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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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२२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र यदि घटित परिणाम पर ध्यान दिया जाय तो उससे ग्रंथकर्ताका आशय बहुत ठीक ठीक व्यक्त हो जाता है। छठा और सातवाँ साधन 'अर्थवाद' और 'उपपत्ति' हैं। 'अर्थवाद' मीमांसकोंका पारिभाषिक शब्द है (जै. सू. १. २. १. १८)। इस बातके निश्चित हो जानेपरभी, कि हमें मुख्यतः किस बातको बतलाकर जमा देना है अथवा किस बातको सिद्ध करना है, कभी कभी ग्रंथकार दूसरी अनेक बातोंका प्रसंगानुसार वर्णन किया करता है; जैसे प्रतिपादनके प्रवाहमें दृष्टान्त देनेके लिये, तुलना करके एकवाक्यता करनेके लिये, समानता और भेद दिखलानेके लिये, प्रतिपक्षियोंके दोष बतलाकर स्वपक्षका मंडन करनेके लिये, अलंकार और अति- शयोक्तिके लिये, और युक्तिवादके पोषक किसी विषयका पूर्व-इतिहास बतलानेके लिये कुछ और वर्णनभी कर देता है। उक्त कारणों या प्रसंगोंके अतिरिक्त औरभी अन्य कारण हो सकते हैं; और कभी तो विशेष कारणभी नहीं होता। ऐसी अवस्थामें ग्रंथकार जो वर्णन करता है, वह यद्यपि विषयांतर नहीं हो सकता, तथापि वह केवल गौरवके लिये या स्पष्टीकरणके लियेही किया जाता है, इसलिये यह नहीं माना जा सकता कि उक्त वर्णन हमेशा सत्यही होगा।* अधिक क्या कहा जाय, कभी कभी स्वयं ग्रंथकार यह देखनेके लिये सावधान नहीं रहता, कि ये अप्रधान बातें अक्षरशः सत्य हैं या नहीं। अतएव ये सब बातें प्रमाणभूत नहीं मानी जातीं; अर्थात् यह नहीं माना जाता, कि इन भिन्न भिन्न बातोंका ग्रंथकारके सिद्धान्त पक्षके साथ कोई घना संबंध है। उलटे यही माना जाता है, कि ये सब बातें अनावश्यक अथवा केवल प्रशंसा या स्तुतिहीके लिये हैं - ऐसा समझकरही मीमांसक लोग इन्हें 'अर्थवाद' कहा करते हैं, और इन अर्थवादात्मक बातोंको छोड़कर फिर ग्रंथका तात्पर्य निश्चित किया करते हैं। इतना कर लेनेपरभी उपपत्तकी ओर ध्यान देनाही चाहिये। किसी विशेष बातको सिद्धकर दिखलानेके लिये बाधक प्रमाणोंका खंडन करना और साधक प्रमाणोंका तर्कशास्त्रानुसार मंडन करना 'उपपत्ति' अथवा 'उपपादन' कहलाता है। उपक्रम और उपसंहार-रूप आद्यंतके दो छोरोंके स्थिर हो जाने पर, बीचका मार्ग अर्थवाद और उपपत्तकी सहायतासे निश्चित किया जा सकता है। अर्थवादसे यह मालूम हो सकता है, कि कौनसा विषय अप्रस्तुत या आनुषंगिक (अप्रधान) है। एक बार अर्थवादका निर्णय हो जानेपर ग्रंथ-तात्पर्यका निश्चय करनेवाला मनुष्य सब टेढ़े मेढ़े रास्तोंको छोड़ देता है, और ऐसा करनेपर जब पाठक या परीक्षक सीधे और प्रधान मार्गपर आ जाता है, तब वह उपपत्तकी सहायतासे ग्रंथके आरंभसे अंतिम तात्पर्यतक आप-

  • अर्थवादका वर्णन यदि वस्तुस्थिति (यथार्थता) के आधारपर किया गया हो तो उसे 'अनुवाद' कहते हैं; यदि विरुद्ध रीतिसे किया गया हो तो उसे 'गुणवाद' कहते हैं; और यदि इससे भिन्न प्रकारका हो तो उसे 'भूतार्थवाद' कहते हैं। 'अर्थवाद' सामान्य शब्द है; उसके सत्यासत्यके अनुसार उक्त तीन भेद किये गये हैं।