श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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या अधिक नियम एकसाथ लागू होते हैं। उस समय "यह करूँ या वह करूँ" इस चिंतामें पड़कर मनुष्य पागल-सा हो जाता है। अर्जुनपर ऐसीही आपत्ति आ पडी थी, परंतु अर्जुनके सिवा और लोगोंपरभी ऐसे कठिन प्रसंग अक्सर आया करते हैं। इस बातका मार्मिक विवेचन महाभारतमें कई स्थानोंमें किया गया है। उदा- हरणार्थ, मनुने सब वर्णोंके लोगोंके लिये नीतिधर्मके पांच नियम बतलाये हैं- "अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः" (मनु. १०. ६३) - अहिंसा, सत्य, अस्तेय, काया, वाचा और मनकी शुद्धता, एवं इंद्रियनिग्रह - इन नीतिधर्मोंमेंसे एक अहिंसाही का विचार कीजिये। "अहिंसा परमो धर्मः" (महा. आ. ११. १३) यह तत्त्व सिर्फ हमारे वैदिक धर्महीमें नहीं, किंतु अन्य सब धर्मोंमेंभी प्रधान माना गया है। बौद्ध और ईसाई धर्मग्रंथोंमें जो आज्ञाएं हैं, उनमें अहिंसाको मनुकी आज्ञाके समान पहला स्थान दिया गया है। सिर्फ किसीकी जान ले लेनाही हिंसा नहीं है तो उसमें किसीके मन अथवा शरीरको दुख देनेकाभी समावेश किया जाता है। अर्थात्, किसी सचेतन प्राणीको किसी प्रकार दुःखित न करनाही अहिंसा है। पितृ- वध, मातृवध और मनुष्यवध - ये हिंसाके भयानक प्रकार हैं, अतः इस संसारमें सब लोगोंकी संमतिके अनुसार यह अहिंसाधर्म सब धर्मोंमें श्रेष्ठ माना गया है। परंतु अब कल्पना कीजिये, कि हमारी जान लेनेके लिये या हमारी पत्नी अथवा कन्यापर बलात्कार करनेके लिये, अथवा हमारे घरमें आग लगानेके लिये, या हमारा धन छीन लेनेके लिये, कोई दुष्ट मनुष्य हाथमें शस्त्र लेकर तैयार हो जाय और उस समय हमारी रक्षा करनेवाला हमारे पास कोई न हो; तो उस समय हमको क्या करना चाहिये ? क्या, "अहिंसा परमो धर्मः" कहकर ऐसे आततायी मनुष्य- पर दया की जाय ? या, यदि वह दुष्ट सीधी तरहसे न माने तो यथाशक्ति उसका शासन किया जाय ? मनुजी कहते हैं :- गुरुं वा बालवृद्धौ वा ब्राह्मणं वा बहुश्रुतम् । आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन् ॥ अर्थात् "ऐसे आततायी या दुष्ट मनुष्यको अवश्य मार डालें; उस समय यह विचार न करें कि वह गुरु है, बुढ़ा है, बालक है या विद्वान् ब्राह्मण है।" शास्त्रकार कहते हैं कि (मनु. ८. ३५०) ऐसे समय हत्या करनेका पाप हत्या करनेवालेको नहीं लगता; किंतु आततायी मनुष्य अपने अधर्महीसे मारा जाता है। आत्मरक्षाका यह हक़
- कुछ मर्यादाके भीतर - आधुनिक फौजदारी कानूनमेंभी स्वीकृत किया गया है। ऐसे प्रसंगोंपर अहिंसासे आत्मरक्षाकी योग्यता अधिक मानी जाती है। भ्रूण- हत्या सबसे अधिक निंदनीय मानी है; परंतु जब बच्चा पेटमें टेढ़ा होकर अटक जाता है तब क्या उसको काटकर निकाल नहीं डालना चाहिये ? यज्ञमें पशुका वध करना वेदनेभी प्रशस्त माना है (मनु. ५. ३१), परंतु पिष्टपशुके द्वारा वह टलभी सकता है (महा. शां. ३३७; अनु. ११५. ५६)। तथापि हवा, पानी,