भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 68

विषयप्रवेश २१ ग्रंथके तात्पर्य-निर्णयकी सांप्रदायिक दृष्टि सदोष है, इसलिये उसे यदि छोड़ दें, तो अब यह बतलाना चाहिये, कि गीताका तात्पर्य जाननेके लिये दूसरा साधन कौनसा है। ग्रंथ, प्रकरण और वाक्योंके अर्थका निर्णय करनेमें मीमांसक लोग अत्यंत कुशल होते हैं। इस विषयमें उन लोगोंका एक प्राचीन और सर्वमान्य श्लोक है :- उपक्रमोपसंहारो अभ्यासोऽपूर्वता फलम् । अर्थवादोपपत्ती च लिंगं तात्पर्यनिर्णये ॥ जिसमें वे कहते हैं - किसीभी लेख, प्रकरण अथवा ग्रंथके तात्पर्यका निर्णय करनेमें, उक्त श्लोकमें कही हुई सात बातें साधन-(लिंग) स्वरूप हैं; इसलिये इन सब बातोंका अवश्य विचार करना चाहिये। इनमें सबसे पहली बात 'उपक्रमोपसंहारौ' अर्थात् ग्रंथका आरंभ और अंत है। कोईभी मनुष्य अपने मनमें कुछ विशेष हेतु रखकरही ग्रंथ लिखना आरंभ करता है; और उस हेतुके सिद्ध होनेपर ग्रंथको समाप्त करता है। अतएव ग्रंथके तात्पर्यनिर्णयके लिये उपक्रम और उपसंहारहीका सबसे पहले विचार किया जाना चाहिये। सीधी रेखाकी व्याख्या करते समय भूमितिशास्त्रमें ऐसा कहा गया है, कि आरंभके बिंदुसे जो रेखा दाहिने-बाएँ या ऊपर-नीचे किसी तरफ नहीं झुकती और अंतिम बिंदुतक सीधी चली जाती है, उसे सरल रेखा कहते हैं। ग्रंथके तात्पर्य-निर्णयमेंभी यही सिद्धान्त उपयुक्त है। जो तात्पर्य ग्रंथके आरंभ और अंतमें साफ साफ़ झलकता है वही ग्रंथका सरल तात्पर्य है। आरंभसे अंततक जानेके लिये यदि अन्य मार्ग होंभी, तो उन्हें टेढ़े समझना चाहिये। आद्यंत देखकर ग्रंथका तात्पर्य पहले निश्चित करलेना चाहिये; और तब यह देखना चाहिये, कि उस ग्रंथमें 'अभ्यास' अर्थात् पुनरुक्ति- स्वरूपमें बार बार क्या कहा गया है। क्योंकि ग्रंथकारके मनमें जिस बातको सिद्ध करनेकी इच्छा होती है, उसके समर्थनके लिये वह अनेक बार कई कारणोंका उल्लेख करके वार बार एकही निश्चित सिद्धान्तको प्रकट किया करता है और हर बार कहा करता है, कि " इसलिये यह बात सिद्ध हो गयी; " या " अतएव ऐसा करना चाहिये " इत्यादि। ग्रंथके तात्पर्यका निर्णय करनेके लिये जो चौथा साधन है उसकी 'अपूर्वता' और पाँचवें साधनको 'फल' कहते हैं। 'अपूर्वता' कहते हैं 'नवीनता'को। कोईभी ग्रंथकार जब ग्रंथ लिखना शुरू करता है, तब वह कुछ नई बात बतलाना चाहता है; बिना नवीनता या विशेष वक्तव्यके वह ग्रंथ लिखने प्रवृत्त नहीं होता। विशेष करके यह बात उस जमानेमें पाई जाती थी जब की छापा- खाने नहीं थे। इसलिये किसी ग्रंथके तात्पर्यका निर्णय करनेसे पहले यहभी देखना चाहिये, कि उसमें अपूर्वता, विशेषता या नवीनता क्या है। इसी तरह लेख अथवा ग्रंथके फलपरभी - अर्थात् उस लेख या ग्रंथसे जो परिणाम हुआ हो उसपरभी - ध्यान देना चाहिये। क्योंकि अमुक फल हो, इसी हेतुसे ग्रंथ लिखा जाता है। इसलिये