भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 74

अनुसार अपने शास्त्रविहित कर्ममें प्रवृत्त हो जाय । इससे यही बात सिद्ध होती है, कि प्रवृत्तिधर्महीका ज्ञान गीताका प्रधान विषय है; और अन्य सब बातें उस प्रधान विषयहीकी सिद्धिके लिये कही गयी हैं। अर्थात् वे सब आनुषंगिक हैं। अतएव गीताधर्मका रहस्यभी प्रवृत्तिविषयक अर्थात् कर्मविषयकही होना चाहिये । परंतु इस बातका स्पष्टीकरण किसी टीकाकारने नहीं किया है, कि वह प्रवृत्तिविषयक रहस्य क्या है; और वेदान्तशास्त्रहीसे कैसे सिद्ध हो सकता है। जिस टीकाकारको देखो, वही गीताके आद्यंत के उपक्रम-उपसंहार तथा फलपर ध्यान न देकर निवृत्ति- दृष्टिसे इस बातका विचार करनेहीमें निमग्न दीख पड़ता है, कि गीताका ब्रह्मज्ञान या भक्ति अपनेही संप्रदायके कैसे अनुकूल है। मानों ज्ञान और भक्तिका कर्मसे नित्य संबंध बतलाना एक बड़ा भारी पाप है। यही शंका एक टीकाकारके मनमें हुई थी; और उसने लिखा था, कि स्वयं श्रीकृष्णके चरित्रको आंखोंके सामने रखकर भगवद्गीताका अर्थ करना चाहिये* । श्रीक्षेत्र काशीके सुप्रसिद्ध अद्वैती परमहंस श्रीकृष्णानंद स्वामीका - जो हालहीमें समाधिस्थ हुए हैं - भगवद्गीता- पर लिखा हुआ 'गीतार्थ-परामर्श' नामक संस्कृतमें एक निबंध है, उसमें स्पष्ट रीतिसे यही सिद्धान्त लिखा हुआ है, कि "तस्मात् गीता नाम ब्रह्मविद्यामलं नीतिशास्त्रम्" अर्थात् - इसलिये गीता वह नीतिशास्त्र अथवा कर्तव्यधर्मशास्त्र है जो कि ब्रह्म- विद्यासे सिद्ध होता है ।† यही बात जर्मन पंडित प्रो. डॉयसेनने अपने ' उपनिषदों- का तत्त्वज्ञान ' नामक ग्रंथमें कही है। इनके अतिरिक्त पश्चिमी और पूर्वी गीता- परीक्षक अनेक विद्वानोंकाभी यही मत है। तथापि इनमेंसे किसीने समस्त गीता- ग्रंथकी परीक्षा करके यह स्पष्टतया दिखलानेका प्रयत्न नहीं किया है, कि कर्मप्रधान दृष्टिसे उसके सब प्रतिपादनों और अध्यायोंका मेल कैसा है। बल्कि डॉयसेनने अपने ग्रंथमें कहा है ‡, कि यह प्रतिपादन कष्टसाध्य है। इसलिये प्रस्तुत ग्रंथका मुख्य उद्देश्य यही है, कि उक्त रीतिसे गीताकी परीक्षा करके उसके विषयोंका मेल अच्छी तरह प्रकटकर दिया जावे परंतु । ऐसा करनेसे पहले, गीताके आरंभमें परस्परविरुद्ध नीतिधर्मोंकी पकड़में फँसे अर्जुनपर जो संकट आया था उसका असली रूपभी दिखलाना चाहिये; नहीं तो गीतामें प्रतिपादित विषयोंका मर्म पाठकोंके ध्यानमें पूर्णतया नहीं जम सकेगा । इसलिये अब यह जाननेके लिये कर्म-अकर्म


  • इस टीकाकारका नाम और उसकी टीकाके कुछ अवतरण बहुत दिन हुए एक महाशयने हमको पत्रद्वारा बतलाये थे । परंतु हमारी परिस्थितिकी गड़बड़में यह पत्र न जाने कहाँ खो गया । † श्रीकृष्णानंदस्वामीकृत चारों निबंध ( श्रीगीतारहस्य, गीतार्थप्रकाश, गीतार्थपरामर्श और गीतासारोद्धार) एकत्र करके राजकोटमें प्रकाशित किये गये हैं। ‡ Prof. Deussen's 'Philosophy of the Upanishads' P. 362. (English Translation, 1906. )