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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

२६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र लड ( गीता ८. ७ ) ; “करने-करानेवाला सब कुछ मैं ही हूँ, तू केवल निमित्त है, इसलिये युद्ध करके शत्रुओंको जीत ” ( गीत ११. ३३) ; “ शास्त्रोक्त कर्तव्य करना तुझे उचित है ” ( गीता १६. २४ ) । अठारहवें अध्यायके उपसंहारमें भगवानने अपने निश्चित और उत्तम मतको औरभी एक बार प्रकट किया है- “ इन सब कर्मोंको करना चाहिये ” ( गीता १८. ६ ) । और अंतमें ( गीता १७. ७२ ), भगवानने अर्जुनसे प्रश्न किया है, कि “ हे अर्जुन ! तेरा अज्ञानमोह अभीतक नष्ट हुआ कि नहीं ? ” इसपर अर्जुनने संतोषजनक उत्तर दिया :- नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत । स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव ॥ अर्थात् “ हे अच्युत ! स्वकर्तव्यसंबंधी मेरा मोह और संदेह नष्ट हो गया है; अब मैं आपके कथनानुसार सब काम करूँगा । ” यह अर्जुनका केवल मौखिक उत्तर नहीं था; उसने सचमुच उस युद्धमें भीष्म-कर्ण-जयद्रथ आदिका वधभी किया । इस- पर कुछ लोग कहते हैं, कि “ भगवानने अर्जुनको जो उपदेश दिया है वह केवल निवृत्तिविषयक ज्ञान, योग या भक्तिकाही है; और यही गीताका मुख्य प्रतिपाद्य विषयभी है। परंतु युद्धका आरंभ हो जानेके कारण बीच बीचमें, कर्मकी थोड़ी-सी प्रशंसा करके भगवानने अर्जुनको युद्ध पूरा करने दिया है; अर्थात् युद्धका समाप्त करना मुख्य बात नहीं है- उसे आनुषंगिक या अर्थवादात्मकही मानना चाहिये ” परंतु ऐसे अधूरे और कमजोर युक्तिवादसे गीताके उपक्रमोपसंहार और परिणाम- की उपपत्ति ठीक ठीक नहीं हो सकती । यहाँ (कुरुक्षेत्र) पर तो इसी बातके महत्व और आबश्यकताको दिखाना याकि स्वधर्मसम अपने कर्तव्यको मरणपर्यंत अनेक कष्ट और बाधाएँ सहकरभी करते रहना चाहिये। और इस बातको सिद्ध करनेके लिये श्रीकृष्णने गीताभरमें कहींभी बे-सिर-पैरका कारण नहीं बतलाया है, जैसा ऊपर लिखे हुए कुछ लोगोंके आक्षेपमें कहा गया है। यदि ऐसा युक्तिहीन कारण बतलाया- भी गया होता तो अर्जुनसरीखा बुद्धिमान और छानबीन करनेवाला पुरुष इन बातोंका विश्वास कैसे कर लेता ? उसके मनमें मुख्य प्रश्न क्या था ? यही न, कि भयंकर कुलक्षयको प्रत्यक्ष आँखोंके आगे देखकरभी मुझे युद्ध करना चाहिये या नहीं; और युद्ध करनाही हो तो कैसे करे, जिससेकी पाप न लगे ? इस बिकट प्रश्नके ( इस प्रधान विषयके ) उत्तरको, कि “ निष्काम बुद्धिसे युद्ध कर ” या “ कर्म कर ” - अर्थवाद कहकरभी नहीं टाल सकते । ऐसा करना मानों घरके मालिकको उसीके घरमें मेहमान बना देना है। हमारा यह कहना नहीं है, कि गीतामें वेदान्त, भक्ति और पातंजल योगका उपदेश बिलकुल दियाही नहीं गया है। परंतु इन तीनों विषयोंका गीतामें जो मेल किया गया है, वह केवल ऐसाही होना चाहिये, कि जिससे परस्पर- विरुद्ध धर्मोंके भयंकर संकटमें पड़े हुए, “ यह करूँ कि वह ” कहनेवाले कर्तव्य-मूढ़ अर्जुनको अपने कर्तव्यके विषयमें कोई निष्पाप मार्ग मिल जाय; और वह क्षात्रधर्मके

अनुसार अपने शास्त्रविहित कर्ममें प्रवृत्त हो जाय । इससे यही बात सिद्ध होती है, कि प्रवृत्तिधर्महीका ज्ञान गीताका प्रधान विषय है; और अन्य सब बातें उस प्रधान विषयहीकी सिद्धिके लिये कही गयी हैं। अर्थात् वे सब आनुषंगिक हैं। अतएव गीताधर्मका रहस्यभी प्रवृत्तिविषयक अर्थात् कर्मविषयकही होना चाहिये । परंतु इस बातका स्पष्टीकरण किसी टीकाकारने नहीं किया है, कि वह प्रवृत्तिविषयक रहस्य क्या है; और वेदान्तशास्त्रहीसे कैसे सिद्ध हो सकता है। जिस टीकाकारको देखो, वही गीताके आद्यंत के उपक्रम-उपसंहार तथा फलपर ध्यान न देकर निवृत्ति- दृष्टिसे इस बातका विचार करनेहीमें निमग्न दीख पड़ता है, कि गीताका ब्रह्मज्ञान या भक्ति अपनेही संप्रदायके कैसे अनुकूल है। मानों ज्ञान और भक्तिका कर्मसे नित्य संबंध बतलाना एक बड़ा भारी पाप है। यही शंका एक टीकाकारके मनमें हुई थी; और उसने लिखा था, कि स्वयं श्रीकृष्णके चरित्रको आंखोंके सामने रखकर भगवद्गीताका अर्थ करना चाहिये* । श्रीक्षेत्र काशीके सुप्रसिद्ध अद्वैती परमहंस श्रीकृष्णानंद स्वामीका - जो हालहीमें समाधिस्थ हुए हैं - भगवद्गीता- पर लिखा हुआ 'गीतार्थ-परामर्श' नामक संस्कृतमें एक निबंध है, उसमें स्पष्ट रीतिसे यही सिद्धान्त लिखा हुआ है, कि "तस्मात् गीता नाम ब्रह्मविद्यामलं नीतिशास्त्रम्" अर्थात् - इसलिये गीता वह नीतिशास्त्र अथवा कर्तव्यधर्मशास्त्र है जो कि ब्रह्म- विद्यासे सिद्ध होता है ।† यही बात जर्मन पंडित प्रो. डॉयसेनने अपने ' उपनिषदों- का तत्त्वज्ञान ' नामक ग्रंथमें कही है। इनके अतिरिक्त पश्चिमी और पूर्वी गीता- परीक्षक अनेक विद्वानोंकाभी यही मत है। तथापि इनमेंसे किसीने समस्त गीता- ग्रंथकी परीक्षा करके यह स्पष्टतया दिखलानेका प्रयत्न नहीं किया है, कि कर्मप्रधान दृष्टिसे उसके सब प्रतिपादनों और अध्यायोंका मेल कैसा है। बल्कि डॉयसेनने अपने ग्रंथमें कहा है ‡, कि यह प्रतिपादन कष्टसाध्य है। इसलिये प्रस्तुत ग्रंथका मुख्य उद्देश्य यही है, कि उक्त रीतिसे गीताकी परीक्षा करके उसके विषयोंका मेल अच्छी तरह प्रकटकर दिया जावे परंतु । ऐसा करनेसे पहले, गीताके आरंभमें परस्परविरुद्ध नीतिधर्मोंकी पकड़में फँसे अर्जुनपर जो संकट आया था उसका असली रूपभी दिखलाना चाहिये; नहीं तो गीतामें प्रतिपादित विषयोंका मर्म पाठकोंके ध्यानमें पूर्णतया नहीं जम सकेगा । इसलिये अब यह जाननेके लिये कर्म-अकर्म


  • इस टीकाकारका नाम और उसकी टीकाके कुछ अवतरण बहुत दिन हुए एक महाशयने हमको पत्रद्वारा बतलाये थे । परंतु हमारी परिस्थितिकी गड़बड़में यह पत्र न जाने कहाँ खो गया । † श्रीकृष्णानंदस्वामीकृत चारों निबंध ( श्रीगीतारहस्य, गीतार्थप्रकाश, गीतार्थपरामर्श और गीतासारोद्धार) एकत्र करके राजकोटमें प्रकाशित किये गये हैं। ‡ Prof. Deussen's 'Philosophy of the Upanishads' P. 362. (English Translation, 1906. )

२८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र के झगडे कैसे बिकट होते हैं और अनेक बार " इसे करूँ कि उसे " यह सूझ न पडनेके कारण मनुष्य कैसा घबड़ा उठता है, ऐसेही प्रसंगोंके अनेक उदाहरणोंका विचार किया जायगा, जो हमारे शास्त्रोंमें - विशेषतः महाभारतमें - पाये जाते हैं।

दूसरा प्रकरण कर्मजिज्ञासा किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः

