लिये अनुकूल हों, उन्हींको प्रधान मानकर और अन्य सब वचनोंको गौण समझकर, अथवा प्रतिकूल वचनोंके अर्थको किसी युक्तिसे बदलकर, या सुबोध तथा सरल वचनोंमेंसे अपने अनुकूल श्लेषार्थ या अनुमान निकालकर, यह प्रतिपादन किया करते हैं, कि हमाराही संप्रदाय उक्त प्रमाणोंसे सिद्ध होता है। उदाहरणार्थ, गीता २. १२ और १६; ३. १९; ६. ३; और १८. २ श्लोकोंपर हमारी टीका देखो। परंतु यह बात सहजही किसीकीभी समझमें आ सकती है, कि उक्त सांप्रदायिक रीतिसे ग्रंथका तात्पर्य निश्चित करना; और इस बातका अभिमान न करके, कि गीतामें अपनाही संप्रदाय प्रतिपादित हुआ है; अथवा अन्य किसीभी प्रकारका अभिमान न करके समग्र ग्रंथकी स्वतंत्र रीतिसे परीक्षा करना; और उस परीक्षाहीके आधारपर ग्रंथका मथितार्थ निश्चित करना, ये दोनों बातें स्वभावतः अत्यंत भिन्न हैं।