श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र लड ( गीता ८. ७ ) ; “करने-करानेवाला सब कुछ मैं ही हूँ, तू केवल निमित्त है, इसलिये युद्ध करके शत्रुओंको जीत ” ( गीत ११. ३३) ; “ शास्त्रोक्त कर्तव्य करना तुझे उचित है ” ( गीता १६. २४ ) । अठारहवें अध्यायके उपसंहारमें भगवानने अपने निश्चित और उत्तम मतको औरभी एक बार प्रकट किया है- “ इन सब कर्मोंको करना चाहिये ” ( गीता १८. ६ ) । और अंतमें ( गीता १७. ७२ ), भगवानने अर्जुनसे प्रश्न किया है, कि “ हे अर्जुन ! तेरा अज्ञानमोह अभीतक नष्ट हुआ कि नहीं ? ” इसपर अर्जुनने संतोषजनक उत्तर दिया :- नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत । स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव ॥ अर्थात् “ हे अच्युत ! स्वकर्तव्यसंबंधी मेरा मोह और संदेह नष्ट हो गया है; अब मैं आपके कथनानुसार सब काम करूँगा । ” यह अर्जुनका केवल मौखिक उत्तर नहीं था; उसने सचमुच उस युद्धमें भीष्म-कर्ण-जयद्रथ आदिका वधभी किया । इस- पर कुछ लोग कहते हैं, कि “ भगवानने अर्जुनको जो उपदेश दिया है वह केवल निवृत्तिविषयक ज्ञान, योग या भक्तिकाही है; और यही गीताका मुख्य प्रतिपाद्य विषयभी है। परंतु युद्धका आरंभ हो जानेके कारण बीच बीचमें, कर्मकी थोड़ी-सी प्रशंसा करके भगवानने अर्जुनको युद्ध पूरा करने दिया है; अर्थात् युद्धका समाप्त करना मुख्य बात नहीं है- उसे आनुषंगिक या अर्थवादात्मकही मानना चाहिये ” परंतु ऐसे अधूरे और कमजोर युक्तिवादसे गीताके उपक्रमोपसंहार और परिणाम- की उपपत्ति ठीक ठीक नहीं हो सकती । यहाँ (कुरुक्षेत्र) पर तो इसी बातके महत्व और आबश्यकताको दिखाना याकि स्वधर्मसम अपने कर्तव्यको मरणपर्यंत अनेक कष्ट और बाधाएँ सहकरभी करते रहना चाहिये। और इस बातको सिद्ध करनेके लिये श्रीकृष्णने गीताभरमें कहींभी बे-सिर-पैरका कारण नहीं बतलाया है, जैसा ऊपर लिखे हुए कुछ लोगोंके आक्षेपमें कहा गया है। यदि ऐसा युक्तिहीन कारण बतलाया- भी गया होता तो अर्जुनसरीखा बुद्धिमान और छानबीन करनेवाला पुरुष इन बातोंका विश्वास कैसे कर लेता ? उसके मनमें मुख्य प्रश्न क्या था ? यही न, कि भयंकर कुलक्षयको प्रत्यक्ष आँखोंके आगे देखकरभी मुझे युद्ध करना चाहिये या नहीं; और युद्ध करनाही हो तो कैसे करे, जिससेकी पाप न लगे ? इस बिकट प्रश्नके ( इस प्रधान विषयके ) उत्तरको, कि “ निष्काम बुद्धिसे युद्ध कर ” या “ कर्म कर ” - अर्थवाद कहकरभी नहीं टाल सकते । ऐसा करना मानों घरके मालिकको उसीके घरमें मेहमान बना देना है। हमारा यह कहना नहीं है, कि गीतामें वेदान्त, भक्ति और पातंजल योगका उपदेश बिलकुल दियाही नहीं गया है। परंतु इन तीनों विषयोंका गीतामें जो मेल किया गया है, वह केवल ऐसाही होना चाहिये, कि जिससे परस्पर- विरुद्ध धर्मोंके भयंकर संकटमें पड़े हुए, “ यह करूँ कि वह ” कहनेवाले कर्तव्य-मूढ़ अर्जुनको अपने कर्तव्यके विषयमें कोई निष्पाप मार्ग मिल जाय; और वह क्षात्रधर्मके