  • गीता ४. १६ भगवद्गीताके आरंभमें, परस्पर-विरुद्ध दो धर्मोंकी उलझनमें फँस जानेके कारण अर्जुन जिस तरह कर्तव्यमूढ हो गया था, और उसपर जो आपत्ति आ पडी थी वह कुछ अपूर्व नहीं है। उन असमर्थ और अपनाही पेट पालनेवाले लोगोंकी बातही भिन्न है, जो संन्यास लेकर और संसारको छोड़कर वनमें चले जाते हैं अथवा जो कमजोरीके कारण जगतके अनेक अन्यायोंको चुपचाप सह लिया करते हैं। परंतु समाजमें रहकरही जिन महान् तथा कार्यकर्ता पुरुषोंको अपने सांसारिक कर्तव्योंका पालन धर्म तथा नीतिपूर्वक करना पडता है, उनपर ऐसी आपत्तियाँ अनेक बार आया करती हैं। युद्धके आरंभहीमें अर्जुनको कर्तव्य-जिज्ञासा और मोह हुआ। ऐसाही मोह युधिष्ठिरको - युद्धमें मरे हुए अपने रिश्तेदारोंका श्राद्ध करते समय - हुआ था। उसके इस मोहको दूर करनेके लिये 'शांतिपर्व' कहा गया है। कर्माकर्मसंशयके ऐसे अनेक प्रसंग ढूँढ़ कर अथवा कल्पित करके उनपर बड़े बड़े कवियोंने सुरस काव्य और उत्तम नाटक लिखे हैं। उदाहरणार्थ, प्रसिद्ध अंग्रेजी नाटककार शेक्सपीयरका हैमलेट नाटक लीजिये। डेन्मार्क देशके प्राचीन राजपुत्र हैमलेटके चाचाने अपने राजकर्ता भाई - हैमलेटके बाप - को मार डाला। हैमलेट- की माताको अपनी पत्नी बना लिया और राजगद्दीभी छीन ली। तब उस राज- कुमारके मनमें यह संघर्ष पैदा हुआ, कि ऐसे पापी चाचाका वध करके पुत्र-धर्मके अनुसार अपने पिताके ऋणसे मुक्त हो जाऊँ; अथवा अपने सगे चाचा, अपनी माताके पति और गद्दीपर बैठे हुए राजापर दया करूँ? इस मोहमें पड जानेके कारण कोमल अंतःकरणके हैमलेटकी कैसी दशा हुई और श्रीकृष्णके समान कोई मार्ग-दर्शक और हितकर्ता न होनेके कारण वह कैसे पागल हो गया और अंतमें 'जियें या मरें' इसी बातकी चिंता करने उसका अंत कैसे हो गया, इत्यादि बातोंका चित्र इस नाटकमें बहुत अच्छी तरहसे दिखाया गया है। 'कोरियोलेनस' नामके दूसरे नाटकमेंभी इसी तरह एक और प्रसंगका वर्णन शेक्सपीयरने किया है।
  • "पंडितोंकोभी इस विषयमें मोह हो जाया करता है, कि कर्म कौन-सा है और अकर्म कौन-सा है।" इस स्थानपर अकर्म शब्दको 'कर्मके अभाव' और 'बुरे कर्म' दोनों अर्थोंमें यथासंभव लेना चाहिये। मूल श्लोकपर हमारी टीका देखो।

३० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र रोम नगरमें कोरियोलेनस नामका एक शूर सरदार था । नगरवासियोंने उसको शहरसे निकाल दिया । तब वह रोमन लोगोंके शत्रुओंमें जा मिला और उसने प्रतिज्ञा की, कि “ मैं तुम्हारा साथ कभी नहीं छोडूंगा । ” कुछ समयके बाद इन शत्रुओंकी सहायतासे उसने रोमन लोगोंपर हमला किया और वह अपनी सेना लेकर रोम शहरके दरवाजेके पास आ पहुँचा । उस समय रोम शहरकी स्त्रियोंने कोरियोलेनसकी पत्नी और माताको सामने करके, मातृभूमिके संबंधके कर्तव्यका उसको उपदेश किया । अंतमें उसको रोमके शत्रुओंको दिये हुए वचनका भंग करना पडा । कर्तव्य- अकर्तव्यके मोहमें फँस जानेके ऐसे औरभी कई उदाहरण दुनियाके प्राचीन और आधुनिक इतिहासमें पाये जाते हैं। परंतु हम लोगोंको इतना दूर जानेकी कोई आवश्यकता नहीं। हमारा महाभारत-ग्रंथ ऐसे उदाहरणोंकी एक बड़ी भारी खानही है। ग्रंथके आरंभ ( आ. २) में भारतका वर्णन करते हुए स्वयं व्यासजीने उसको 'सूक्ष्मार्थन्याययुक्तं', 'अनेकसामयान्वितं' आदि विशेषण दिये हैं। उसमें धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र और मोक्षशास्त्र, सब कुछ आ गया है। इतनाही नहीं, किंतु उसकी महिमा इस प्रकार गाई गयी, कि “ यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित् ” - अर्थात् जो कुछ इसमें है वही और स्थानोंमें है, जो इसमें नहीं है वह और किसीभी स्थानमें नहीं है (आ. ६२. ५३) । सारांश यह है, कि इस संसारमें अनेक कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं; ऐसे समय बड़े बड़े प्राचीन पुरुषोंने कैसा बर्ताव किया, इसका सुलभ आख्यानों- के द्वारा साधारण जनोंको बोध करा देनेहीके लिये 'भारत'का 'महाभारत' हो गया है। नहीं तो सिर्फ भारतीय युद्ध अथवा 'जय'नामक इतिहासका वर्णन करनेके लिये अठारह पर्वोंकी कुछ आवश्यकता नहीं थी । अब यह प्रश्न किया जा सकता है, कि श्रीकृष्ण और अर्जुनकी बातें छोड़ दीजिये; हमारे-तुम्हारे लिये इतने गहरे पानीमें पैठनेकी क्या आवश्यकता है ? क्या मनु आदि स्मृतिकारोंने अपने ग्रंथोंमें इस बातके स्पष्ट नियम नहीं बना दिये हैं, कि मनुष्य संसारमें किस तरह बर्ताव करे ? किसीकी हिंसा मत करो, नीति- पर चलो, सच बोलो, गुरु और बड़ोंका सम्मान करो, चोरी और व्यभिचार मत करो; इत्यादि सब धर्मोंमें पाई जानेवाली साधारण आज्ञाओंका यदि पालन किया जाय, तो ऊपर लिखे कर्तव्य-अकर्तव्यके झगड़ेमें पड़नेकी क्या आवश्यकता है ? परंतु इसके विरुद्ध यहभी प्रश्न किया जा सकता है कि जबतक इस संसारके सब लोग उक्त आज्ञाओंके अनुसार बर्ताव नहीं करते हैं, तबतक सज्जनोंको क्या करना चाहिये ? क्या ये लोग अपने सदाचारके कारण दुष्ट जनोंके फंदेमें अपनेको फँसा लें ? या अपनी रक्षाके लिये 'जैसे को तैसा' इस न्यायसे उन लोगोंका प्रतिकार करें ? इसके सिवा एक बात और है । यद्यपि उक्त साधारण नियमों- को नित्य और प्रमाणभूत मान लें, तथापि कार्यकर्ताओंको अनेक बार ऐसी आपत्तियोंका सामना करना पडता है कि उस समय उक्त साधारण नियमोंसे दो

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या अधिक नियम एकसाथ लागू होते हैं। उस समय "यह करूँ या वह करूँ" इस चिंतामें पड़कर मनुष्य पागल-सा हो जाता है। अर्जुनपर ऐसीही आपत्ति आ पडी थी, परंतु अर्जुनके सिवा और लोगोंपरभी ऐसे कठिन प्रसंग अक्सर आया करते हैं। इस बातका मार्मिक विवेचन महाभारतमें कई स्थानोंमें किया गया है। उदा- हरणार्थ, मनुने सब वर्णोंके लोगोंके लिये नीतिधर्मके पांच नियम बतलाये हैं- "अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः" (मनु. १०. ६३) - अहिंसा, सत्य, अस्तेय, काया, वाचा और मनकी शुद्धता, एवं इंद्रियनिग्रह - इन नीतिधर्मोंमेंसे एक अहिंसाही का विचार कीजिये। "अहिंसा परमो धर्मः" (महा. आ. ११. १३) यह तत्त्व सिर्फ हमारे वैदिक धर्महीमें नहीं, किंतु अन्य सब धर्मोंमेंभी प्रधान माना गया है। बौद्ध और ईसाई धर्मग्रंथोंमें जो आज्ञाएं हैं, उनमें अहिंसाको मनुकी आज्ञाके समान पहला स्थान दिया गया है। सिर्फ किसीकी जान ले लेनाही हिंसा नहीं है तो उसमें किसीके मन अथवा शरीरको दुख देनेकाभी समावेश किया जाता है। अर्थात्, किसी सचेतन प्राणीको किसी प्रकार दुःखित न करनाही अहिंसा है। पितृ- वध, मातृवध और मनुष्यवध - ये हिंसाके भयानक प्रकार हैं, अतः इस संसारमें सब लोगोंकी संमतिके अनुसार यह अहिंसाधर्म सब धर्मोंमें श्रेष्ठ माना गया है। परंतु अब कल्पना कीजिये, कि हमारी जान लेनेके लिये या हमारी पत्नी अथवा कन्यापर बलात्कार करनेके लिये, अथवा हमारे घरमें आग लगानेके लिये, या हमारा धन छीन लेनेके लिये, कोई दुष्ट मनुष्य हाथमें शस्त्र लेकर तैयार हो जाय और उस समय हमारी रक्षा करनेवाला हमारे पास कोई न हो; तो उस समय हमको क्या करना चाहिये ? क्या, "अहिंसा परमो धर्मः" कहकर ऐसे आततायी मनुष्य- पर दया की जाय ? या, यदि वह दुष्ट सीधी तरहसे न माने तो यथाशक्ति उसका शासन किया जाय ? मनुजी कहते हैं :- गुरुं वा बालवृद्धौ वा ब्राह्मणं वा बहुश्रुतम् । आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन् ॥ अर्थात् "ऐसे आततायी या दुष्ट मनुष्यको अवश्य मार डालें; उस समय यह विचार न करें कि वह गुरु है, बुढ़ा है, बालक है या विद्वान् ब्राह्मण है।" शास्त्रकार कहते हैं कि (मनु. ८. ३५०) ऐसे समय हत्या करनेका पाप हत्या करनेवालेको नहीं लगता; किंतु आततायी मनुष्य अपने अधर्महीसे मारा जाता है। आत्मरक्षाका यह हक़

