भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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३२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र फल इत्यादि सब स्थानोंमें जो सैकड़ों सूक्ष्म जीव-जंतु हैं उनकी हत्या कैसे टाली जा सकती है ? महाभारतमें (शां. १५. २६) अर्जुन कहता है :- सूक्ष्मयोनीनि भूतानि तर्कगम्यानि कानिचित् । पक्ष्मणोऽपि निपातेन येषां स्यात् स्कन्धपर्ययः ॥ “इस जगत्‌में ऐसे असंख्य सूक्ष्म जंतु हैं, कि जिनका अस्तित्व यद्यपि नेत्रोंसे देख नहीं पड़ता, तथापि तर्कसे सिद्ध है। और यदि हम अपनी आँखोंकी पलक हिलावें, तो उतनेहीसे, उन जंतुओंका नाश हो जाता है !” ऐसी अवस्था में यदि हम मुखसे कहते रहें, कि “हिंसा मत करो, हिंसा मत करो,” तो उससे क्या लाभ होगा ? इसी सारासार विचारके अनुसार अनुशासन पर्वमें (अनु. ११६) शिकार करनेका समर्थन किया गया है। वनपर्वमें एक कथा है, कि कोई ब्राह्मण क्रोधसे किसी पति- व्रता स्त्रीको भस्मकर डालना चाहता था; परंतु जब उसका यत्न सफल नहीं हुआ तब वह उस स्त्रीकी शरणमें गया। तब धर्मका सच्चा रहस्य समझ लेनेके लिये उस ब्राह्मणको उस स्त्रीने किसी व्याधके यहाँ भेज दिया। यह व्याध मांस बेचा करता था; परंतु था अपने माता-पिताका बड़ा भक्त ! व्याधका वह व्यवसाय देख- कर ब्राह्मणको अत्यंत विस्मय और खेद हुआ। तब व्याधने उसे अहिंसाका सच्चा तत्त्व समझाकर बतला दिया कि इस जगत्‌में कौन किसको नहीं खाता ? “जीवो जीवस्य जीवनम्” (भाग. १. १३. ४६) - यही नियम सर्वत्र दीख पड़ता है। आपत्कालमें तो “प्राणस्यान्नमिदं सर्वम्” यह नियम सिर्फ़ स्मृतिकारोंहीने नहीं, (मनु. ५. २८; मभा. शां. १५. २१) कहा है तो उपनिषदोंमेंभी स्पष्ट कहा गया है। (वे. सू. ३. ४. २८; छां. ५. २. ८; बृ. ६. १. १४) यदि सब लोग हिंसा छोड़ दें तो क्षात्रधर्म कहाँ और कैसे शेष रहेगा। यदि क्षात्रधर्म नष्ट हो जाय तो प्रजाकी रक्षा कैसे होगी ? सारांश यह है कि नीतिके सामान्य नियमोंहीसे सदा काम नहीं चलता; नीतिशास्त्रके प्रधान नियम - अहिंसा - मेंभी कर्तव्य-अकर्तव्यका सूक्ष्म विचार करनाही पड़ता है। अहिंसाधर्मके अनुसारही क्षमा, दया, शांति आदि गुण शास्त्रोंमें कहे गये हैं; परंतु सब समय शांतिसे कैसे काम चल सकेगा ? सदा शांत रहनेवाले मनुष्योंके बाल-बच्चोंकोभी दुष्ट लोग हरण किये बिना नहीं रहेंगे। इसी कारणका प्रथम उल्लेख करके प्रल्हादने अपने नाती, राजा बलिसे कहा है :- न श्रेयः सततं तेजो न नित्यं श्रेयसी क्षमा । . . . . . . . . . . . . . . . तस्मान्नित्यं क्षमा तात पंडितैरपवादिता ॥ “सदैव क्षमा करना अथवा क्रोध करना श्रेयस्कर नहीं होता ! इसी लिये, हे तात ! पंडितोंने क्षमाके लिये कुछ अपवादभी कहे हैं (मभा. वन. २८. ६, ७) इसके बाद कुछ प्रसंगोंका वर्णन किया गया है, जो क्षमाके लिये उचित है; तथापि प्रल्हाद-