श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्मजिज्ञासा ३५ शांतिपर्व (मभा. शां. ३२९. १३; २८७. १९) में सनत्कुमारके आधारपर नारदजी शुकजीसे कहते हैं :- सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यादपि हितं वदेत् । यद्भूतहितमत्यन्तं एतत्सत्यं मतं मम ।। " सच बोलना अच्छा है; परंतु सत्यसेभी अधिक ऐसा बोलना अच्छा है; जिसमे सब प्राणियोंका हित हो। क्योकि जिससे सब प्राणियोंका अत्यंत हित होता है, वही हमारे मतमें सत्य है। " 'यद्भूतहितं' पदको देखकर आधुनिक उपयोगितावादी अंग्रेजों का स्मरण करके यदि कोई उक्त वचनको प्रक्षिप्त कहना चाहें, तो उन्हें स्मरण रखना चाहिये, कि वह वचन महाभारतके वनपर्वमे - ब्राह्मण और व्याधके संवादमें - दो-तीन बार आया है। उनमेंसे एक जगह तो " अहिंसा सत्यवचनं सर्वभूतहितं परम् " पाठ है ( मभा. वन. २०६. ७३ ) ; और दूसरी जगह " यद्भूतहितमत्यन्तं तत्सत्यमिति धारणा " ( वन. २०८. ४ ) , ऐसा पाठभेद किया गया है। सत्यप्रतिज्ञ युधिष्ठिरने द्रोणाचार्यसे " नरो वा कुंजरो वा " कहकर उन्हें संदेहमें क्यों डाल दिया ? इसका कारण वही है, जो ऊपर दिया गया है; और कुछ नहीं । ऐसेही और बातोंमेंभी यही नियम लगाया जाता है। हमारे शास्त्रोंका यह कथन नही है, कि झूठ बोलकर किसी खूनीकी जान बचाई जाये । शास्त्रोंमें खून करनेवाले आदमीके लिये देहांत प्रायश्चित्त अथवा वधदंडकी सजा कही गयी है। इसलिये वह सजा पाने योग्य अथवा वध्य है। सभी शास्त्रकारोंने कहा है कि इसीके समान और किसी समय जो आदमी झूठो गवाही देता है वह अपने सात या अधिक पूर्वजोंसहित नरकमें जाता है। (मनु. ८. ८९-९९; मभा. आ. ७. ३)। परंतु जब कर्णपर्वमें वर्णित उक्त चोरोंके दृष्टान्तके समान हमारे सच बोलनेसे निरपराधी आदमियोंकी जान जानेकी शंका हो, तो उस समय क्या करना चाहिये ? ग्रीन नामक एक अंग्रेज ग्रंथकारने अपने ' नीतिशास्त्र का उपोद्घात' नामक ग्रंथमें लिखा है, कि ऐसे अवसरोंपर नीतिशास्त्र मूक हो जाते हैं। यद्यपि मनु और याज्ञवल्क्य ऐसे प्रसंगोंकी गणना सत्यापवादोंमें करते हैं, तथापि यह भी उनके मतसे गौण बात है। इसलिये अंतमें उन्होने इस अपवादके लिये भी प्रायश्चित्त बतलाया है - "तत्पावनाय निर्वाप्यश्चरुः सारस्वतो द्विजैः" (याज्ञ. २. ८३; मनु. ८. १०४-१०६) । कुछ बड़े अंग्रेजोंने - जिन्हें अहिंसाके अपवादके विषयमें आश्चर्य नहीं मालूम होता - हमारे शास्त्रकारोंको सत्यके विषयमें दोष देनेका यत्न किया है। इसलिये यहाँ इस बातका उल्लेख किया जाता है, कि सत्यके विषयमें प्रामाणिक ईसाई धर्मोप- देशक और नीतिशास्त्रके अंग्रेज ग्रंथकार क्या कहते हैं। क्राइस्टका शिष्य पॉल नये बाइबलमें कहता है, 'यदि मेरे असत्य भाषणसे प्रभुके सत्यकी महिमा और बढ़ती है ( अर्थात् ईसाई धर्मका अधिक प्रचार होता है ), तो इससेमैं पापी कैसे हो सकता हूँ' ? ( रोम. ३. ७ ) ईसाई धर्मके इतिहासकार मिलमैलने लिखा है, कि