  • कुछ मर्यादाके भीतर - आधुनिक फौजदारी कानूनमेंभी स्वीकृत किया गया है। ऐसे प्रसंगोंपर अहिंसासे आत्मरक्षाकी योग्यता अधिक मानी जाती है। भ्रूण- हत्या सबसे अधिक निंदनीय मानी है; परंतु जब बच्चा पेटमें टेढ़ा होकर अटक जाता है तब क्या उसको काटकर निकाल नहीं डालना चाहिये ? यज्ञमें पशुका वध करना वेदनेभी प्रशस्त माना है (मनु. ५. ३१), परंतु पिष्टपशुके द्वारा वह टलभी सकता है (महा. शां. ३३७; अनु. ११५. ५६)। तथापि हवा, पानी,

३२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र फल इत्यादि सब स्थानोंमें जो सैकड़ों सूक्ष्म जीव-जंतु हैं उनकी हत्या कैसे टाली जा सकती है ? महाभारतमें (शां. १५. २६) अर्जुन कहता है :- सूक्ष्मयोनीनि भूतानि तर्कगम्यानि कानिचित् । पक्ष्मणोऽपि निपातेन येषां स्यात् स्कन्धपर्ययः ॥ “इस जगत्‌में ऐसे असंख्य सूक्ष्म जंतु हैं, कि जिनका अस्तित्व यद्यपि नेत्रोंसे देख नहीं पड़ता, तथापि तर्कसे सिद्ध है। और यदि हम अपनी आँखोंकी पलक हिलावें, तो उतनेहीसे, उन जंतुओंका नाश हो जाता है !” ऐसी अवस्था में यदि हम मुखसे कहते रहें, कि “हिंसा मत करो, हिंसा मत करो,” तो उससे क्या लाभ होगा ? इसी सारासार विचारके अनुसार अनुशासन पर्वमें (अनु. ११६) शिकार करनेका समर्थन किया गया है। वनपर्वमें एक कथा है, कि कोई ब्राह्मण क्रोधसे किसी पति- व्रता स्त्रीको भस्मकर डालना चाहता था; परंतु जब उसका यत्न सफल नहीं हुआ तब वह उस स्त्रीकी शरणमें गया। तब धर्मका सच्चा रहस्य समझ लेनेके लिये उस ब्राह्मणको उस स्त्रीने किसी व्याधके यहाँ भेज दिया। यह व्याध मांस बेचा करता था; परंतु था अपने माता-पिताका बड़ा भक्त ! व्याधका वह व्यवसाय देख- कर ब्राह्मणको अत्यंत विस्मय और खेद हुआ। तब व्याधने उसे अहिंसाका सच्चा तत्त्व समझाकर बतला दिया कि इस जगत्‌में कौन किसको नहीं खाता ? “जीवो जीवस्य जीवनम्” (भाग. १. १३. ४६) - यही नियम सर्वत्र दीख पड़ता है। आपत्कालमें तो “प्राणस्यान्नमिदं सर्वम्” यह नियम सिर्फ़ स्मृतिकारोंहीने नहीं, (मनु. ५. २८; मभा. शां. १५. २१) कहा है तो उपनिषदोंमेंभी स्पष्ट कहा गया है। (वे. सू. ३. ४. २८; छां. ५. २. ८; बृ. ६. १. १४) यदि सब लोग हिंसा छोड़ दें तो क्षात्रधर्म कहाँ और कैसे शेष रहेगा। यदि क्षात्रधर्म नष्ट हो जाय तो प्रजाकी रक्षा कैसे होगी ? सारांश यह है कि नीतिके सामान्य नियमोंहीसे सदा काम नहीं चलता; नीतिशास्त्रके प्रधान नियम - अहिंसा - मेंभी कर्तव्य-अकर्तव्यका सूक्ष्म विचार करनाही पड़ता है। अहिंसाधर्मके अनुसारही क्षमा, दया, शांति आदि गुण शास्त्रोंमें कहे गये हैं; परंतु सब समय शांतिसे कैसे काम चल सकेगा ? सदा शांत रहनेवाले मनुष्योंके बाल-बच्चोंकोभी दुष्ट लोग हरण किये बिना नहीं रहेंगे। इसी कारणका प्रथम उल्लेख करके प्रल्हादने अपने नाती, राजा बलिसे कहा है :- न श्रेयः सततं तेजो न नित्यं श्रेयसी क्षमा । . . . . . . . . . . . . . . . तस्मान्नित्यं क्षमा तात पंडितैरपवादिता ॥ “सदैव क्षमा करना अथवा क्रोध करना श्रेयस्कर नहीं होता ! इसी लिये, हे तात ! पंडितोंने क्षमाके लिये कुछ अपवादभी कहे हैं (मभा. वन. २८. ६, ७) इसके बाद कुछ प्रसंगोंका वर्णन किया गया है, जो क्षमाके लिये उचित है; तथापि प्रल्हाद-

कर्मजिज्ञासा ३३ ने इस बातका उल्लेख नहीं किया, कि इन प्रसंगोंको पहचाननेका तत्त्व या नियम क्या हैं। यदि इन प्रसंगोंको पहचाने बिना, सिर्फ अपवादोंकाही कोई उपयोग करे, तो वह दुराचरण समझा जाएगा; इसलिये यह जानना अत्यंत आवश्यक और महत्त्वका है, कि इन प्रसंगोंको पहचाननेका नियम क्या है। दूसरा तत्त्व 'सत्य' है, जो सब देशों और धर्मोंमें भलीभाँति माना जाता है और प्रमाण समझा जाता है। सत्यकी महानताका वर्णन कहाँतक किया जाय ? वेदमें सत्यकी महिमाके विषयमें कहा है, कि सारी सृष्टिकी उत्पत्तिके पहले 'ऋतं' , और 'सत्यं' उत्पन्न हुए; और सत्यहीसे आकाश, पृथ्वी, वायु आदि पंचमहाभूत स्थिर हैं- "ऋतंच सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत" (ऋ. १०. १९०. १), "सत्ये- नोत्तमिता भूमिः" (ऋ. १०. ८५. १) आदि मंत्र देखो। 'सत्य' शब्दका धात्वर्थभी यही है- "रहनेवाला अर्थात् कभी नष्ट न होनेवाला।" अथवा 'त्रिकाल-अबा- धित'; इसीलिये सत्यके विषयमें कहा गया है, कि "सत्यके सिवा और धर्म नहीं है; सत्यही परब्रह्म है।" महाभारतमें कई जगह इस वचनका उल्लेख किया गया है, कि "नास्ति सत्यात्परो धर्मः" (महा. शां. १६२. २४) और यहभी लिखा है कि :- अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम् । अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते ॥ "हज़ार अश्वमेध और सत्य की तुलना की गयी तो सत्यही श्रेष्ठ सिद्ध हुआ" (आ. ७४. १०२)। यह वर्णन सामान्य सत्यके विषयमें हुआ। सत्यके विषयमें मनुजी एक और विशेष बात कहते हैं (महा. मनु. ४. २५६) :- वाच्यार्था नियताः सर्वे वाङ्मूला वाग्विनिःसृताः । तां तु यः स्तेनयेद्वाचं स सर्वस्तेयकृन्नरः ॥ "मनुष्योंके सब व्यवहार वाणीसे हुआ करते हैं। एकके विचार दूसरेको बतानेके लिये शब्दके समान अन्य साधन नहीं है। वही सब व्यवहारोंका आश्रय-स्थान और वाणीका मूल स्रोत है। जो मनुष्य उसको मलिन कर डालता है, अर्थात् जो वाणीकी प्रतारणा करता है, वह सब पूंजीहीकी चोरी करता है।" इसलिये मनुने कहा है, कि "सत्यपूतां वदेद्वाचं" (मनु. ६. ४६) - जो सत्यसे पवित्र किया गया हो, वही बोला जाय। और धर्मोंकी अपेक्षा सत्यहीको पहला स्थान देनेके लिये उपनिषद्- मेंभी कहा है, "सत्यं वद। धर्मं चर" (तै. १. ११. १)। जब बाणोंकी शय्यापर पड़े पड़े भीष्म पितामह शांति और अनुशासन पर्वोंमें युधिष्ठिरको सब धर्मोंका उपदेश देचुके, तब प्राण छोड़नेके पहले "सत्येषु यतितव्यं वः सत्यं हि परमं बलं" इस वचनको सब धर्मोंका सार कहकर उन्होंने सत्यहीके अनुसार बर्ताव करनेके लिये सब लोगोंको उपदेश किया है (महा. अनु. १६७. ५०)। बौद्ध और ईसाई धर्मोंमेंभी इन्हीं नियमोंका अनुवाद पाया जाता है। गी. र. ३

