श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 84, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंरीतिसे कहते हैं, कि ऐसे समय नीतिशास्त्र मनुष्यके संदेहकी निवृत्ति कर नहीं सकता । अंतमें आपने यह सिद्धान्त लिखा है, " नीतिशास्त्र यह नहीं कहता, कि किसी साधारण नियमके अनुसार - सिर्फ यह समझकर कि वह है - हमेशा चलनेमें कुछ विशेष महत्त्व है; किंतु उसका कथन सिर्फ यही है, कि 'सामान्यतः' उस नियमके अनुसार चलना हमारे लिये श्रेयस्कर है । इसका कारण यह है, कि ऐसे समय हम लोग केवल नीतिके लिये अपनी लोभमूलक नीच मनोवृत्तियोंको त्यागनेकी शिक्षा पाया करते हैं ।"* नीतिशास्त्रपर ग्रंथ लिखनेवाले बेन, वेवेल आदि अन्य अंग्रेज पंडितोंकाभी ऐसाही मत है। ‡ यदि उक्त अंग्रेज ग्रंथकारोंके मतोंकी तुलना हमारे धर्मशास्त्रकारोंके बनाये हुए नियमोंके साथ की जाय, तो यह बात सहजही ध्यानमें आ जाएगी, कि सत्यके विषयमें अधिक अभिमानी कौन है। इसमें संदेह नहीं, कि हमारे शास्त्रोंमें कहा है :- न नर्मयुक्तं वचनं हिनस्ति न स्त्रीषु राजन्न विवाहकाले । प्राणात्यये सर्वधनापहारे पंचानृतान्याहुरपातकानि ॥ अर्थात् " हँसीमें, स्त्रियोंके साथ, विवाहके समय, जब जानपर आ बने तब, और संपत्तिकी रक्षाके लिये झूठ बोलना पाप नहीं है" ( मभा. आ. ८२. १६ और महा. शां. १०९ तथा मनु. ८. ११०) । परंतु इसका मतलब यह नहीं है, कि स्त्रियोंके साथ हमेशा झूठही बोलना चाहिये । जिस भावसे सिजविक साहबने ' छोटे बच्चे, पागल और बीमार 'के विषयमें अपवाद किया है, वही भाव महाभारतके उक्त कथनकाभी है। अंग्रेज ग्रंथकार पारलौकिक तथा आध्यात्मिक दृष्टिकी ओर कुछ ध्यान नहीं देते । उन लोगोंने तो खुल्लमखुल्ला यहां तक प्रतिपादन किया है कि व्यापारियोंका अपने लाभके लिये झूठ बोलना अनुचित नहीं है । किंतु वह बात हमारे शास्त्रकारोंको संमत नहीं है । इन लोगोंने कुछ ऐसेही प्रसंगोंपर असत्य बोलनेकी अनुमति दी है, जबकि केवल सत्य शब्दोच्चारण (अर्थात् केवल वाचिक सत्य) और सर्वभूतहित ( अर्थात् वास्तविक सत्य ) में विरोध हो जाता है, और व्यवहारकी दृष्टिसे झूठ बोलना अपरिहार्य हो जाता है । इनकी राय है, कि सत्य आदि नीतिधर्म नित्य – अर्थात् सब समय एक समान अबाधित - हैं। अतएव यह अपरिहार्य झूठ बोलनाभी थोड़ा-सा पापही हैं; और उसके लिये प्रायश्चित्तभी कहा गया है । संभव है, कि आजकलके आधिभौतिक पंडित इन प्रायश्चित्तोंको निरर्थक होवा कहेंगे; परंतु जिन्होंने ये प्रायश्चित्त कहे हैं और जिन लोगोंके
- Greens's Prolegomena to Ethics, § 315. p. 379, ( 5th Cheaper edition ). ‡ Bain's Mental and Moral Science, p. 445 ( Ed. 1875); and Whewell's Elements of Morality. Book II. Chaps. XIII and XIV. ( 4th Ed., 1864 ).