भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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अभी निःशस्त्र देखकर मेरी गर्दन उड़ा दें; परंतु मैं अपने स्वजनोंकी हत्या करके उनके खून और शापसे ग्रस्त सुखोंका उपभोग नहीं करना चाहता । क्या क्षात्रधर्म इसीको कहते हैं ? भाईको मारो, गुरुकी हत्या करो, पितृवध करनेसे न चुको, अपने कुलका नाश करो - क्या यही क्षात्रधर्म है ? आग लगे ऐसे अनर्थकारी क्षात्र- धर्ममें और गाज गिरे ऐसी क्षात्रनीतिपर ! दुश्मनोंको ये सब धर्मसंबंधी बातें मालूम नहीं हैं; वे दुष्ट हैं; तो क्या उनके साथ मैंभी पापी हो जाऊँ ? कभी नहीं। मुझे यह देखना चाहिये कि मेरी आत्माका कल्याण कैसे होगा। मुझे तो यह घोर हत्या और पाप करना श्रेयस्कर नहीं जँचता; फिर चाहे क्षात्रधर्म शास्त्रविहित हो, तोभी इस समय मुझे उसकी आवश्यकता नहीं है।" इस प्रकार विचार करते करते उसका चित्त डांवाडोल हो गया और वह किंकर्तव्यविमूढ होकर भगवान् श्रीकृष्णकी शरणमें गया। तब भगवानने उसे गीताका उपदेश देकर उसके चंचल चित्तको स्थिर और शांत कर दिया। इसका यह फल हुआ, कि जो अर्जुन पहले भीष्म आदि गुरुजनोंकी हत्याके भयके कारण युद्धसे पराङ्मुख हो रहा था, वही अब गीताका उपदेश सुनकर अपना यथोचित कर्तव्य समझ गया; और अपनी इच्छासे युद्धके लिये तत्पर हो गया। यदि हमें गीताके उपदेशका रहस्य जानना है, तो इस उपक्रमोप- संहार और परिणामको अवश्य ध्यानमें रखना पड़ेगा। भक्तिसे मोक्ष कैसे मिलता है ? ब्रह्मज्ञान या पातंजल योगसे मोक्षकी सिद्धि कैसे होती है ? इत्यादि, केवल निवृत्ति-मार्ग या कर्मत्यागरूप संन्यास-धर्म-संबंधी प्रश्नोंकी चर्चा करनेका वहाँ कोई प्रयोजन नहीं था। भगवान् श्रीकृष्णका यह उद्देश्य नहीं था, कि, अर्जुन संन्यास-दीक्षा लेकर और बैरागी बनकर भीख मांगता फिरे, या लंगोटी लगा- कर और नीमके पत्ते खाकर मृत्युपर्यंत हिमालयमें योगाभ्यास साधता रहे। अथवा भगवानका यहभी उद्देश्य नहीं था कि अर्जुन धनुष्य-बाणको फेंक दे और हाथमें वीणा तथा मृदंग लेकर कुरुक्षेत्रकी धर्मभूमिमें उपस्थित भारतीय क्षात्रसमाजके सामने भगवन्नामका उच्चारण करता हुआ, बृहन्नडाके समान और एक बार अपना नाच दिखावें। अब तो अज्ञातवास पूरा हो गया था और अर्जुनको कुरुक्षेत्रम खड़े होकर औरही प्रकार का नाच नाचना था। गीता कहते कहते स्थान स्थानपर भगवानने अनेक प्रकारके अनेक कारण बतलाये हैं; और अंतमें अनुमानदर्शक अत्यंत महत्त्वके 'तस्मात्' ('इसलिये') पदका उपयोग करके अर्जुनको यही निश्चितार्थक कर्म-विषयक उपदेश दिया है कि "तस्माद्युध्यस्व भारत" - इसलिये हे अर्जुन ! तू युद्ध कर (गीता २. १८); "तस्मादुत्तिष्ठ कौंतेय युद्धाय कृतनिश्चयः"

  • इसलिये हे कौंतेय अर्जुन ! तू युद्धका निश्चय करके उठ (गीता २. ३७); "तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर" - इसलिये तू मोह छोड़कर अपना कर्तव्य-कर्म कर (गीता ३. १९); "कुरु कर्मैव तस्मात् त्वं" - इसलिये तू कर्मही कर (गीता ४. १५); "मामनुस्मर युध्य च" - इसलिये मेरा स्मरण कर और