३४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र क्या उस बातकी कभी कल्पनाकी जा सकती है, कि जो सत्य इस प्रकार स्वयंसिद्ध और चिरस्थायी है, इसके लियेभी कुछ अपवाद होंगे ? परंतु दुष्ट जनोंमे भरे हुए इस जगतका व्यवहार बहुत कठिन है। कल्पना कीजिये, कि कुछ आदमी चोरोंसे पीछा किये जानेपर तुम्हारे सामने किसी स्थानमें जाकर छिप गये। इसके बाद हाथमें तलवार लिये हुए चोर तुम्हारे पास आकर पूछने लगे, कि वे आदमी कहाँ चले गये ? ऐसी अवस्थामें तुम क्या कहोगे ? क्या तुम सच बोलकर सब हाल कह दोगे, या उन निरपराधी जीवोंकी हिंसाको रोकोगे ? क्यों कि निरपराधोंकी हिंसाको रोकना सत्यहीके समान महत्त्वका धर्म है। मनु कहते हैं, “नापृष्टः कस्यचिद् ब्रूयान्न चान्यायेन पृच्छतः” (मनु. २. ११०; मभा. शां. २८७. ३४) - जबतक कोई प्रश्न न करे, तबतक किसीसे बोलना न चाहिये; और यदि कोई अन्यायसे प्रश्न करे तो पूछनेपरभी उत्तर नहीं देना चाहिये। यदि मालूमभी हो, तो सिड़ी या पागलके समान कुछ हूँ-हूँ करके बात बना देनी चाहिये - "जानन्नपि हि मेधावी जडवल्लोक आचरेत्।" अच्छा, पर हूँ-हूँ कर देना और बात बना देना एक तरहसे असत्य भाषण करना नहीं है ? महाभारत (मभा. आ. २१५. ३४) में कई स्थानोंमें कहा है, “न व्याजेन चरेद्धर्मम्” - धर्मसे प्रतारणा करके मनका समाधान नहीं कर लेना चाहिये; क्योंकि तुम धर्मको धोखा नहीं दे सकते। तुम खुद धोखा खा जाओगे । अच्छा, यदि हूँ-हूँ करके कुछ बात बना लेनेकाभी समय न हो, तो क्या करना चाहिये ? मान लीजिये, कोई चोर हाथमें तलवार लेकर छातीपर आ बैठा है; और पूछ रहा है, कि तुम्हारा धन कहाँ है ? यदि कुछ उत्तर न दोगे, तो जानहीसे हाथ धोना पड़ेगा। ऐसे समयपर क्या बोलना चाहिये ? सब धर्मोंका रहस्य जाननेवाले भगवान् श्रीकृष्ण - ऐसेही चोरोंकी कहानीका दृष्टान्त देकर - कर्णपर्व (मभा. क. ६९. ६१) में अर्जुनसे और आगे शांतिपर्वके सत्यानृतं अध्याय (मभा. शां. १०९. १५. १६) में भीष्म पितामह युधिष्ठिरसे कहते हैं :- अकूजनेन चेन्मोक्षो नावक्कूजेत्कथंचन । अवश्यं कूजितव्ये वा शंकेरन् वाप्यकूजनात् । श्रेयस्तत्रानृतं वक्तुं सत्यादिति विचारितम् ॥ अर्थात् 'यह बात विचारपूर्वक निश्चित की गई है, कि यदि बिना बोले मोक्ष या छुटकारा हो सके, तोभी हो, बोलना नहीं चाहिये; और यदि बोलना आवश्यक हो, अथवा न बोलनेसे (दूसरो को) कुछ संदेह होना संभव हो, तो उस समय सत्यके बदले असत्य बोलनाही अधिक प्रशस्त है।' इसका कारण यह है, कि सत्य धर्म केवल शब्दोच्चारहीके लिये नहीं है। अतएव जिस आचरणसे सब लोगोंका कल्याण हो, वह आचरण सिर्फ इसी कारणसे निंद्य नहीं माना जा सकता, कि शब्दोच्चार अयथार्थ है। जिससे सभीकी हानि हो, वह न तो सत्यही है; और न अहिंसाही।

कर्मजिज्ञासा ३५ शांतिपर्व (मभा. शां. ३२९. १३; २८७. १९) में सनत्कुमारके आधारपर नारदजी शुकजीसे कहते हैं :- सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यादपि हितं वदेत् । यद्भूतहितमत्यन्तं एतत्सत्यं मतं मम ।। " सच बोलना अच्छा है; परंतु सत्यसेभी अधिक ऐसा बोलना अच्छा है; जिसमे सब प्राणियोंका हित हो। क्योकि जिससे सब प्राणियोंका अत्यंत हित होता है, वही हमारे मतमें सत्य है। " 'यद्भूतहितं' पदको देखकर आधुनिक उपयोगितावादी अंग्रेजों का स्मरण करके यदि कोई उक्त वचनको प्रक्षिप्त कहना चाहें, तो उन्हें स्मरण रखना चाहिये, कि वह वचन महाभारतके वनपर्वमे - ब्राह्मण और व्याधके संवादमें - दो-तीन बार आया है। उनमेंसे एक जगह तो " अहिंसा सत्यवचनं सर्वभूतहितं परम् " पाठ है ( मभा. वन. २०६. ७३ ) ; और दूसरी जगह " यद्भूतहितमत्यन्तं तत्सत्यमिति धारणा " ( वन. २०८. ४ ) , ऐसा पाठभेद किया गया है। सत्यप्रतिज्ञ युधिष्ठिरने द्रोणाचार्यसे " नरो वा कुंजरो वा " कहकर उन्हें संदेहमें क्यों डाल दिया ? इसका कारण वही है, जो ऊपर दिया गया है; और कुछ नहीं । ऐसेही और बातोंमेंभी यही नियम लगाया जाता है। हमारे शास्त्रोंका यह कथन नही है, कि झूठ बोलकर किसी खूनीकी जान बचाई जाये । शास्त्रोंमें खून करनेवाले आदमीके लिये देहांत प्रायश्चित्त अथवा वधदंडकी सजा कही गयी है। इसलिये वह सजा पाने योग्य अथवा वध्य है। सभी शास्त्रकारोंने कहा है कि इसीके समान और किसी समय जो आदमी झूठो गवाही देता है वह अपने सात या अधिक पूर्वजोंसहित नरकमें जाता है। (मनु. ८. ८९-९९; मभा. आ. ७. ३)। परंतु जब कर्णपर्वमें वर्णित उक्त चोरोंके दृष्टान्तके समान हमारे सच बोलनेसे निरपराधी आदमियोंकी जान जानेकी शंका हो, तो उस समय क्या करना चाहिये ? ग्रीन नामक एक अंग्रेज ग्रंथकारने अपने ' नीतिशास्त्र का उपोद्घात' नामक ग्रंथमें लिखा है, कि ऐसे अवसरोंपर नीतिशास्त्र मूक हो जाते हैं। यद्यपि मनु और याज्ञवल्क्य ऐसे प्रसंगोंकी गणना सत्यापवादोंमें करते हैं, तथापि यह भी उनके मतसे गौण बात है। इसलिये अंतमें उन्होने इस अपवादके लिये भी प्रायश्चित्त बतलाया है - "तत्पावनाय निर्वाप्यश्चरुः सारस्वतो द्विजैः" (याज्ञ. २. ८३; मनु. ८. १०४-१०६) । कुछ बड़े अंग्रेजोंने - जिन्हें अहिंसाके अपवादके विषयमें आश्चर्य नहीं मालूम होता - हमारे शास्त्रकारोंको सत्यके विषयमें दोष देनेका यत्न किया है। इसलिये यहाँ इस बातका उल्लेख किया जाता है, कि सत्यके विषयमें प्रामाणिक ईसाई धर्मोप- देशक और नीतिशास्त्रके अंग्रेज ग्रंथकार क्या कहते हैं। क्राइस्टका शिष्य पॉल नये बाइबलमें कहता है, 'यदि मेरे असत्य भाषणसे प्रभुके सत्यकी महिमा और बढ़ती है ( अर्थात् ईसाई धर्मका अधिक प्रचार होता है ), तो इससेमैं पापी कैसे हो सकता हूँ' ? ( रोम. ३. ७ ) ईसाई धर्मके इतिहासकार मिलमैलने लिखा है, कि

३६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र प्राचीन ईसाई धर्मोपदेशक कई बार इसी तरह आचरण किया करते थे। यह बात सच है, कि वर्तमान समयके पाश्चिमात्य नीतिशास्त्रज्ञ किसीको धोखा देकर या भुलाकर धर्मभ्रष्ट करना न्याय्य नहीं मानेंगे; परंतु वेभी यह कहनेको तैयार नहीं हैं, कि सत्यधर्म अपवादरहित है। उदाहरणार्थ, यह देखिये, कि सिजविक नामके जिस पंडितका नीतिशास्त्र हमारे कॉलेजोंमें पढ़ाया जाता है, उसकी क्या राय है। कर्म और अकर्मके संदेहका निर्णय जिस तत्त्वके आधारपर यह ग्रंथकार किया करता है, उसको "सबसे अधिक लोगोंका सबसे अधिक सुख" (बहुत लोगोंका बहुत सुख) कहते हैं। इसी नियमके अनुसार उसने यह निर्णय किया है, कि छोटे लड़कोंको, पागलोंको, और इसी प्रकार बीमार आदमियोंको (यदि सच बात सुना देनेसे उसके स्वास्थ्यके बिगड़ जानेका भय हो), अपने शत्रुओंको, चोरोंको और (यदि बिना बोले काम चल न सकता हो तो) जो अन्यायसे प्रश्न करें, उसको उत्तर देनेके समय, अथवा वकीलोंको अपने व्यवसायमें झूठ बोलना अनुचित नहीं है।* मिलके नीतिशास्त्रके ग्रंथमेंभी इसी अपवादका समावेश किया गया है।† इन अपवादोंके अतिरिक्त सिजविक अपने ग्रंथमें यहभी लिखता है, कि 'यद्यपि कहा गया है, कि सब लोगोंको सच बोलना चाहिये, तथापि हम यह नहीं कह सकते, कि जिन राज-नीतिज्ञोंको अपनी कारवाई गुप्त रखनी पड़ती है, वे औरोंके साथ, तथा व्यापारी अपने ग्राहकोंसे हमेशा सचही बोला करें।'‡ किसी अन्य स्थानमें वह लिखता है, कि यही छूट पादरियों और सिपाहियोंको मिलती है। लेस्ली स्टीफन नामका एक और अंग्रेज ग्रंथकार है। उसने नीतिशास्त्रका विवेचन आधिभौतिक दृष्टिसे किया है। वहभी अपने ग्रंथमें ऐसेही उदाहरण देकर अंतमें लिखता है, 'किसी कार्यके परिणामकी ओर ध्यान देनेके बादही उसकी नीतिमत्ता निश्चित की जानी चाहिये। यदि मुझे यह विश्वास हो, कि झूठ बोलनेहीसे कल्याण होगा, तो मैं सत्य बोलनेके लिये कभी तैयार नहीं रहूँगा। मेरे इस विश्वासमें यह भाव हो सकता है, कि इस समय झूठ बोलनाही मेरा कर्तव्य है।'§ ग्रीन साहबने नीति- शास्त्र का विचार अध्यात्मदृष्टिसे किया है। आप उक्त प्रसंगोंका उल्लेख करके स्पष्ट

