भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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विषयप्रवेश २३

ही-आप पहुँच जाता है। हमारे प्राचीन मीमांसकोंके निश्चित किये ग्रंथ तात्पर्य- निर्णय के ये नियम सब देशोंके विद्वानोंको एकसमान मान्य हैं। इसलिये उप- योगिता और आवश्यकताके संबंधमें यहाँ अधिक विवेचन करनेकी आवश्यकता नहीं है।* इसपर यह प्रश्न किया जा सकता है, कि क्या मीमांसकोंके उक्त नियम संप्रदाय चलानेवाले आचार्योंको मालूम नहीं थे? यदि ये सब नियम उनके ग्रंथोंहीमें पाये जाते हैं, तो फिर उनका बताया हुआ गीताका तात्पर्य एकदेशीय कैसे कहा जा सकता है? उसका उत्तर इतनाही है, कि एक बार किसीकी दृष्टि सांप्रदायिक (संकुचित) बन जाती है, तब वह व्यापकताका स्वीकार नही कर सकता

  • तब वह किसी-न-किसी रीतिसे यही सिद्ध करनेका यत्न किया करता है, कि प्रमाणभूत धर्मग्रंथोंमें अपनेही संप्रदायका वर्णन किया गया है। इन ग्रंथोंके तात्पर्यके विषयमें सांप्रदायिक टीकाकारोंकी पहलेसेही ऐसी धारणा हो जाती है, कि यदि उक्त ग्रंथोंका, उनके सांप्रदायके अर्थसे भिन्न कुछ दूसरा अर्थ हो सकता हो, तो वे यह समझते हैं, कि वह अर्थ सत्य नहीं है, उसका हेतु कुछ औरही है। इस प्रकार जब वे पहलेसे निश्चित किये हुए अपनेही संप्रदायके अर्थको सत्य मानने लगते हैं, और यह सिद्धकर दिखानेका यत्न करने लगते हैं, कि वही अर्थ सब धार्मिक ग्रंथोंमें प्रतिपादन किया गया है; तब वे इस बातकी परवाह नहीं करते कि हम मीमांसा- शास्त्रके कुछ नियमोंका उल्लंघन कर रहे हैं। हिंदु धर्मशास्त्रके मिताक्षरा, दायभाग इत्यादि ग्रंथोंमें स्मृतिवचनोंकी व्यवस्था या एकता इसी तत्त्वानुसारकी जाती है। ऐसा नहीं समझना चाहिये कि यह बात केवल हिंदु धर्मग्रंथोंमेंही पाई जाती है। क्रिस्तानोंके आदिग्रंथ बायबल और मुसलमानोंके कुरानमेंभी इन लोगोंके सैकड़ो सांप्रदायिक ग्रंथकारोंने ऐसाही अर्थांतर कर दिया है; और इसी तरह ईसाइयोंने पुरानी बायबलके कुछ वाक्योंका अर्थ यहूदियोंके अर्थसे भिन्न माना है। यहाँतक देखा जाता है, कि जब कभी यह बात पहलेहीसे निश्चित कर दी जाती है, कि किसी विषयपर अमुक ग्रंथ या लेखहीको प्रमाण मानना चाहिये और जब कभी इस प्रमाणभूत तथा नियमित ग्रंथहीके आधारपर सब बातोंका निर्णय करना पड़ता है, तब तो ग्रंथार्थ-निर्णयकी उसी पद्धतिका स्वीकार किया जाता है, जिसका
  • ग्रंथ-तात्पर्य-निर्णयके ये नियम अंग्रेजी अदालतोंमेंभी पाले जाते हैं। उदाहरणार्थ, मान लीजिये कि किसी फैसलेका कुछ मतलब नहीं निकलता। तब हुक्मनामेको देखकर फैसलेके अर्थका निर्णय किया जाता है। और यदि किसी फैसलेमें कुछ ऐसी बातें हों जो मुख्य विषयका निर्णय करनेमें आवश्यक नहीं हैं, तो वे दूसरे मुकदमोंमें प्रमाण (नजीर) नहीं मानी जातीं। ऐसी बातोंको अंग्रेजीमें 'आबिटर डिक्टा' (Obiter Dicta) अर्थात् 'व्यर्थ विधान' कहते हैं; यथार्थमें यह अर्थवादहीका एक भेद है।