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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 83

३६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र प्राचीन ईसाई धर्मोपदेशक कई बार इसी तरह आचरण किया करते थे। यह बात सच है, कि वर्तमान समयके पाश्चिमात्य नीतिशास्त्रज्ञ किसीको धोखा देकर या भुलाकर धर्मभ्रष्ट करना न्याय्य नहीं मानेंगे; परंतु वेभी यह कहनेको तैयार नहीं हैं, कि सत्यधर्म अपवादरहित है। उदाहरणार्थ, यह देखिये, कि सिजविक नामके जिस पंडितका नीतिशास्त्र हमारे कॉलेजोंमें पढ़ाया जाता है, उसकी क्या राय है। कर्म और अकर्मके संदेहका निर्णय जिस तत्त्वके आधारपर यह ग्रंथकार किया करता है, उसको "सबसे अधिक लोगोंका सबसे अधिक सुख" (बहुत लोगोंका बहुत सुख) कहते हैं। इसी नियमके अनुसार उसने यह निर्णय किया है, कि छोटे लड़कोंको, पागलोंको, और इसी प्रकार बीमार आदमियोंको (यदि सच बात सुना देनेसे उसके स्वास्थ्यके बिगड़ जानेका भय हो), अपने शत्रुओंको, चोरोंको और (यदि बिना बोले काम चल न सकता हो तो) जो अन्यायसे प्रश्न करें, उसको उत्तर देनेके समय, अथवा वकीलोंको अपने व्यवसायमें झूठ बोलना अनुचित नहीं है।* मिलके नीतिशास्त्रके ग्रंथमेंभी इसी अपवादका समावेश किया गया है।† इन अपवादोंके अतिरिक्त सिजविक अपने ग्रंथमें यहभी लिखता है, कि 'यद्यपि कहा गया है, कि सब लोगोंको सच बोलना चाहिये, तथापि हम यह नहीं कह सकते, कि जिन राज-नीतिज्ञोंको अपनी कारवाई गुप्त रखनी पड़ती है, वे औरोंके साथ, तथा व्यापारी अपने ग्राहकोंसे हमेशा सचही बोला करें।'‡ किसी अन्य स्थानमें वह लिखता है, कि यही छूट पादरियों और सिपाहियोंको मिलती है। लेस्ली स्टीफन नामका एक और अंग्रेज ग्रंथकार है। उसने नीतिशास्त्रका विवेचन आधिभौतिक दृष्टिसे किया है। वहभी अपने ग्रंथमें ऐसेही उदाहरण देकर अंतमें लिखता है, 'किसी कार्यके परिणामकी ओर ध्यान देनेके बादही उसकी नीतिमत्ता निश्चित की जानी चाहिये। यदि मुझे यह विश्वास हो, कि झूठ बोलनेहीसे कल्याण होगा, तो मैं सत्य बोलनेके लिये कभी तैयार नहीं रहूँगा। मेरे इस विश्वासमें यह भाव हो सकता है, कि इस समय झूठ बोलनाही मेरा कर्तव्य है।'§ ग्रीन साहबने नीति- शास्त्र का विचार अध्यात्मदृष्टिसे किया है। आप उक्त प्रसंगोंका उल्लेख करके स्पष्ट

  • Sidgwick's Methods of Ethics, Book III Chap. XI § 6. p. 355 (7th Ed.) Also, see pp. 315-317 (same Ed.). † Mill's Utilitarianism, Chap. II pp. 33-34 (15th Ed. Longmans, 1907). ‡ Sidgwick's Methods of Ethics, Book IV. Chap. III, § p. 454 (7th Ed.); and Book II Chap. V. § 3. p. 169. § Leslie Stephen's Science of Ethics (Chap. IV § 29. p. 369 (2nd Ed.) "And the certainty might be of such a kind as to make me think it a duty to lie."