  • Sidgwick's Methods of Ethics, Book III Chap. XI § 6. p. 355 (7th Ed.) Also, see pp. 315-317 (same Ed.). † Mill's Utilitarianism, Chap. II pp. 33-34 (15th Ed. Longmans, 1907). ‡ Sidgwick's Methods of Ethics, Book IV. Chap. III, § p. 454 (7th Ed.); and Book II Chap. V. § 3. p. 169. § Leslie Stephen's Science of Ethics (Chap. IV § 29. p. 369 (2nd Ed.) "And the certainty might be of such a kind as to make me think it a duty to lie."

रीतिसे कहते हैं, कि ऐसे समय नीतिशास्त्र मनुष्यके संदेहकी निवृत्ति कर नहीं सकता । अंतमें आपने यह सिद्धान्त लिखा है, " नीतिशास्त्र यह नहीं कहता, कि किसी साधारण नियमके अनुसार - सिर्फ यह समझकर कि वह है - हमेशा चलनेमें कुछ विशेष महत्त्व है; किंतु उसका कथन सिर्फ यही है, कि 'सामान्यतः' उस नियमके अनुसार चलना हमारे लिये श्रेयस्कर है । इसका कारण यह है, कि ऐसे समय हम लोग केवल नीतिके लिये अपनी लोभमूलक नीच मनोवृत्तियोंको त्यागनेकी शिक्षा पाया करते हैं ।"* नीतिशास्त्रपर ग्रंथ लिखनेवाले बेन, वेवेल आदि अन्य अंग्रेज पंडितोंकाभी ऐसाही मत है। ‡ यदि उक्त अंग्रेज ग्रंथकारोंके मतोंकी तुलना हमारे धर्मशास्त्रकारोंके बनाये हुए नियमोंके साथ की जाय, तो यह बात सहजही ध्यानमें आ जाएगी, कि सत्यके विषयमें अधिक अभिमानी कौन है। इसमें संदेह नहीं, कि हमारे शास्त्रोंमें कहा है :- न नर्मयुक्तं वचनं हिनस्ति न स्त्रीषु राजन्न विवाहकाले । प्राणात्यये सर्वधनापहारे पंचानृतान्याहुरपातकानि ॥ अर्थात् " हँसीमें, स्त्रियोंके साथ, विवाहके समय, जब जानपर आ बने तब, और संपत्तिकी रक्षाके लिये झूठ बोलना पाप नहीं है" ( मभा. आ. ८२. १६ और महा. शां. १०९ तथा मनु. ८. ११०) । परंतु इसका मतलब यह नहीं है, कि स्त्रियोंके साथ हमेशा झूठही बोलना चाहिये । जिस भावसे सिजविक साहबने ' छोटे बच्चे, पागल और बीमार 'के विषयमें अपवाद किया है, वही भाव महाभारतके उक्त कथनकाभी है। अंग्रेज ग्रंथकार पारलौकिक तथा आध्यात्मिक दृष्टिकी ओर कुछ ध्यान नहीं देते । उन लोगोंने तो खुल्लमखुल्ला यहां तक प्रतिपादन किया है कि व्यापारियोंका अपने लाभके लिये झूठ बोलना अनुचित नहीं है । किंतु वह बात हमारे शास्त्रकारोंको संमत नहीं है । इन लोगोंने कुछ ऐसेही प्रसंगोंपर असत्य बोलनेकी अनुमति दी है, जबकि केवल सत्य शब्दोच्चारण (अर्थात् केवल वाचिक सत्य) और सर्वभूतहित ( अर्थात् वास्तविक सत्य ) में विरोध हो जाता है, और व्यवहारकी दृष्टिसे झूठ बोलना अपरिहार्य हो जाता है । इनकी राय है, कि सत्य आदि नीतिधर्म नित्य – अर्थात् सब समय एक समान अबाधित - हैं। अतएव यह अपरिहार्य झूठ बोलनाभी थोड़ा-सा पापही हैं; और उसके लिये प्रायश्चित्तभी कहा गया है । संभव है, कि आजकलके आधिभौतिक पंडित इन प्रायश्चित्तोंको निरर्थक होवा कहेंगे; परंतु जिन्होंने ये प्रायश्चित्त कहे हैं और जिन लोगोंके


  • Greens's Prolegomena to Ethics, § 315. p. 379, ( 5th Cheaper edition ). ‡ Bain's Mental and Moral Science, p. 445 ( Ed. 1875); and Whewell's Elements of Morality. Book II. Chaps. XIII and XIV. ( 4th Ed., 1864 ).

३८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र लिये ये कहे गये हैं, वे दोनों ऐसा नहीं समझते । वे तो सब उक्त सत्य अपवादको गौण ही मानते हैं। और इस विषयकी कथाओंमेंभी यही अर्थ प्रतिपादित किया गया है। देखिये, युधिष्ठिरने अडचनके समय एकही बार दबी हुई आवाजसे 'नरो वा कुंजरो वा' कहा था। इसका फल यह हुआ, कि उसका रथ, जो पहले जमीनसे चार अंगुल ऊपर अंतरिक्षमें चला करता था, अब और मामूली लोगोंके रथोंके समान धरतीपर चलने लगा । और अंतमें एक क्षणभरके लिये उसे नरकलोकमें रहना पड़ा (मभा. द्रोण. १९१. ५७. ५८ तथा स्वर्ग. ३. १५)। दूसरा उदाहरण अर्जुनका लीजिये । अश्वमेधपर्व (मभा. अश्व. ८१. १०) में लिखा है कि यद्यपि अर्जुनने भीष्मका वध शास्त्रधर्मके अनुसार कियाथा; तथापि उसने शिखंडीके पीछे छिपकर यह काम किया था, इसलिये उसको अपने पुत्र बभ्रुवाहनमे पराजित होना पड़ा । इन सब बातोंसे यही प्रकट होता है, कि विशेष प्रसंगोंके लिये कहे गये उक्त अपवाद मुख्य या प्रमाण नहीं माने जा सकते । हमारे शास्त्रकारोंका अंतिम तात्त्विक सिद्धान्त वही है, जो महादेवने पार्वतीसे कहा है - आत्महेतोः परार्थे वा नर्महास्याश्रयात्तथा । ये मृषा न वदन्तीह ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ "जो लोग, इस जगतमें स्वार्थके लिये, परार्थके लिये, या मजाकमेंभी कभी झूठ नहीं बोलते, उन्हीको स्वर्गकी प्राप्ति होती है” (मभा. अनु. १४४. १९) । अपनी प्रतिज्ञा या वचनको पूरा करना सत्यहींमें शामिल है। भगवान् श्रीकृष्ण और भीष्म पितामह कहते हैं, “चाहे हिमालय पर्वत अपने स्थानसे हट जाय, अथवा अग्नि शीतल हो जाय, परंतु हमारा वचन टल नहीं सकता” (मभा. आ. १०३ तथा उ. ८१. ४८) भर्तृहरिनेभी सत्पुरुषोंका वर्णन इस प्रकार किया है : - तेजस्विनः सुखमसूनपि सन्त्यजन्ति । सत्यव्रतव्यसनिनो न पुनः प्रतिज्ञाम् ॥ "तेजस्वी पुरुष आनंदसे अपनी जानभी दे देंगे; परंतु वे अपनी प्रतिज्ञाका त्याग कभी नहीं करेंगे” (नीतिश. ११०) इसी तरह श्रीरामचंद्रजीके एकपत्नी-व्रतके साथ उनका एक-बाण और एक-वचनका व्रतभी प्रसिद्ध है; जैसा इस सुभाषितमें कहा है - “द्विशरं नाभिसंधत्ते रामो द्वर्नाभिभाषते ।” हरिश्चंद्रने तो अपने स्वप्नमें दिये हुए वचनको सत्य करनेके लिये डोमकी नीच सेवाभी की थी। इसके उलटे, वेदमें यह वर्णन है, कि इंद्रादि देवताओने वृत्रासुरके साथ जो प्रतिज्ञाएँ की थीं उन्हें मेट दिया और उसको मार डाला । ऐसीही कथापुराणोंमें हिरण्यकशिपु की है। व्यवहारमेंभी कुछ कौल-करार ऐसे होते हैं, कि जो न्यायालयमें वे-कायदा समझे जाते हैं; या जिनके अनुसार चलना अनुचित माना जाता है। अर्जुनके विषयमें ऐसीही कथा महाभारत (मभा. कर्ण. ६९) में है। अर्जुनने प्रतिज्ञा की थी, कि जो कोई मुझसे कहेगा, कि "तू अपना गांडीव धनुष्य किसी दूसरेको दे दे, उसका सिं

