श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र क्या उस बातकी कभी कल्पनाकी जा सकती है, कि जो सत्य इस प्रकार स्वयंसिद्ध और चिरस्थायी है, इसके लियेभी कुछ अपवाद होंगे ? परंतु दुष्ट जनोंमे भरे हुए इस जगतका व्यवहार बहुत कठिन है। कल्पना कीजिये, कि कुछ आदमी चोरोंसे पीछा किये जानेपर तुम्हारे सामने किसी स्थानमें जाकर छिप गये। इसके बाद हाथमें तलवार लिये हुए चोर तुम्हारे पास आकर पूछने लगे, कि वे आदमी कहाँ चले गये ? ऐसी अवस्थामें तुम क्या कहोगे ? क्या तुम सच बोलकर सब हाल कह दोगे, या उन निरपराधी जीवोंकी हिंसाको रोकोगे ? क्यों कि निरपराधोंकी हिंसाको रोकना सत्यहीके समान महत्त्वका धर्म है। मनु कहते हैं, “नापृष्टः कस्यचिद् ब्रूयान्न चान्यायेन पृच्छतः” (मनु. २. ११०; मभा. शां. २८७. ३४) - जबतक कोई प्रश्न न करे, तबतक किसीसे बोलना न चाहिये; और यदि कोई अन्यायसे प्रश्न करे तो पूछनेपरभी उत्तर नहीं देना चाहिये। यदि मालूमभी हो, तो सिड़ी या पागलके समान कुछ हूँ-हूँ करके बात बना देनी चाहिये - "जानन्नपि हि मेधावी जडवल्लोक आचरेत्।" अच्छा, पर हूँ-हूँ कर देना और बात बना देना एक तरहसे असत्य भाषण करना नहीं है ? महाभारत (मभा. आ. २१५. ३४) में कई स्थानोंमें कहा है, “न व्याजेन चरेद्धर्मम्” - धर्मसे प्रतारणा करके मनका समाधान नहीं कर लेना चाहिये; क्योंकि तुम धर्मको धोखा नहीं दे सकते। तुम खुद धोखा खा जाओगे । अच्छा, यदि हूँ-हूँ करके कुछ बात बना लेनेकाभी समय न हो, तो क्या करना चाहिये ? मान लीजिये, कोई चोर हाथमें तलवार लेकर छातीपर आ बैठा है; और पूछ रहा है, कि तुम्हारा धन कहाँ है ? यदि कुछ उत्तर न दोगे, तो जानहीसे हाथ धोना पड़ेगा। ऐसे समयपर क्या बोलना चाहिये ? सब धर्मोंका रहस्य जाननेवाले भगवान् श्रीकृष्ण - ऐसेही चोरोंकी कहानीका दृष्टान्त देकर - कर्णपर्व (मभा. क. ६९. ६१) में अर्जुनसे और आगे शांतिपर्वके सत्यानृतं अध्याय (मभा. शां. १०९. १५. १६) में भीष्म पितामह युधिष्ठिरसे कहते हैं :- अकूजनेन चेन्मोक्षो नावक्कूजेत्कथंचन । अवश्यं कूजितव्ये वा शंकेरन् वाप्यकूजनात् । श्रेयस्तत्रानृतं वक्तुं सत्यादिति विचारितम् ॥ अर्थात् 'यह बात विचारपूर्वक निश्चित की गई है, कि यदि बिना बोले मोक्ष या छुटकारा हो सके, तोभी हो, बोलना नहीं चाहिये; और यदि बोलना आवश्यक हो, अथवा न बोलनेसे (दूसरो को) कुछ संदेह होना संभव हो, तो उस समय सत्यके बदले असत्य बोलनाही अधिक प्रशस्त है।' इसका कारण यह है, कि सत्य धर्म केवल शब्दोच्चारहीके लिये नहीं है। अतएव जिस आचरणसे सब लोगोंका कल्याण हो, वह आचरण सिर्फ इसी कारणसे निंद्य नहीं माना जा सकता, कि शब्दोच्चार अयथार्थ है। जिससे सभीकी हानि हो, वह न तो सत्यही है; और न अहिंसाही।