श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र लिये ये कहे गये हैं, वे दोनों ऐसा नहीं समझते । वे तो सब उक्त सत्य अपवादको गौण ही मानते हैं। और इस विषयकी कथाओंमेंभी यही अर्थ प्रतिपादित किया गया है। देखिये, युधिष्ठिरने अडचनके समय एकही बार दबी हुई आवाजसे 'नरो वा कुंजरो वा' कहा था। इसका फल यह हुआ, कि उसका रथ, जो पहले जमीनसे चार अंगुल ऊपर अंतरिक्षमें चला करता था, अब और मामूली लोगोंके रथोंके समान धरतीपर चलने लगा । और अंतमें एक क्षणभरके लिये उसे नरकलोकमें रहना पड़ा (मभा. द्रोण. १९१. ५७. ५८ तथा स्वर्ग. ३. १५)। दूसरा उदाहरण अर्जुनका लीजिये । अश्वमेधपर्व (मभा. अश्व. ८१. १०) में लिखा है कि यद्यपि अर्जुनने भीष्मका वध शास्त्रधर्मके अनुसार कियाथा; तथापि उसने शिखंडीके पीछे छिपकर यह काम किया था, इसलिये उसको अपने पुत्र बभ्रुवाहनमे पराजित होना पड़ा । इन सब बातोंसे यही प्रकट होता है, कि विशेष प्रसंगोंके लिये कहे गये उक्त अपवाद मुख्य या प्रमाण नहीं माने जा सकते । हमारे शास्त्रकारोंका अंतिम तात्त्विक सिद्धान्त वही है, जो महादेवने पार्वतीसे कहा है - आत्महेतोः परार्थे वा नर्महास्याश्रयात्तथा । ये मृषा न वदन्तीह ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ "जो लोग, इस जगतमें स्वार्थके लिये, परार्थके लिये, या मजाकमेंभी कभी झूठ नहीं बोलते, उन्हीको स्वर्गकी प्राप्ति होती है” (मभा. अनु. १४४. १९) । अपनी प्रतिज्ञा या वचनको पूरा करना सत्यहींमें शामिल है। भगवान् श्रीकृष्ण और भीष्म पितामह कहते हैं, “चाहे हिमालय पर्वत अपने स्थानसे हट जाय, अथवा अग्नि शीतल हो जाय, परंतु हमारा वचन टल नहीं सकता” (मभा. आ. १०३ तथा उ. ८१. ४८) भर्तृहरिनेभी सत्पुरुषोंका वर्णन इस प्रकार किया है : - तेजस्विनः सुखमसूनपि सन्त्यजन्ति । सत्यव्रतव्यसनिनो न पुनः प्रतिज्ञाम् ॥ "तेजस्वी पुरुष आनंदसे अपनी जानभी दे देंगे; परंतु वे अपनी प्रतिज्ञाका त्याग कभी नहीं करेंगे” (नीतिश. ११०) इसी तरह श्रीरामचंद्रजीके एकपत्नी-व्रतके साथ उनका एक-बाण और एक-वचनका व्रतभी प्रसिद्ध है; जैसा इस सुभाषितमें कहा है - “द्विशरं नाभिसंधत्ते रामो द्वर्नाभिभाषते ।” हरिश्चंद्रने तो अपने स्वप्नमें दिये हुए वचनको सत्य करनेके लिये डोमकी नीच सेवाभी की थी। इसके उलटे, वेदमें यह वर्णन है, कि इंद्रादि देवताओने वृत्रासुरके साथ जो प्रतिज्ञाएँ की थीं उन्हें मेट दिया और उसको मार डाला । ऐसीही कथापुराणोंमें हिरण्यकशिपु की है। व्यवहारमेंभी कुछ कौल-करार ऐसे होते हैं, कि जो न्यायालयमें वे-कायदा समझे जाते हैं; या जिनके अनुसार चलना अनुचित माना जाता है। अर्जुनके विषयमें ऐसीही कथा महाभारत (मभा. कर्ण. ६९) में है। अर्जुनने प्रतिज्ञा की थी, कि जो कोई मुझसे कहेगा, कि "तू अपना गांडीव धनुष्य किसी दूसरेको दे दे, उसका सिं