[Page Header] कर्मजिज्ञासा ३९

[Main Text] मैं तुरंतही काट डालूंगा । " इसके बाद युद्धमें जब युधिष्ठिर कर्णसे पराजित हुआ तब उसने निराश होकर अर्जुनसे कहा, " तेरा गांडीव हमारे किस कामका है ? तू इसे छोड़ दे ! " यह सुनकर अर्जुन हाथमें तलवार ले युधिष्ठिरको मारने दौड़ा । उस समय भगवान् श्रीकृष्ण वहीं थे । उन्होंने तत्त्वज्ञानकी दृष्टिसे सत्य धर्मका मार्मिक विवेचन करके अर्जुनको यह उपदेश किया, कि " तू मूढ़ है। तुझे अबतक सूक्ष्म-धर्म मालूम नहीं हुआ है। तुझे वृद्धजनोंसे इस विषयकी शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये; ' न वृद्धाः सेवितास्त्वया ' - तूने वृद्धजनोंकी सेवा नहीं की है। यदि तू प्रतिज्ञाकी रक्षा करनाही चाहता है, तो तू युधिष्ठिरकी निर्भर्त्सना कर, क्योंकि सभ्यजनोंको निर्भर्त्सना मृत्युहीके समान है।" इस प्रकार बोध करके उन्होंने अर्जुनको ज्येष्ठ भ्रातृवधके पापसे बचाया । इस समय भगवान् श्रीकृष्णने जो सत्या- नृत-विवेक अर्जुनको बताया है, उसीको आगे चलकर शांतिपर्वके सत्यानृत नामक अध्यायमें भीष्मने युधिष्ठिरसे कहा है (शां. १०९) । यह उपदेश व्यवहारमें लोगोंको ध्यानमें रखना चाहिये । इसमें संदेह नहीं, कि इन सूक्ष्म प्रसंगोंको जानना बहुत कठिन काम है। देखिये, इस स्थानमें सत्यकी अपेक्षा भ्रातृधर्मही श्रेष्ठ माना गया है; और गीताका प्रसंग इसके उलटे है, जहाँ बंधुप्रेमकी अपेक्षा क्षात्रधर्म प्रबल माना है। जब अहिंसा और सत्यके विषयमें इतना वाद-विवाद है, तब आश्चर्यकी बात नहीं, कि यही हाल नीतिधर्मके तीसरे तत्त्व अर्थात् अस्तेयकाभी हो । यह बात निर्विवाद सिद्ध है, कि न्यायपूर्वक प्राप्त किसीकी संपत्तिको चुरा ले जाने या लूट लेनेकी स्वतंत्रता यदि दूसरोंको मिल जाय, तो द्रव्यका संचय करना बंदहो जाएगा; समाजकी रचना बिगड़ जाएगी, चारों तरफ अनवस्था हो जाएगी और सभीकी हानि होगी । परंतु इस नियमकेभी अपवाद हैं। जब दुर्भिक्षके समय मोल देने, मजदूरी करने या भिक्षा मांगनेसेभी अनाज नहीं मिलता, तब ऐसी आपत्तिमें यदि कोई मनुष्य चोरी करके आत्मरक्षा करे, तो क्या वह पापी समझा जाएगा ? महाभारत (शां. १४१) में यह कथा है कि किसी समय बारह वर्षतक दुर्भिक्ष रहा और विश्वा- मित्रपर ऐसीही बड़ी आपत्ति आयी । तब उन्होंने किसी श्वपच (चांडाल) के घरसे कुत्तेका मांस चुराया और वे इस अभक्ष्य भोजनसे अपनी रक्षा करनेके लिये प्रवृत्त हुए । उस समय श्वपचने विश्वामित्रको पंचनखा भक्ष्याः' (मनु. ५. १८)* इत्यादि शास्त्रार्थ बतलाकर अभक्ष्य-भक्षण और वहभी चोरी न करनेके विषयमें बहुत उपदेश किया । परंतु विश्वामित्रने उसको डांटकर यह उत्तर दिया -

[Footnote]

  • मनु और याज्ञवल्क्यने कहा है कि कुत्ता, बंदर आदि जिन जानवरोंके पाँच पाँच नख होते हैं उन्हींमेंसे खरगोश, कछुआ, गोह आदि पाँच प्रकारके जानवरोंका मांस भक्ष्य है (मनु. ५. १८; याज्ञ. १. १७७)। इन पाँच जानवरोंके अतिरिक्त मनुजीने 'खड्ग' अर्थात् गेंडेकोभी भक्ष्य माना है। परंतु टीकाकारका कथन है,

४० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र पिबन्त्येवोदकं गावो मंडूकेषु रुवत्स्वपि । न तेऽधिकारो धर्मेऽस्ति मा भूरात्मप्रशंसकः ॥ “ अरे ! यद्यपि मेंढ़क टर्र टर्र किया करते हैं, तोभी गौएँ पानी पीना बंद नहीं करतीं; चुप रह ! मुझे धर्मज्ञान बतानेका तेरा अधिकार नहीं है । व्यर्थ अपनी प्रशंसा मत कर ।” उस समय विश्वामित्रने यह भी कहा है, कि “जीवितं मरणाच्छ्रेयो जीवन्धर्ममवाप्नुयात् ” – अर्थात् यदि जिंदा रहेंगे तो धर्मका आचरण कर सकेंगे । इसलिये धर्मकी दृष्टिसेभी मरनेकी अपेक्षा जीवित रहना अधिक श्रेयस्कर है । मनुजीने अजीगर्त, वामदेव आदि अन्यान्य ऋषियोंके उदाहरण दिये हैं, जिन्होंने ऐसे संकट समय इसी प्रकार आचरण किया है ( मनु. १०. १०५-१०८) । हाब्स नामक अंग्रेज ग्रंथकार लिखता है, “ किसी कठिन अकालके समय जब अनाज मोल न मिले, या दानभी न मिले, तब यदि पेट भरनेके लिये कोई चोरी या साहस कर्म करे, तो उसका यह अपराध माफ समझा जाता है ।”* और मिलने तो यहाँ तक लिखा है, कि ऐसे समय चोरी करके अपने प्राण बचाने यही मनुष्यका कर्तव्य है । “ मरनेसे जिंदा रहना श्रेयस्कर है ” - क्या विश्वामित्रका यह तत्त्व सर्वथा अपवादरहित कहा जा सकता है ? । इस जगत्में सिर्फ़ जिंदा रहनाही पुरुषार्थ नहीं है। कौएभी काकबलि खाकर कई वर्षोंतक जीते रहते हैं । इसलिये वीरपत्नी विदुला अपने पुत्रसे कहती है, कि बिछौनेपर पड़े पड़े सड़ जाने या घरमें सौ वर्षकी आयुको व्यर्थ व्यतीतकर देनेकी अपेक्षा, यदि तू एक क्षणभी अपने पराक्रमकी ज्योति प्रकट करके मर जाएगा तो अच्छा होगा – “मुहूर्तं ज्वलितं श्रेयो न धूमायितं चिरम् ” ( मभा. उ. १३२. १५) । यदि यह बात सच है, कि आज नहीं तो कल, अंतमें सौ वर्षके बाद तो मरना जरूरी है ( मभा. १०. १, ३८; गीता २. २७ ), तो फिर उसके लिये रोने या डरनेसे क्या लाभ है ? अध्यात्मशास्त्रकी दृष्टिसे तो आत्मा नित्य और कि इस विषयमें विकल्प है। इस विकल्पको छोड़ देनेपर शेष पाँचही जानवर रहते हैं; और उन्हींका मांस भक्ष्य समझा गया है । “ पंच पंचनखा भक्ष्याः ” का यही अर्थ है । तथापि मीमांसकोंके मतानुसार इस व्यवस्थाका भावार्थ यही है, कि जिन लोगोंको मांस खानेकी संमति दी गई है, वे उक्त पंचनखी पाँच जानवरोंके सिवा और किसी पंचनखी जानवरका मांस न खाये । इसका भावार्थ यह नहीं है, कि इन जानवरोंका मांस खानाही चाहिये । इस पारिभाषिक अर्थको वे लोग ‘परिसंख्या’ कहते हैं। “ पंच पंचनखा भक्ष्याः ” इसी परिसंख्याका मुख्य उदाहरण है । जबकि मांस खानाही निषिद्ध माना गया है तब इन पाँच जानवरोंका मांस खानाभी निषिद्धही समझा जाना चाहिये ।

  • Hobbes, Leviathan. Part II. Chap. XXVII. p. 139 (Morley's Universal Library Edition ). Mill's Utilitarianism. Chap. V. p. 95. ( 15th Ed. ) Thus, to save a life, it may not only be allowable but a duty to steal etc.”

