भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 80

कर्मजिज्ञासा ३३ ने इस बातका उल्लेख नहीं किया, कि इन प्रसंगोंको पहचाननेका तत्त्व या नियम क्या हैं। यदि इन प्रसंगोंको पहचाने बिना, सिर्फ अपवादोंकाही कोई उपयोग करे, तो वह दुराचरण समझा जाएगा; इसलिये यह जानना अत्यंत आवश्यक और महत्त्वका है, कि इन प्रसंगोंको पहचाननेका नियम क्या है। दूसरा तत्त्व 'सत्य' है, जो सब देशों और धर्मोंमें भलीभाँति माना जाता है और प्रमाण समझा जाता है। सत्यकी महानताका वर्णन कहाँतक किया जाय ? वेदमें सत्यकी महिमाके विषयमें कहा है, कि सारी सृष्टिकी उत्पत्तिके पहले 'ऋतं' , और 'सत्यं' उत्पन्न हुए; और सत्यहीसे आकाश, पृथ्वी, वायु आदि पंचमहाभूत स्थिर हैं- "ऋतंच सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत" (ऋ. १०. १९०. १), "सत्ये- नोत्तमिता भूमिः" (ऋ. १०. ८५. १) आदि मंत्र देखो। 'सत्य' शब्दका धात्वर्थभी यही है- "रहनेवाला अर्थात् कभी नष्ट न होनेवाला।" अथवा 'त्रिकाल-अबा- धित'; इसीलिये सत्यके विषयमें कहा गया है, कि "सत्यके सिवा और धर्म नहीं है; सत्यही परब्रह्म है।" महाभारतमें कई जगह इस वचनका उल्लेख किया गया है, कि "नास्ति सत्यात्परो धर्मः" (महा. शां. १६२. २४) और यहभी लिखा है कि :- अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम् । अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते ॥ "हज़ार अश्वमेध और सत्य की तुलना की गयी तो सत्यही श्रेष्ठ सिद्ध हुआ" (आ. ७४. १०२)। यह वर्णन सामान्य सत्यके विषयमें हुआ। सत्यके विषयमें मनुजी एक और विशेष बात कहते हैं (महा. मनु. ४. २५६) :- वाच्यार्था नियताः सर्वे वाङ्मूला वाग्विनिःसृताः । तां तु यः स्तेनयेद्वाचं स सर्वस्तेयकृन्नरः ॥ "मनुष्योंके सब व्यवहार वाणीसे हुआ करते हैं। एकके विचार दूसरेको बतानेके लिये शब्दके समान अन्य साधन नहीं है। वही सब व्यवहारोंका आश्रय-स्थान और वाणीका मूल स्रोत है। जो मनुष्य उसको मलिन कर डालता है, अर्थात् जो वाणीकी प्रतारणा करता है, वह सब पूंजीहीकी चोरी करता है।" इसलिये मनुने कहा है, कि "सत्यपूतां वदेद्वाचं" (मनु. ६. ४६) - जो सत्यसे पवित्र किया गया हो, वही बोला जाय। और धर्मोंकी अपेक्षा सत्यहीको पहला स्थान देनेके लिये उपनिषद्- मेंभी कहा है, "सत्यं वद। धर्मं चर" (तै. १. ११. १)। जब बाणोंकी शय्यापर पड़े पड़े भीष्म पितामह शांति और अनुशासन पर्वोंमें युधिष्ठिरको सब धर्मोंका उपदेश देचुके, तब प्राण छोड़नेके पहले "सत्येषु यतितव्यं वः सत्यं हि परमं बलं" इस वचनको सब धर्मोंका सार कहकर उन्होंने सत्यहीके अनुसार बर्ताव करनेके लिये सब लोगोंको उपदेश किया है (महा. अनु. १६७. ५०)। बौद्ध और ईसाई धर्मोंमेंभी इन्हीं नियमोंका अनुवाद पाया जाता है। गी. र. ३