भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 86

[Page Header] कर्मजिज्ञासा ३९

[Main Text] मैं तुरंतही काट डालूंगा । " इसके बाद युद्धमें जब युधिष्ठिर कर्णसे पराजित हुआ तब उसने निराश होकर अर्जुनसे कहा, " तेरा गांडीव हमारे किस कामका है ? तू इसे छोड़ दे ! " यह सुनकर अर्जुन हाथमें तलवार ले युधिष्ठिरको मारने दौड़ा । उस समय भगवान् श्रीकृष्ण वहीं थे । उन्होंने तत्त्वज्ञानकी दृष्टिसे सत्य धर्मका मार्मिक विवेचन करके अर्जुनको यह उपदेश किया, कि " तू मूढ़ है। तुझे अबतक सूक्ष्म-धर्म मालूम नहीं हुआ है। तुझे वृद्धजनोंसे इस विषयकी शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये; ' न वृद्धाः सेवितास्त्वया ' - तूने वृद्धजनोंकी सेवा नहीं की है। यदि तू प्रतिज्ञाकी रक्षा करनाही चाहता है, तो तू युधिष्ठिरकी निर्भर्त्सना कर, क्योंकि सभ्यजनोंको निर्भर्त्सना मृत्युहीके समान है।" इस प्रकार बोध करके उन्होंने अर्जुनको ज्येष्ठ भ्रातृवधके पापसे बचाया । इस समय भगवान् श्रीकृष्णने जो सत्या- नृत-विवेक अर्जुनको बताया है, उसीको आगे चलकर शांतिपर्वके सत्यानृत नामक अध्यायमें भीष्मने युधिष्ठिरसे कहा है (शां. १०९) । यह उपदेश व्यवहारमें लोगोंको ध्यानमें रखना चाहिये । इसमें संदेह नहीं, कि इन सूक्ष्म प्रसंगोंको जानना बहुत कठिन काम है। देखिये, इस स्थानमें सत्यकी अपेक्षा भ्रातृधर्मही श्रेष्ठ माना गया है; और गीताका प्रसंग इसके उलटे है, जहाँ बंधुप्रेमकी अपेक्षा क्षात्रधर्म प्रबल माना है। जब अहिंसा और सत्यके विषयमें इतना वाद-विवाद है, तब आश्चर्यकी बात नहीं, कि यही हाल नीतिधर्मके तीसरे तत्त्व अर्थात् अस्तेयकाभी हो । यह बात निर्विवाद सिद्ध है, कि न्यायपूर्वक प्राप्त किसीकी संपत्तिको चुरा ले जाने या लूट लेनेकी स्वतंत्रता यदि दूसरोंको मिल जाय, तो द्रव्यका संचय करना बंदहो जाएगा; समाजकी रचना बिगड़ जाएगी, चारों तरफ अनवस्था हो जाएगी और सभीकी हानि होगी । परंतु इस नियमकेभी अपवाद हैं। जब दुर्भिक्षके समय मोल देने, मजदूरी करने या भिक्षा मांगनेसेभी अनाज नहीं मिलता, तब ऐसी आपत्तिमें यदि कोई मनुष्य चोरी करके आत्मरक्षा करे, तो क्या वह पापी समझा जाएगा ? महाभारत (शां. १४१) में यह कथा है कि किसी समय बारह वर्षतक दुर्भिक्ष रहा और विश्वा- मित्रपर ऐसीही बड़ी आपत्ति आयी । तब उन्होंने किसी श्वपच (चांडाल) के घरसे कुत्तेका मांस चुराया और वे इस अभक्ष्य भोजनसे अपनी रक्षा करनेके लिये प्रवृत्त हुए । उस समय श्वपचने विश्वामित्रको पंचनखा भक्ष्याः' (मनु. ५. १८)* इत्यादि शास्त्रार्थ बतलाकर अभक्ष्य-भक्षण और वहभी चोरी न करनेके विषयमें बहुत उपदेश किया । परंतु विश्वामित्रने उसको डांटकर यह उत्तर दिया -

[Footnote]

  • मनु और याज्ञवल्क्यने कहा है कि कुत्ता, बंदर आदि जिन जानवरोंके पाँच पाँच नख होते हैं उन्हींमेंसे खरगोश, कछुआ, गोह आदि पाँच प्रकारके जानवरोंका मांस भक्ष्य है (मनु. ५. १८; याज्ञ. १. १७७)। इन पाँच जानवरोंके अतिरिक्त मनुजीने 'खड्ग' अर्थात् गेंडेकोभी भक्ष्य माना है। परंतु टीकाकारका कथन है,