कर्मजिज्ञासा ४१

अमर है। इस लिये मृत्युका विचार करते समय प्रारब्ध कर्मानुसार प्राप्त सिर्फ़ इस शरीरकाही विचार बाकी रह जाता है। अच्छा यह तो सब जानते हैं, कि यह शरीर नाशवान् है; परंतु आत्माके कल्याणके लिये, इस जगतमें जो कुछ करना है, उसका एकमात्र साधन यही नाशवान् मनुष्यदेह है। इसीलिये मनुने कहा है, "आत्मानं सततं रक्षेत् दारैरपि धनैरपि" - अर्थात् स्त्री और संपत्तिकी अपेक्षा हमको पहले स्वयं अपनीही रक्षा करनी चाहिये ( मनु. ७. २१३ )। यद्यपि मनुष्य-देह दुर्लभ और नाश- वानभी है, तथापि जब उसका नाश करके उससेभी अधिक किसी शाश्वत वस्तुकी प्राप्ति कर लेनी होती है, (जैसे देश, धर्म और सत्यके लिये, अपनी प्रतिज्ञा, व्रत और बिरदकी रक्षाके लिये; एवं इज्जत, कीर्ति और सर्वभूतहितके लिये) तब ऐसे समयपर अनेक महात्माओंने इस तीव्र कर्तव्याग्निमें अपने प्राणोंकीभी आनंदसे आहुति दे दी है। रघुवंशमें कहा है कि जब राजा दिलीप अपने गुरु वसिष्ठकी गायकी सिंहसे रक्षा करनेके लिये उसको अपने शरीरका बलिदान देनेको तैयार हो गया, तब वह सिंहसे बोला, कि हमारे समान पुरुषोंकी "इस पंचभौतिक शरीरके विषयमें अनास्था रहती है। अतएव तू मेरे इस जड़ शरीरके बदले मेरे यशःस्वरूपी शरीरकी ओर ध्यान दे।" ( रघु. २. ५७ )। कथासरित्सागर और नागानंद नाटकमें यह वर्णन है, कि सर्पोंकी रक्षा करनेके लिये जीमूतवाहनने गरुडको स्वयं अपना शरीर अर्पण कर दिया। मृच्छकटिक नाटक (१०. २७) में चारुदत्त कहता है :- न भीतो मरणादस्मि केवलं दूषितं यशः । विशुद्धस्य हि मे मृत्युः पुत्रजन्मसमः किल ॥ "मैं मृत्युसे नहीं डरता; मुझे यही दुःख है, कि मेरी कीर्ति कलंकित हो गई। यदि कीर्ति शुद्ध रहे, और मृत्यु आ जाय, तो मैं उसको पुत्रके जन्मके उत्सवके समान मानूँगा।" इसी तत्त्वके आधारपर महाभारतके वनपर्व और शांतिपर्व (मभा. वन. १०० तथा १३१; शां. ३४२) में राजा शिबि और दधीचि ऋषिकी कथाओंका वर्णन किया है। जब धर्म-( यम) राज श्येन पक्षीका रूप धारण करके कपोतके पीछे उड़े और जब वह कपोत अपनी रक्षाके लिये राजा शिबिकी शरणमें गया, तब राजाने स्वयं अपने शरीरका मांस काटकर उस श्येन पक्षीको दिया; और शरणागत कपोतकी रक्षा की। वृत्रासुर नामका देवताओंका एक शत्रु था। उसको मारनेके लिये दधीचि ऋषिकी हड्डियोंके वज्रकी आवश्यकता हुई। तब सब देवता मिलकर उक्त ऋषिके पास गये और बोले, "शरीरत्यागं लोकहितार्थं भवान् कर्तुमर्हति" - हे महाराज ! सब लोगोंके कल्याणके लिये आप देहत्याग कीजिये। यह बिनती सुनकर दधीचि ऋषिने बड़े आनंदसे अपना शरीर त्याग दिया और अपनी हड्डियाँ देवताओंको दे दीं। एक समयकी बात है, कि इंद्र ब्राह्मणका रूप धारण करके, दानशूर कर्णके पास कवच और कुंडल मांगने आया। कर्ण इन कवच-कुंडलोंको पहने हुएही

जन्मा था। जब सूर्यने जाना, कि इंद्र कवच-कुंडल मांगने जा रहा है, तब उसने पहलेहीसे कर्णको सूचना दे दी थी, कि तुम अपने कवच-कुंडल किसीको दान मत दो। यह सूचना देते समय सूर्यने कर्णसे कहा, “इसमें संदेह नहीं, कि तू बड़ा दानी है; परंतु यदि तू अपने कवच-कुंडल दानमें देगा, तो तेरे जीवनहीकी हानि हो जाएगी। इसलिये तू इन्हें किसीको न दो। क्योंकि मर जानेपर कीर्तिका क्या उपयोग?” “मृतस्य कीर्त्या किं कार्यम्।” यह सुनकर कर्णने स्पष्ट उत्तर दिया, कि “जीवितेनापि मे रक्ष्या कीर्तिस्तद्विद्धि मे व्रतम्”-अर्थात् जान भलेही चली जाय तोभी कुछ परवाह नहीं; परंतु अपनी कीर्तिकी रक्षा करनाही मेरा व्रत है (मभा. वन. २९९. ३८) सारांश यह है, कि “यदि मर जाएगा, तो स्वर्गकी प्राप्ति होगी; और जीत जाएगा तो पृथ्वीका राज्य मिलेगा” इत्यादि क्षात्रधर्म (गीता २. ३७) और ‘स्वधर्मे निधनं श्रेय:’ (गीता ३. ३५) यह सिद्धान्त उक्त तत्त्वपरही अवलंबित है। इसी तत्त्वके अनुसार श्रीसमर्थ रामदास स्वामी कहते हैं, ‘कीर्तिकी ओर देखनेसे सुख नहीं है; और सुखकी ओर देखने से कीर्ति नहीं मिलती (दासबोध १२. १०. १९; १९. १०. २५); और वे उपदेशभी करते हैं, कि “हे सज्जन मन ! ऐसा काम कर, जिससे मरनेपर कीर्ति बची रहे।” यहाँ प्रश्न हो सकता है, कि यद्यपि परोपकारसे कीर्ति प्राप्त होती है, तथापि मृत्युके बाद कीर्तिका क्या उपयोग है ? अथवा किसी सभ्य मनुष्यको अपकीर्ति की अपेक्षा मर जाना (गीता.२. ३४), या जिंदा रहनेसे परोपकार करना अधिक प्रिय क्यों मालूम होता है ? इस प्रश्नका उचित उत्तर देनेके लिये आत्म-अनात्म विचारमें प्रवेश करना होगा। और इसीके साथ कर्म-अकर्मशास्त्रकाभी विचार करके यह जान लेना होगा, कि किस समयपर जान देनेके लिये तैयार होना उचित या अनुचित है। यदि इस बातका विचार नहीं किया जाएगा, तो जान देनेसे यशकी प्राप्ति तो दूरही रही, मूर्खतासे आत्महत्या करनेका पाप माथे चढ़ जाएगा। माता, पिता, गुरु आदि वंदनीय और पूजनीय पुरुषोंकी पूजा तथा शुश्रूषा करनाभी सर्वमान्य धर्मोंमेंसे एक प्रधान धर्म समझा जाता है। यदि ऐसा न हो तो कुटुंब, गुरुकुल और सारे समाजकी व्यवस्था ठीक ठीक कभी रह न सकेगी। यही कारण है, कि सिर्फ स्मृति-ग्रंथोंहीमें नहीं, किंतु उपनिषदोंमेंभी, “सत्यं वद, धर्मं चर” कहा गया है। और जब शिष्यका अध्ययन पूरा हो जाता, और वह अपने घर जाने लगता, तब प्रत्येक गुरुका उसे यही उपदेश होता था, कि “मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव।” (तै. १. ११. १ और ६) महाभारतके ब्राह्मण-व्याध आख्यानका तात्पर्यभी यही है (वन. अ. २१३)। परंतु इसमेंभी कभी कभी अकल्पित बाधाएँ खड़ीं हो जातीं हैं। देखिये, मनुजी कहते हैं (२. १४५) उपाध्यायान् दशाचार्यः आचार्याणां शतं पिता । सहस्रं तु पितॄन्माता गौरवेणातिरिच्यते ॥

कर्मजिज्ञासा ४३

“दस उपाध्यायोंसे आचार्य और सौ आचार्योंसे पिता, एवं हज़ार पिताओंसे माताका गौरव अधिक है।” इतना होनेपरभी यह कथा प्रसिद्ध है, ( मभा वन. ११६. १४ ) कि परशुरामकी माताने कुछ अपराध किया था, इसलिये उसने अपने पिताकी आज्ञासे अपनी माताको मार डाला । शांतिपर्व (मभा. शां. २६५) के चिरकारिकोप- आख्यानमें अनेक साधक-बाधक प्रमाणोंसहित इस बातका एक स्वतंत्र अध्याय में विस्तृत विवेचन किया गया है, कि पिताकी आज्ञासे माताका वध करना श्रेयस्कर है या पिताकी आज्ञाका भंग करना श्रेयस्कर है। इससे स्पष्ट जाना जाता है, कि महा- भारतके समय ऐसे सूक्ष्म प्रसंगोंकी नीतिशास्त्रकी दृष्टिसे चर्चा करनेकी पद्धति जारी थी। यह बात छोटेसे लेकर बड़ोंतक सब लोगोंको मालूम है, कि पिताकी प्रतिज्ञाको सत्य करनेके लिये उनकी आज्ञासे रामचंद्रने चौदह वर्ष वनवास किया। परंतु माताके संबंधमें जो न्याय ऊपर कहा गया है, वही पिताके संबंधमेंभी उपयुक्त होनेका समय कभी कभी आ सकता है। जैसे; मान लीजिये, कोई लड़का अपने पराक्रमसे राजा हो गया; और उसका पिता एक अपराधीके नाते इन्साफ़के लिये उसके सामने लाया गया; इस अवस्थामें वह लड़का क्या करे ? – राजाके नाते अपने अपराधी पिताको दंड दे या उसको अपना पिता समझ कर छोड़ दे ? मनुजी कहते हैं :- पिताचार्यः सुहृन्माता भार्या पुत्रः पुरोहितः । नादण्ड्यो नाम राज्ञोऽस्ति यः स्वधर्मे न तिष्ठति ॥ “पिता, आचार्य, मित्र, माता, स्त्री, पुत्र या पुरोहित – इनमेंसे कोईभी यदि अपने धर्मके अनुसार न चले, तो वह राजाके लिये दंड्य नहीं हो सकता; अर्थात् राजा उसको उचित दंड दे” (मनु. ८. ३३५; मभा. शां. १२१. ६०)। क्योंकि इस जगह पुत्रधर्मकी योग्यतासे राजधर्मकी योग्यता अधिक है। इस न्यायका उदाहरण (मभा. वन. १०७; रामा. १. ३८ में) भारत और रामायण – दोनोंमें है, कि सूर्यवंशके महापराक्रमी सगर राजाने अपने लड़केको देशसे निकाल दिया था; क्योंकि वह 'नासमझ और दुराचारी' था, और प्रजाको दुःख दिया करता था। मनुस्मृतिमेंभी यह कथा है, कि आंगिरस नामक एक ऋषिको छोटी अवस्थामेंही बहुत ज्ञान हो गया था। इसलिये उसके काका-मामा आदि बड़े बूढ़े रिश्तेदार उसके पास अध्ययन करने लगे। एक दिन पाठ पढ़ाते पढ़ाते आंगिरसने कहा, “पुत्रका इति होवा च ज्ञानेन परिगृह्य तान्।” बस, यह सुनकर सब वृद्धजन क्रोधसे लाल- पीले हो गये; और कहने लगे, कि यह लडका मस्त हो गया है। उसको उचित दंड दिलानेके लिये उन लोगोंने देवताओंसे शिकायत की। देवताओंने दोनों पक्षोंका कहना सुन लिया और यह निर्णय किया, कि “आंगिरसने जो कुछ तुम्हें कहा वही न्याय्य है।” इसका कारण यह है :-

