भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 71

२४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उल्लेख ऊपर किया गया है। आजकलके बड़े बड़े कायदे-पंडित, वकील और न्यायाधीश लोग, पहलेके प्रमाणभूत कानूनी किताबों और फैसलोंका अर्थ करनेमें जो खींचातानी करते हैं, उसका रहस्यभी यही है। यदि सामान्य लौकिक बातोंका यह हाल है, तो इसमें कुछ आश्चर्य नहीं कि हमारे प्रमाणभूत धर्मग्रंथों - उप- निषद्, वेदान्तसूत्र और गीता - परभी इसी खींचातानीके कारण, भिन्न भिन्न संप्रदायोंके अनेक भाष्य, टीकाग्रंथ लिखे गये हैं। परंतु इस सांप्रदायिक पद्धतिको छोड़कर, यदि उपर्युक्त मीमांसकोंकी पद्धतिसे भगवद्गीताके उपक्रम, उपसंहार आदिको देखें, तो मालूम हो जावेगा कि भारतीय युद्धका आरंभ होनेके पहले जब कुरुक्षेत्रमें दोनों पक्षोंकी सेनाएँ लड़ाईके लिये सुसज्जित हो गई थीं; और जब एक दूसरेपर शस्त्र चलानेहीवाला था, कि इतनेमें अर्जुन ब्रह्मज्ञानकी बड़ी बड़ी बातें बतलाने लगा और 'विमनस्क' होकर संन्यास लेनेको तैयार हो गया; तभी उसे अपने क्षात्रधर्ममें प्रवृत्त करनेके लिये भगवानने गीताका उपदेश दिया है। जब अर्जुन यह देखने लगा कि दुष्ट दुर्योधनके सहायक बनकर उससे लड़ाई करनेके लिये कौन-कौन-से शूर वीर आये हैं, तब वृद्ध भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, गुरुपुत्र अश्वत्थामा, विपक्षी बने हुए अपने बंधु कौरव-गण, अन्य सुहृद् तथा आप्त, मामा-चाचा आदि रिश्तेदार, अनेक राजा और राजपुत्र आदि सब लोग उसे दीख पड़े। तब वह मनमें सोचने लगा कि इन सबको केवल एक छोटेसे हस्तिना- पुरके राज्यकी प्राप्तिके लिये निर्दयतासे मारना पड़ेगा और अपने कुलका क्षय करना पड़ेगा। इस महत्यापके भयसे उसका मन एकदम दुःखित और क्षुब्ध हो गया। एक ओर तो क्षात्रधर्म उससे कह रहा था, कि 'युद्ध कर'; और दूसरी ओर पितृभक्ति, गुरुभक्ति, बंधुप्रेम, सुहृत्प्रीति आदि अनेक धर्म उसे जबरदस्ती पीछे खींच रहे थे ! यह बड़ा भारी संकट था। यदि लड़ाई करे तो अपनेही रिश्तेदारों- की, गुरुजनोंकी, और बंधु-मित्रोंकी हत्या करके महापातकका भागी बनेगा और लड़ाई न करे तो क्षात्रधर्ममे च्युत होना पड़ेगा !! इधर देखो तो कुआँ और उधर देखो तो खाई ! ! ! उस समय अर्जुनकी अवस्था वैसीही हो गयी थी जैसी जोरसे टकराती हुई दो रेलगाड़ियोंके बीचमें किसी असहाय मनुष्यकी हो जाती है। यद्यपि अर्जुन कोई साधारण पुरुष नहीं था, वह एक बड़ा भारी योद्धा था, तथापि धर्माधर्मके इस महान् नैतिक संकटमें पड़कर बेचारेका मुंह सूख गया, शरीरपर रोंगटे खड़े हो गये, धनुष्य हाथसे गिर पड़ा और वह "मैं नहीं लडूंगा" कहकर अति दुःखित चित्तसे रथमें बैठ गया। और अंतमें समीपवर्ती बंधुस्नेहका प्रभाव - उस ममत्वका प्रभाव जो मनुष्यको स्वभावतः प्रिय होता है - दूरवर्ती क्षत्रियधर्मपर जमही गया ! तब वह मोहवश हो कहने लगा, "पिता-सम पूज्य वृद्ध और मित्रोंको मारकर तथा अपने कुलका क्षय करके घोर पाप करके, राज्यका एक टुकड़ा पानेसे भीख माँगकर जीवन निर्वाह करना कहीं श्रेयस्कर है ! चाहे मेरे शत्रु मुझे