४४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः । यो वै युवाप्यधीयानस्तं देवाः स्थविरं विदुः ॥ “ सिरके बाल सफ़ेद हो जानेसेही कोई मनुष्य वृद्ध नही कहा जा सकता; देवगण उसी को वृद्ध कहते हैं, जो तरुण होनेपरभी ज्ञानवान् हो ” ( मनु. २. १५६ और मभा. वन. १३३. ११; शल्य. ५१. ४७. ) । यह तत्त्व मनुजी और व्यासजीहीको नहीं, किंतु बुद्धकोभी मान्य था। क्योंकि, मनुस्मृतिके उक्त श्लोकका पहला चरण ‘धम्मपद’* नामके पाली भाषाके प्रसिद्ध नीतिविषयक बौद्ध ग्रंथमें अक्षरशः आया है ( धम्मपद २६० ) । और उसके आगे यहभी कहा है, कि जो सिर्फ़ अवस्थाहीमे वृद्ध हो गया है, उसका जीना व्यर्थ है; यथार्थमें धर्मिष्ठ और वृद्ध होनेके लिये सत्य, अहिंसा आदि सद्गुणोंकी आवश्यकता है। 'चुल्लवग्ग' नामक दूसरे ग्रंथ ( चुल्लवग्ग ६. १३. १ ) में स्वयं बुद्धकी यह आज्ञा है, कि यद्यपि धर्मका निरूपण करनेवाला भिक्षु नया हो, तथापि वह ऊँचे आसनपर बैठे और उन वयोवृद्ध भिक्षुओकोभी उपदेश करे, जिन्होंने उसके पहले दीक्षा पाई हो। यह कथा सब लोग जानते हैं, कि प्रल्हादने अपने पिता हिरण्यकशिपुकी अवज्ञा करके भगवत्प्राप्ति कैसे कर ली थी। इससे यह जान पड़ता है कि छोटेबड़ेकाही नहीं तो जब कभी पिता-पुत्रके सर्वमान्य नातेसेभी कोई दूसरा अधिक बड़ा संबंध उपस्थित होता है, तब उतने समयके लिये निरुपाय होकर पिता-पुत्रका नाता भूल जाना पड़ता है। परंतु ऐसे अवसरके न होते हुएभी, यदि कोई मुँहज़ोर लड़का उक्त नीतिका अवलंब करके अपने पिताको गालियाँ देने लगे, तो वह केवल पशुके समान समझा जाएगा। पितामह भीष्मने युधिष्ठिरसे कहा है, ‘ गुरुर्गरीयान् पितृतो मातृतश्चेति मे मतिः ’ ( मभा. शां. १०८. १७ ) - अर्थात् गुरु, माता-पितामेभी श्रेष्ठ है; परंतु महाभारतमें यहभी लिखा है, कि एक समय मरुत्त राजाके गुरुने लोभवश होकर स्वार्थके लिये उसका त्याग किया, तब मरुत्तने कहा :- गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः । उत्पथप्रतिपन्नस्य न्याय्यं भवति शासनम् । “ यदि कोई गुरु इस बातका विचार न करे, कि क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये; और यदि वह अपनेही घमंडमें रहकर टेढ़े रास्तेमे चले, तो उसको

  • ‘धम्मपद’ ग्रंथका अंग्रेजी अनुवाद ‘प्राच्यधर्म-पुस्तकमाला’ ( Sacred Books of the East, Vol. X ) में किया गया है; और चुल्लवग्गका अनुवादभी उसी मालाके Vol. XVII और XX में प्रकाशित हुआ है। धम्मपदका पाली श्लोक यह है :- न तेन थेरो होति येनस्स पलितं सिरो । परिपक्को वयो तस्स मोघजिण्णो ति वुच्चति ॥ ‘थेर’ शब्द बुद्ध भिक्षुओंके लिये प्रयुक्त हुआ है। यह संस्कृत 'स्थविर'का अपभ्रंश है।

कर्मजिज्ञासा ४५ शासन करना उचित है।” उक्त श्लोक महाभारतमें चार स्थानोंमें पाया जाता है (मभा. आ. १४२. ५२, ५३; उ. १७९, २४; शां. ५७. ७; १४०. ४८)। इनमेंसे पहले स्थानमें वही पाठ है, जो ऊपर दिया गया है। अन्य स्थानोंमें चौथे चरणके स्थानमें “दण्डो भवति शाश्वतः” “अथवा परित्यागो विधीयते” यह पाठांतरभी है। परंतु वाल्मीकिरामायण (रामा. २. २१. १३) में जहाँ यह श्लोक है, वहाँ ऐसाही पाठ है, जैसा ऊपर दिया गया है। इसलिये हमने इस ग्रंथमें उसीको स्वीकार किया है। इस श्लोकमें जिस तत्त्वका वर्णन किया गया है, उसीके आधारपर भीष्म पितामहने परशुरामसे और अर्जुनने द्रोणाचार्यसे युद्ध किया; और जब प्रल्हादने देखा, कि अपने गुरु, जिन्हें हिरण्यकशिपुने नियत किया है, भगवत्प्राप्तिके विरुद्ध उपदेशकर रहे हैं, तब उसने इसी तत्त्वके अनुसार उनका निषेध किया है। शांतिपर्वमें भीष्म पितामह श्रीकृष्णसे कहते हैं, कि यद्यपि गुरु पूजनीय हैं, तथापि उसकोभी नीतिकी मर्यादाका पालन करना चाहिये; नहीं तो- समयत्यागिनो लुब्धान् गुरून्नपि च केशव । निहन्ति समरे पापान् क्षत्रियः स हि धर्मवित् ॥ “हे केशव ! जो गुरु मर्यादा, नीति अथवा शिष्टाचारका भंग करते हैं और जो लोभी या पापी हैं, उन्हें लड़ाईमें मारनेवाला क्षत्रियही धर्मज्ञ कहलाता है” (मभा. शां. ५५. १६)। इसी तरह तैत्तिरीयोपनिषदमेंभी प्रथम ‘आचार्य देवो भव’ कहकर उसीके आगे कहा है, कि हमारे जो कर्म अच्छे हों उन्हींका अनुकरण करो; औरोंका नहीं- ‘यान्यस्माकं सुचरितानि। तानि त्वयोपास्यानि, नो इतराणि’ (तै. १. ११. २)। इससे उपनिषदोंका वह सिद्धान्त प्रकट होता है, कि यद्यपि पिता और आचार्यको देवताके समान मानना चाहिये; तथापि यदि वे शराब पीते हों, तो पुत्र और छात्रको अपने पिता या आचार्यका अनुकरण नहीं करना चाहिये क्योंकि नीतिकी मर्यादा और धर्मका अधिकार माँ-बाप या गुरुसे अधिक बलवान् होता है। मनुजीकी निम्न आज्ञाकाभी यही रहस्य है- “धर्मका पालन करो; यदि कोई धर्मका नाश करेगा; अर्थात् धर्मकी आज्ञाके अनुसार आचरण नहीं करेगा; तो धर्म उस मनुष्यका नाश किये बिना नहीं रहेगा।” (मनु. ८. १४-१६) राजा तो गुरुसेभी अधिक श्रेष्ठ एक देवता है (मनु. ७. ८ और मभा. शां. ६८. ४०); परंतु वहभी इस धर्मसे मुक्त नहीं हो सकता। यदि वह इस धर्मका त्याग कर देगा, तो उसका नाश हो जाएगा- यह बात मनुस्मृतिमें कही गई है; और महाभारतमें वही भाव, वेन तथा खनीनेत्र राजाओंकी कथामें, व्यक्त किया गया है (मनु. ७. ४१ और ८. १२८; मभा. शां. ५९. ९२, १०० तथा अश्व. ४)। अहिंसा, सत्य और अस्तेयके साथ इंद्रिय-निग्रहकीभी गणना सामान्य धर्ममें की जाती है (मनु. १०. ६३)। काम, क्रोध, लोभ आदि मनुष्यके शत्रु हैं। इस- लिये जबतक मनुष्य इनको जीत नहीं लेगा, तबतक उसका या समाजका कल्याण